जिस तरह सूरज के ग़ुरूब होने की सूरत में अँधेरा छा जाता है और फिर उस अँधेरे को दूर करने के लिये हमें चाँद की ज़रूरत पेश आती है जो कि ख़ुद सूरज की रौशनी से ही रौशन रहता है। और जब चाँद की भी रौशनी न हो तो हम...
जिस तरह
जिस तरह अमानत के तौर पर रखे हुए माल में ख़ियानत करने से इन्सान के ऊपर से भरोसा उठ जाता है जिससे इन्सानी समाज में एक तरह का फ़साद बरपा हो जाता है। उसी तरह लोगों के दरम्यान राज़ की बातें भी अमानत होती हैं, जिनमें ख़ियानत करने से चुग़ली...
जिस तरह
जिस तरह दीमक लकड़ी को खाकर मिट्टी में तब्दील कर देती है; उसी तरह दिल में बुग़्ज़ और हसद वो दीमक है जो इन्सान की नेकियों को खाकर उसकी शख़्सियत को ख़ाक में तब्दील कर देती है, लिहाज़ा जिस तरह लकड़ी को दीमक से बचाने के लिये एंटी-टर्माइट ट्रीटमेंट की...
जिस तरह
जिस तरह आग लकड़ी को जलाकर राख में तब्दील कर देती है; उसी तरह ग़ुस्सा इन्सान की शख़्सियत को जलाकर राख बना देता है। लिहाज़ा जिस तरह लकड़ी को आग से बचाने के लिये फ़्लेम रिटार्डेंट पेंट और कोटिंग्स (additives based on phosphorus or nitrogen compounds) की ज़रूरत होती है,...
जिस तरह
जिस तरह पेट में खाना हज़म न होने की सूरत में बहुत-सी बीमारियाँ पैदा होती हैं। उसी तरह तारीफ़ के हज़म न होने की सूरत में ग़ुरूर व तकब्बुर जैसी बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं। लिहाज़ा ज़रूरी है कि किसी की बेजा-तारीफ़ न की जाए और अगर आपके किसी काम...
उलमा ज़मीन के चराग़
इस बात में कोई शक नहीं है कि उलमाए-किराम ज़मीन के चराग़ ओर अंबिया के क़ायम मक़ाम हैं। [العلماء مصابیح الارض وخلفاء الانبیاء] हम सब को इस हक़ीक़त का भी ऐतिराफ़ करना चाहिये कि आज दुनिया में दीनी इक़दार (Values) और इस्लामी तहज़ीब व सक़ाफ़त की जो क़िन्दीलें रौशन हैं...
नौजवानों और उलमा के दरम्यान गैप को दूर करना होगा
मुसलमानों की बदतर सूरते-हाल के लिये जो बातें ज़िम्मेदार हैं उनमें से एक ये भी है कि मुस्लिम नौजवानों और उलमा व दानिशवरों के दरम्यान हम-आहंगी पैदा नहीं हो पा रही है। सबसे पहला और बहुत बड़ा मसला तो हमारे उलमा और दानिशवर हज़रात के साथ है और वो ये...
सलाहियत (Competency) और सालेहियत (Righteousness)
सलाहियत और सालेहियत ये दो ऐसी ख़ूबियाँ हैं जो इन्सानी शख़्सियत को परवान चढ़ाने में बड़ा ही अहम रोल अदा करती हैं। दुनिया में जितनी भी रौनक़ें पाई जाती हैं वो सब सलाहियत की बुनियाद पर ही पाई जाती हैं और दुनिया में जितनी भी इन्सानी और अख़लाक़ी इक़दार (Human...
इन्सानियत के लिये एक फ़ितरी निज़ाम
किसी भी मुल्क या समाज को बुरे अंजाम से अगर कोई चीज़ बचा सकती है तो वो ये है कि कोई गरोह ऐसा निज़ामे-फ़िक्र-व-अमल लेकर उठे जिसमें आला दर्जे की रूहानी और अख़लाक़ी क़द्रें हों, सच्चाई पर आधारित इज्तिमाई इन्साफ़ हो, महज़ सियासी क़िस्म की नहीं बल्कि असली जम्हूरियत (Real...
पॉज़िटिव “मैं” और नेगेटिव “मैं”
"मैं हूँ" मैं हूँ का यक़ीन इन्सान के अन्दर अपने होने का वो पॉज़िटिव सेन्स डेवेलप करता है, जिससे इन्सान न सिर्फ़ अपने-आपको बना, सँवार और उभार सकता है, बल्कि अपने-आपको ख़ुद अपने क़ाबिल और दुनिया के क़ाबिल भी बना सकता है। "मैं ही हूँ" जबकि "मैं ही हूँ" का...