अज़मते-रसूल (सल्ल०)
तक़रीबन तमाम ही नबियों के साथ ये हादिसा पेश आया है कि उनके बारे में लोग दो तरह की गुमराही में मुब्तिला हुए हैं. पहली गुमराही तो यह कि लोगों ने उनको ये कहकर मानने से इनकार कर दिया कि “तुम कुछ नहीं हो मगर वैसे ही इन्सान जैसे हम हैं. (देखें क़ुरान, 14:10; 21:3; 23:24, 33) या यह कि, “ये कैसा रसूल है जो खाना खाता है और बाज़ारों में चलता-फिरता है? क्यों न इसके पास कोई फ़रिश्ता भेजा गया जो इसके साथ रहता और (न माननेवालों को) धमकाता? या और कुछ नहीं तो उसके लिए कोई ख़ज़ाना ही उतार दिया जाता, या उसके पास कोई बाग़ ही होता जिससे ये (इत्मीनान की) रोज़ी हासिल करता.” (क़ुरआन, 25:7) तो “क्या ये इंसान हमें हिदायत देंगे?” (64:6) हालाँकि अल्लाह ने इस बात को वाज़ेह कर दिया कि अगर हम इनकी हिदायत के लिए फ़रिश्ते उतार देते तो उन पर ये एतिराज़ करते कि ये तो Super Natural ताक़तें रखते हैं हम इनकी इत्तिबा कैसे कर सकते हैं?
दूसरी क़िस्म की गुमराही यह थी कि नबियों के इस दुनिया से रुख़सत हो जाने के बाद यह अक़ीदा घड़ लिया जाता कि नबी आम इंसानों की तरह कोई इंसान नहीं हो सकता है? नबी तो आम इंसानों से बालातर (Super natural ताक़त रखनेवाली) कोई और मख़लूक़ होती है. इसलिए रसूलों का मर्तबा ख़ुदा तक जा मिलाया.
यह दूसरी क़िस्म की गुमराही पहली के मुक़ाबले ज़्यादा तबाह्कुन साबित हुई है. हालाँकि अल्लाह ने अपनी किताब में इस सिलसिले में वाज़ेह तौर पर इरशाद फ़रमा दिया कि हमने दुनिया में जितने भी नबी भेजे वे सब आम इंसानों ही की तरह खाना खाते और आम इंसानों ही की तरह बाज़ारों में चलते-फिरते थे. (25:20) एक दूसरी जगह है कि “रसूलों ने कहा कि वाक़ई हम कुछ नहीं हैं, मगर तुम ही जैसे इंसान. लेकिन अल्लाह अपने बन्दों में से जिसको चाहता है नवाज़ता है.” (14:11; 41:6) मुहम्मद (सल्ल०) से कहा कि “ऐ नबी, कहो कि मैं तो एक इन्सान हूँ तुम ही जैसा, मेरी तरफ़ वह्य की जाती है.” और यह भी कि “मुहम्मद (सल्ल०) इसके सिवा कुछ नहीं कि बस एक रसूल हैं, उनसे पहले और रसूल भी गुज़र चुके हैं, फिर क्या अगर वे (इंसान होने की हैसियत से) मर जाएँ या क़त्ल कर दिए जाएँ तो क्या तुम उलटे पाँव फिर जाओगे?” (3:144)
लोग इस मामले में इतने आगे बढ़े कि यहाँ तक कहने लगे कि अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल०) से ख़ुद बेपर्दा होकर आमने-सामने बात की. हालाँकि क़ुरआन इसकी खुल्लमखुल्ला तरदीद करता है, कहता है कि “किसी इन्सान का यह मक़ाम नहीं है कि अल्लाह उससे रूबरू बात करे. उसकी बात या तो वह्य के तौर पर होती है, या परदे के पीछे से या फिर कोई पैग़ाम्बर (फ़रिश्ता) भेजता है और वह उसके हुक्म से जो कुछ वह चाहता है वह्य करता है, वह बरतर और हकीम है.” (42:5)
फिर सवाल पैदा होता है कि नबी की सही माने में अज़मत क्या है?
यूँ तो नबी की अज़मत का सही-सही मर्तबा सिर्फ़ अल्लाह ही जान सकता है इन्सान तो हमेशा इफ़रात और तफ़रीत का ही शिकार रहेगा, लेकिन इन्सान ने इन्सान की अज़मत को पहचानने का पैमाना उसके कारनामों को मुतैय्यन किया है, यानी जिस इन्सान का कारनामा जितना बुलन्द होगा उसकी अज़मत भी उतनी ही बुलन्द होगी।
नबी ख़ैरुल-बशर होते हैं तो इसकी वजह यह नहीं है कि वे बालाई ताक़त के बल पर कुछ ख़ास क़िस्म के मोजिज़े कर दिखाते हैं बल्कि उनकी अज़मत अस्ल में इस बुनियाद पर होती है कि वे अल्लाह की मदद से दुनिया का सबसे अज़ीम काम अंजाम देते हैं। इस एतिबार से प्यारे नबी (सल्ल०) की अज़मत के कई पहलू हमें नज़र आते हैं.
प्यारे नबी मुहम्मद (सल्ल०) की अज़मत का एक पहलू तो ये है कि आपने 23 साल की छोटी-सी मुद्दत में अरब के उजड्ड और बद्दू क़िस्म के लोगों को जाहिलियत के घटा टोप अँधेरे से निकाल कर हक़ की रौशनी में ला खड़ा किया और उनके ज़रिए दुनिया में एक ऐसा अज़ीमुश्शान इंक़िलाब बरपा कर दिखाया जिसने पूरी इन्सानी तारीख़ का रुख़ बदलकर रख दिया. इस एतिबार से नबी (सल्ल०) की अज़मत सिर्फ़ ये नहीं है कि वे ख़ुद बहुत अज़ीम थे बल्कि उनकी अज़मत का इससे भी ऊँचा मक़ाम ये है कि उन्होंने अज़ीम लोगों की एक ऐसी नर्सरी तैयार की जिसमें अबू-बक्र, उमर, उस्मान और अली (रज़ि०) जैसे इन्तिहाई ख़ुशबूदार फूलों के अलावा सैंकड़ों क़िस्म के रंग-बिरंगे ख़ूबसूरत फूल खिले जिन्होंने समाज रूपी चमन को सिर्फ़ मुअत्तर ही नहीं किया बल्कि दिलकश भी बनाया.
प्यारे नबी मुहम्मद (सल्ल०) की अज़मत का एक पहलू ये है कि आप सिर्फ़ मज़हबी रहनुमा नहीं थे जिन्होंने इंसानों को इबादत की चन्द रस्में अदा करके अपने ख़ुदा को राज़ी करने के नुस्ख़े बता दिए हों, बल्कि आप (सल्ल०) एक सियासी रहनुमा भी हैं जिन्होंने कमाल सूझबूझ से हुकूमत और सियासत करने के उसूल न सिर्फ़ बनाए बल्कि उनको लागू करके भी दिखाया. दुनिया की तारीख़ में इस बुलंद दर्जे अज़मत का इन्सान आपको एक भी नहीं मिल सकता कि जिसने नज़रियात सिर्फ़ पेश ही नहीं किए बल्कि उनको लागू करके भी दिखाया।
फिर मुहम्मद (सल्ल०) की अज़मत का एक नुमायाँ पहलू ये भी है कि आपको अल्लाह ने एक ऐसी इंक़िलाब अंगेज़ किताब (मोजिज़ा या चमत्कार) अता की जो रहती दुनिया तक के लिए माफ़ूज़ भी है क़ियामत तक पैदा होने वाले तमाम इंसानों की मुकम्मल हिदायत के लिए काफ़ी है। इससे पहले नबियों को जो मोजिज़े अता किए गए वे उन्हीं की ज़ात तक महदूद रहे.
प्यारे नबी (सल्ल०) की अज़मत को जाननेवालों और सच्चे आशिक़ाने-रसूल का फ़र्ज़ है कि आप (सल्ल०) के कारनामों को याद करें और उसी नक़्शे-क़दम पर चलते हुए आप (सल्ल०) के मिशन को पूरा करने की उसी नहज पर जिद्दो-जुहद करने के लिए खड़े हों जो आप (सल्ल०) छोड़ कर गए हैं ताकि दुनिया के अन्दर अम्न व सलामती क़ायिम हो सके.