Haiz k dauran Quran padhna

*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी...

Hadees

हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों...

Mahauliyati bohran aur Islam

*माहौलियाती बोहरान और इस्लाम* अल्लाह तआला ने इस पूरी कायनात को हिकमत और ख़ूबसूरती के साथ पैदा किया है। ये कायनात एक बाग़ की तरह है और अल्लाह इस बाग़ का माली है। इस बाग़ में हर चीज़ तरतीब, सलीक़े और एतिदाल (संतुलन) के साथ रखी गई है। आप क़ुरआन...

jo deta hai wahi jeeta hai

जो देता है, वही जीता है एक समय की बात है, एक हरे-भरे जंगल में एक बड़ा और ख़ूबसूरत सा आम का पेड़ था, जिसका नाम “असख़िया” था। उसकी घनी शाख़ाएँ बादलों को छूती मालूम होती थीं, और उसकी चौड़ी, सायादार टहनियाँ मानो किसी को भी अपनी आग़ोश में लेने...

Hoor

*हूर* इस्लाम में "हूर" का तसव्वुर एक वसीअ और गहरा मअनी रखता है, जिसे अक्सर महज़ ज़ाहिरी हुस्न व जमाल के तनाज़ुर में पेश किया जाता है, हालाँकि इसका ताल्लुक़ सिर्फ़ जिस्मानी ख़ूबसूरती से नहीं, बल्कि रूहानी पाकीज़गी, ज़ेहनी तहारत और अख़लाक़ी बुलंदी से है। हमारे समाज में एक बहुत...

Masjid sey Bazar tak Part-2 : Bazar sey Rab tak

*मस्जिद से बाज़ार तक — पार्ट-2 : बाज़ार से रब तक* ज़ैद की ज़िन्दगी अब एक नई राह पर थी। अब वो पहले जैसा नहीं रहा था। वो जान चुका था कि अल्लाह को सिर्फ़ सज्दों की ज़रूरत नहीं है, वह देखना चाहता है कि उसके बन्दे इस दुनिया में...

Masjid sey Bazar tak

मस्जिद से बाज़ार तक ज़ैद एक बहुत ही नेक, इबादत गुज़ार, और ज़िक्र व अज़कार का पाबंद इंसान था। पाँच वक़्त की नमाज़ों के साथ-साथ तहज्जुद, इशराक़, अव्वाबीन जैसी नफ़्ल नमाज़ों की पाबन्दी उसके लिये ऐसे ही थी जैसे जिस्म के लिए रूह। रमज़ान उसके लिये महज़ एक महीना नहीं,...

Khaire Ummat

मुसलमानों की सबसे बड़ी ख़ूबी उनका एक बा-मक़सद 'उम्मत' और 'ख़ैरे-उम्मत' होना है, न कि दूसरी क़ौमों की तरह महज़ एक क़ौम होना। जब तक मुसलमान अपनी इस शनाख़्त (Identity) को ज़िन्दा और बहाल नहीं करेंगे, तब तक मसायल इनको इसी तरह चिमटे रहेंगे। मसायल के हल के लिये दानिशवरों...

Zawal ki shikar qomein

ज़वाल की शिकार क़ौमें ---   ---   --- हक़ीक़त ये है कि किसी नज़रिये और फ़िक्र पर वुजूद में आनेवाली क़ौमें अपने शुरूआती ज़माने में हिम्मत, मेहनत और जाँफ़िशानी से काम लेकर अपने लिये बुलन्द मक़ाम पैदा करती हैं और तरक़्क़ी की मंज़िलें तय करती हैं। फिर आने वाली नस्लें अपने...