जुमे के ख़ुत्बे में मौलाना तक़रीर फ़रमा रहे थे कि "मदारिस इस्लाम के क़िले हैं" ये सुनकर एक साहब ने कहा कि "मदारिस मज़बूत क़िले तो हैं मगर इस्लाम के नहीं बल्कि अपने-अपने मसलकों और मकतबे-फ़िक्र के।" अब तक तो मैं यही मानता था कि मिम्बर से जो बात कही...
बे-सुरूर नमाज़ें
एक साहब जुमे के ख़ुत्बे में फ़रमा रहे थे, बल्कि दावा कर रहे थे कि "मुसलमानों की जितनी तादाद जुमे में आती है अगर उतनी तादाद फ़ज्र की नमाज़ में आने लगे तो मुसलमानों को ग़लबा नसीब हो जाएगा।" इस पर एक साहब ने तब्सिरा करते हुए कहा कि "ये...
बेहतरीन लीडर
लीडर वो होता है जिसमें सही रहनुमाई करने की अहलियत और सलाहियत होती है। हम इस बात को इस तरह भी कह सकते हैं कि लीडर के अन्दर वो आला दर्जे की ज़हानत, मामला फ़हमी, मर्दम-शनासी होती है जिसके ज़रिए वो फ़ैसला लेने और क़ाफ़िले को अपने नज़रिये और फ़िक्र...
इक़बाल : ब-जलाले-तू कि दर दिले-दिगर आरज़ू नदारम।
ब-जलाले-तू कि दर दिले-दिगर आरज़ू नदारम। ब-जुज़ ईं दुआ कि बख़्शी ब-कबूतराँ उक़ाबे।। तर्जमा : (ऐ मेरे रब) तेरे जलाल की क़सम मेरे दिल में इसके सिवा कोई और आरज़ू नहीं है, सिवाय इस दुआ के कि ऐ अल्लाह तू मेरी क़ौम के इन कबूतरों (नौजवानों) को उक़ाबी शान अता...
समाज का अख़लाक़ी दिवालिया
अगर हम ये मानते हैं कि समाज से अख़लाक़ का दिवालिया निकल गया है, अगर हम ये मानते हैं कि मुल्क ज़ुल्म, जब्र व इस्तिब्दाद (अत्याचार और अनाचार) की राह पर गामज़न (चल निकला) है, अगर हम ये मानते हैं कि इंसानों की शख़्सी आज़ादी को ख़तरा लाहिक़ हो गया...
क़ुर्बानी का गोश्त
घर पर कुछ मेहमान आने वाले थे तो उनकी मेहमान-नवाज़ी में गोश्त की ज़रूरत महसूस हुई। मैं अपने एक क़स्साब दोस्त की दुकान पर गया तो देखा कि दुकान बन्द है। मैंने उनको फ़ोन मिलाया और पूछा कि भाई आपकी दुकान नहीं खुली है, तबीअत वग़ैरा तो ठीक है न?...
मुखिया जी की छड़ी
नदी किनारे एक गाँव था। इस गाँव में कोई स्कूल नहीं था। गाँव के लोग अगर अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते तो गाँव से 10 किलो मीटर दूर एक क़स्बे में या किसी नामचीन शहर में भेजते थे। एक बार एक ऐसे शख़्स को उस गाँव का मुखिया बनाया गया...
इस्लाम के नज़दीक हक़ीक़ी आज़ादी
इस्लाम के नज़दीक हक़ीक़ी आज़ादी ये है कि इन्सान अपने ही जैसे दूसरे इन्सानों से और उनके बनाए हुए ग़लत उसूलों से, ग़लत रीति-रिवाजों से, यहाँ तक कि अपने मन की ग़लत इच्छाओं की ग़ुलामी से नजात हासिल करके ख़ुद अपनी मर्ज़ी से एक अल्लाह की ग़ुलामी इख़्तियार कर ले।...
आज़ादी क्या है?
इन्सान आज भी है ग़ुलामी के सर-निगूँ ये और बात है कि हल्क़े बदल गए।। इन्सानों से कटकर स्पेस में रहने का नाम आज़ादी नहीं है, आज़ादी नाम है इन्सानों को अपने दरम्यान स्पेस देने का। अपनी मर्ज़ी से कहीं भी, कुछ भी करते चले जाने का नाम आज़ादी नहीं...
Aazadi aur Ghulami
आज़ादी और ग़ुलामी आज़ादी इन्सान की फ़ितरी ख़ाहिश और दिल की आवाज़ है। हर इन्सान आज़ाद रहना चाहता है, आज़ादी से सोचना चाहता है, आज़ादी से खाना और पहनना चाहता है। लेकिन क्या हक़ीक़त में इन्सान आज़ाद है? ज़रा सोचिये क्या इन्सान ख़ुद अपनी मर्ज़ी से पैदा हुआ है? क्या...
