Naujawanon aur Ulama k beech ham-aahangi

Naujawanon aur Ulama k beech ham-aahangi

नौजवानों और उलमा के बीच हम-आहंगी

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मुसलमानों की बदतर सूरते-हाल के लिये जो बातें ज़िम्मेदार हैं उनमें से एक ये भी है कि मुस्लिम नौजवानों और उलमा व दानिशवरों के दरम्यान हम-आहंगी पैदा नहीं हो पा रही है। एक मसला तो मुस्लिम नौजवानों के साथ है और वो ये कि वो अपने ज़ेहन में उठनेवाले सवालात को सलीक़े से रखने की जुरअत ही नहीं कर पाते। ज़ेहनों में उठनेवाले सवालों को वो अपने सीनों में दबाए फिरते रहते हैं, जिसका नतीजा या तो बे-रूह मज़हबियत की शक्ल में हमारे सामने है या फिर इस्लाम से रद्दे-अमल के तौर पर। और हमारे नज़दीक ये दोनों ही नतायज दीने-इस्लाम और ख़ुद मुसलमानों के लिये किसी तौर मुनासिब नहीं हैं।

दूसरा मसला हमारे उलमा और दानिशवर हज़रात के साथ है और वो ये कि वो अपने इल्मी पिन्दार में गर्दनें अकड़ाए हुए नौजवानों से दूर हैं। वो नौजवानों के ज़ेहनों में उठनेवाले सवालों का जवाब देकर उन्हें मुत्मइन करने के बजाय उनके सवालों को सुनने तक गवारा नहीं करते। अगर सुन लें तो उस ज़बान में जवाब देते हैं जो ज़बान उनको समझ ही में नहीं आती। जवाब देने में दलायल की जो धार और लबो-लहजे में जो लोच नौजवानों को दरकार होता है वो उससे यकसर महरूम रहते हैं। नतीजा इस अमल का भी उन्हीं दो शक्लों में ज़ाहिर होता है जो ऊपर बयान किया गया।

अगर हम इस्लाम की तस्वीर को दुरुस्त करने के लिये मुख़लिस हैं और मुसलमानों की हालत को बहैसियत एक “बेहतरीन उम्मत” दुरुस्त करना चाहते हैं तो नौजवानों और अहले-इल्म के दरम्यान के इस गैप को दूर करना होगा। अगर ये गैप दूर होता नज़र न आए (जैसा कि हम महसूस भी कर रहे हैं कि ये काम बहुत मुश्किल, बल्कि तक़रीबन नामुमकिन सा मालूम होता है) तो फिर इस सिलसिले में मुस्लिम नौजवानों को ख़ुद ही आगे आना होगा। बड़ी-बड़ी कॉन्फ़्रेंसों, सेमिनारों और इज्तिमाआत से बेज़ारी का ऐलान करके मैदान में उतर कर नौजवानों के दरम्यान बैठकर उनके अक़ीदों को दुरुस्त करके उन्हें एक बेहतरीन क़िस्म का इन्सान बनने की तरफ़ मुतवज्जेह करना होगा। इस मामले में जो साहिबे-इल्म-व-दानिश साथ दें और अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए आगे आएँ तो ठीक, वगरना ख़ुद ही इस मशाल को लेकर उठने की ज़रूरत है।

यक़ीन कीजिये कि इस सिलसिले में अल्लाह की किताब क़ुरआन हमारी हिदायत व रहनुमाई के लिये काफ़ी है।

One of the major reasons behind the deplorable condition of Muslims today is the growing disconnect between Muslim youth and scholars/intellectuals.

The first issue lies with the youth — they often lack the courage to articulate the questions and doubts that arise in their minds with clarity and respect. They carry these internal questions silently, never voicing them. As a result, we either see a form of soulless religiosity, or, on the other hand, a reactionary rejection of Islam itself.

Both of these outcomes, in our view, are deeply harmful — not only to the message of Islam but also to the identity and well-being of Muslims themselves.

The second issue lies with our scholars and intellectuals — many of them, consumed by academic pride and formality, remain distant from the concerns of youth. They are often unwilling to even hear the questions that arise in young minds. And if they do respond, they speak in a language and tone that the youth simply cannot relate to or comprehend.

The kind of clarity, logic, and compassionate tone that youth yearn for is sorely missing in these responses. And so, once again, we arrive at the same two outcomes: either dry traditionalism or alienation from Islam.

If we are genuinely committed to correcting the image of Islam and improving the condition of Muslims as a “best nation raised for mankind,” then we must bridge this gap between the scholars and the youth.

And if this gap does not appear to be closing — as it certainly seems like a daunting, nearly impossible task — then Muslim youth themselves must rise to the occasion.

They must turn away from hollow conferences and formal seminars, and instead enter the field, sit among their peers, correct their beliefs, and guide them toward becoming better human beings — morally, spiritually, and intellectually.

If any sincere scholar or intellectual joins them in this mission, understanding the gravity of their responsibility, then all the better. Otherwise, the youth must carry this torch themselves.

And rest assured — in this journey, the Book of Allah, the Noble Qur’an, is sufficient for our guidance and leadership.

مسلمانوں کی زبوں حالی اور بدترین صورتِ حال کی وجوہات میں ایک بڑی وجہ یہ بھی ہے کہ مسلم نوجوانوں اور علماء و دانشوروں کے درمیان ہم آہنگی اور رابطے کا فقدان ہے۔

ایک مسئلہ تو مسلم نوجوانوں کے ساتھ ہے، اور وہ یہ کہ وہ اپنے ذہنوں میں اٹھنے والے سوالات کو سلیقے سے پیش کرنے کی جرأت ہی نہیں کر پاتے۔ ان کے ذہنوں میں پیدا ہونے والے شکوک و سوالات ان کے سینوں میں دبے رہتے ہیں، جس کا نتیجہ یا تو بےروح مذہبیت کی صورت میں سامنے آتا ہے، یا پھر اسلام سے ردِعمل کی شکل میں۔

ہمارے نزدیک یہ دونوں صورتیں نہ صرف اسلام کے لیے ناموزوں ہیں بلکہ خود مسلمانوں کے حق میں بھی نقصان دہ ہیں۔

دوسرا مسئلہ ہمارے علماء و دانشور حضرات کے ساتھ ہے، اور وہ یہ کہ وہ اپنے علمی تکبر میں گردنیں اکڑائے نوجوانوں سے دور ہوتے چلے جا رہے ہیں۔ وہ نوجوانوں کے ذہنی خلجان اور سوالات کو سننا بھی گوارا نہیں کرتے، اور اگر سن بھی لیں تو ایسی زبان میں جواب دیتے ہیں جو نوجوانوں کی فہم سے باہر ہوتی ہے۔

دلائل میں تاثیر اور اندازِ گفتگو میں جو نرمی اور قربت نوجوانوں کو درکار ہوتی ہے، وہ ان سے یکسر محروم رہتے ہیں۔ نتیجتاً، یہی دو ہی راستے وجود میں آتے ہیں: یا تو بےروح تقلید، یا پھر اسلام سے بیزاری۔

اگر ہم واقعی اسلام کے تشخص کو درست کرنا چاہتے ہیں اور مسلمانوں کو ایک “بہترین امت” کی حیثیت سے بحال کرنا چاہتے ہیں، تو علماء اور نوجوانی کے درمیان اس خلیج کو پر کرنا ہوگا۔

اگر یہ خلیج پُر ہوتی نظر نہ آئے — جیسا کہ بظاہر یہی لگتا ہے کہ یہ کام مشکل ہی نہیں، بلکہ تقریباً ناممکن ہے — تو پھر مسلم نوجوانوں کو خود آگے آنا ہوگا۔

بڑی بڑی کانفرنسوں، سیمیناروں اور رسمی اجتماعات سے بیزاری کا اعلان کر کے، عملی میدان میں آنا ہوگا — نوجوانوں کے بیچ بیٹھ کر ان کے عقائد کی اصلاح کرنا ہوگی، اور انہیں ایک باکردار، باعمل اور باعزت انسان بنانے کی طرف متوجہ کرنا ہوگا۔

اگر اس مشن میں کوئی صاحبِ علم و فہم ساتھ دے اور اپنی ذمہ داری سمجھتے ہوئے آگے آئے تو بہت خوب، ورنہ یہ مشعل خود اٹھانا ہوگی۔

یقین رکھیے! اس راستے میں اللہ کی کتاب، قرآنِ مجید ہی ہماری ہدایت اور رہنمائی کے لیے کافی ہے۔

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नौजवानों और उलमा के बीच हम-आहंगी

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मुसलमानों की बदतर सूरते-हाल के लिये जो बातें ज़िम्मेदार हैं उनमें से एक ये भी है कि मुस्लिम नौजवानों और उलमा व दानिशवरों के दरम्यान हम-आहंगी पैदा नहीं हो पा रही है। एक मसला तो मुस्लिम नौजवानों के साथ है और वो ये कि वो अपने ज़ेहन में उठनेवाले सवालात को सलीक़े से रखने की जुरअत ही नहीं कर पाते। ज़ेहनों में उठनेवाले सवालों को वो अपने सीनों में दबाए फिरते रहते हैं, जिसका नतीजा या तो बे-रूह मज़हबियत की शक्ल में हमारे सामने है या फिर इस्लाम से रद्दे-अमल के तौर पर। और हमारे नज़दीक ये दोनों ही नतायज दीने-इस्लाम और ख़ुद मुसलमानों के लिये किसी तौर मुनासिब नहीं हैं।

दूसरा मसला हमारे उलमा और दानिशवर हज़रात के साथ है और वो ये कि वो अपने इल्मी पिन्दार में गर्दनें अकड़ाए हुए नौजवानों से दूर हैं। वो नौजवानों के ज़ेहनों में उठनेवाले सवालों का जवाब देकर उन्हें मुत्मइन करने के बजाय उनके सवालों को सुनने तक गवारा नहीं करते। अगर सुन लें तो उस ज़बान में जवाब देते हैं जो ज़बान उनको समझ ही में नहीं आती। जवाब देने में दलायल की जो धार और लबो-लहजे में जो लोच नौजवानों को दरकार होता है वो उससे यकसर महरूम रहते हैं। नतीजा इस अमल का भी उन्हीं दो शक्लों में ज़ाहिर होता है जो ऊपर बयान किया गया।

अगर हम इस्लाम की तस्वीर को दुरुस्त करने के लिये मुख़लिस हैं और मुसलमानों की हालत को बहैसियत एक “बेहतरीन उम्मत” दुरुस्त करना चाहते हैं तो नौजवानों और अहले-इल्म के दरम्यान के इस गैप को दूर करना होगा। अगर ये गैप दूर होता नज़र न आए (जैसा कि हम महसूस भी कर रहे हैं कि ये काम बहुत मुश्किल, बल्कि तक़रीबन नामुमकिन सा मालूम होता है) तो फिर इस सिलसिले में मुस्लिम नौजवानों को ख़ुद ही आगे आना होगा। बड़ी-बड़ी कॉन्फ़्रेंसों, सेमिनारों और इज्तिमाआत से बेज़ारी का ऐलान करके मैदान में उतर कर नौजवानों के दरम्यान बैठकर उनके अक़ीदों को दुरुस्त करके उन्हें एक बेहतरीन क़िस्म का इन्सान बनने की तरफ़ मुतवज्जेह करना होगा। इस मामले में जो साहिबे-इल्म-व-दानिश साथ दें और अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए आगे आएँ तो ठीक, वगरना ख़ुद ही इस मशाल को लेकर उठने की ज़रूरत है।

यक़ीन कीजिये कि इस सिलसिले में अल्लाह की किताब क़ुरआन हमारी हिदायत व रहनुमाई के लिये काफ़ी है।

One of the major reasons behind the deplorable condition of Muslims today is the growing disconnect between Muslim youth and scholars/intellectuals.

The first issue lies with the youth — they often lack the courage to articulate the questions and doubts that arise in their minds with clarity and respect. They carry these internal questions silently, never voicing them. As a result, we either see a form of soulless religiosity, or, on the other hand, a reactionary rejection of Islam itself.

Both of these outcomes, in our view, are deeply harmful — not only to the message of Islam but also to the identity and well-being of Muslims themselves.

The second issue lies with our scholars and intellectuals — many of them, consumed by academic pride and formality, remain distant from the concerns of youth. They are often unwilling to even hear the questions that arise in young minds. And if they do respond, they speak in a language and tone that the youth simply cannot relate to or comprehend.

The kind of clarity, logic, and compassionate tone that youth yearn for is sorely missing in these responses. And so, once again, we arrive at the same two outcomes: either dry traditionalism or alienation from Islam.

If we are genuinely committed to correcting the image of Islam and improving the condition of Muslims as a “best nation raised for mankind,” then we must bridge this gap between the scholars and the youth.

And if this gap does not appear to be closing — as it certainly seems like a daunting, nearly impossible task — then Muslim youth themselves must rise to the occasion.

They must turn away from hollow conferences and formal seminars, and instead enter the field, sit among their peers, correct their beliefs, and guide them toward becoming better human beings — morally, spiritually, and intellectually.

If any sincere scholar or intellectual joins them in this mission, understanding the gravity of their responsibility, then all the better. Otherwise, the youth must carry this torch themselves.

And rest assured — in this journey, the Book of Allah, the Noble Qur’an, is sufficient for our guidance and leadership.

مسلمانوں کی زبوں حالی اور بدترین صورتِ حال کی وجوہات میں ایک بڑی وجہ یہ بھی ہے کہ مسلم نوجوانوں اور علماء و دانشوروں کے درمیان ہم آہنگی اور رابطے کا فقدان ہے۔

ایک مسئلہ تو مسلم نوجوانوں کے ساتھ ہے، اور وہ یہ کہ وہ اپنے ذہنوں میں اٹھنے والے سوالات کو سلیقے سے پیش کرنے کی جرأت ہی نہیں کر پاتے۔ ان کے ذہنوں میں پیدا ہونے والے شکوک و سوالات ان کے سینوں میں دبے رہتے ہیں، جس کا نتیجہ یا تو بےروح مذہبیت کی صورت میں سامنے آتا ہے، یا پھر اسلام سے ردِعمل کی شکل میں۔

ہمارے نزدیک یہ دونوں صورتیں نہ صرف اسلام کے لیے ناموزوں ہیں بلکہ خود مسلمانوں کے حق میں بھی نقصان دہ ہیں۔

دوسرا مسئلہ ہمارے علماء و دانشور حضرات کے ساتھ ہے، اور وہ یہ کہ وہ اپنے علمی تکبر میں گردنیں اکڑائے نوجوانوں سے دور ہوتے چلے جا رہے ہیں۔ وہ نوجوانوں کے ذہنی خلجان اور سوالات کو سننا بھی گوارا نہیں کرتے، اور اگر سن بھی لیں تو ایسی زبان میں جواب دیتے ہیں جو نوجوانوں کی فہم سے باہر ہوتی ہے۔

دلائل میں تاثیر اور اندازِ گفتگو میں جو نرمی اور قربت نوجوانوں کو درکار ہوتی ہے، وہ ان سے یکسر محروم رہتے ہیں۔ نتیجتاً، یہی دو ہی راستے وجود میں آتے ہیں: یا تو بےروح تقلید، یا پھر اسلام سے بیزاری۔

اگر ہم واقعی اسلام کے تشخص کو درست کرنا چاہتے ہیں اور مسلمانوں کو ایک “بہترین امت” کی حیثیت سے بحال کرنا چاہتے ہیں، تو علماء اور نوجوانی کے درمیان اس خلیج کو پر کرنا ہوگا۔

اگر یہ خلیج پُر ہوتی نظر نہ آئے — جیسا کہ بظاہر یہی لگتا ہے کہ یہ کام مشکل ہی نہیں، بلکہ تقریباً ناممکن ہے — تو پھر مسلم نوجوانوں کو خود آگے آنا ہوگا۔

بڑی بڑی کانفرنسوں، سیمیناروں اور رسمی اجتماعات سے بیزاری کا اعلان کر کے، عملی میدان میں آنا ہوگا — نوجوانوں کے بیچ بیٹھ کر ان کے عقائد کی اصلاح کرنا ہوگی، اور انہیں ایک باکردار، باعمل اور باعزت انسان بنانے کی طرف متوجہ کرنا ہوگا۔

اگر اس مشن میں کوئی صاحبِ علم و فہم ساتھ دے اور اپنی ذمہ داری سمجھتے ہوئے آگے آئے تو بہت خوب، ورنہ یہ مشعل خود اٹھانا ہوگی۔

یقین رکھیے! اس راستے میں اللہ کی کتاب، قرآنِ مجید ہی ہماری ہدایت اور رہنمائی کے لیے کافی ہے۔

नौजवानों और उलमा के बीच हम-आहंगी

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मुसलमानों की बदतर सूरते-हाल के लिये जो बातें ज़िम्मेदार हैं उनमें से एक ये भी है कि मुस्लिम नौजवानों और उलमा व दानिशवरों के दरम्यान हम-आहंगी पैदा नहीं हो पा रही है। एक मसला तो मुस्लिम नौजवानों के साथ है और वो ये कि वो अपने ज़ेहन में उठनेवाले सवालात को सलीक़े से रखने की जुरअत ही नहीं कर पाते। ज़ेहनों में उठनेवाले सवालों को वो अपने सीनों में दबाए फिरते रहते हैं, जिसका नतीजा या तो बे-रूह मज़हबियत की शक्ल में हमारे सामने है या फिर इस्लाम से रद्दे-अमल के तौर पर। और हमारे नज़दीक ये दोनों ही नतायज दीने-इस्लाम और ख़ुद मुसलमानों के लिये किसी तौर मुनासिब नहीं हैं।

दूसरा मसला हमारे उलमा और दानिशवर हज़रात के साथ है और वो ये कि वो अपने इल्मी पिन्दार में गर्दनें अकड़ाए हुए नौजवानों से दूर हैं। वो नौजवानों के ज़ेहनों में उठनेवाले सवालों का जवाब देकर उन्हें मुत्मइन करने के बजाय उनके सवालों को सुनने तक गवारा नहीं करते। अगर सुन लें तो उस ज़बान में जवाब देते हैं जो ज़बान उनको समझ ही में नहीं आती। जवाब देने में दलायल की जो धार और लबो-लहजे में जो लोच नौजवानों को दरकार होता है वो उससे यकसर महरूम रहते हैं। नतीजा इस अमल का भी उन्हीं दो शक्लों में ज़ाहिर होता है जो ऊपर बयान किया गया।

अगर हम इस्लाम की तस्वीर को दुरुस्त करने के लिये मुख़लिस हैं और मुसलमानों की हालत को बहैसियत एक “बेहतरीन उम्मत” दुरुस्त करना चाहते हैं तो नौजवानों और अहले-इल्म के दरम्यान के इस गैप को दूर करना होगा। अगर ये गैप दूर होता नज़र न आए (जैसा कि हम महसूस भी कर रहे हैं कि ये काम बहुत मुश्किल, बल्कि तक़रीबन नामुमकिन सा मालूम होता है) तो फिर इस सिलसिले में मुस्लिम नौजवानों को ख़ुद ही आगे आना होगा। बड़ी-बड़ी कॉन्फ़्रेंसों, सेमिनारों और इज्तिमाआत से बेज़ारी का ऐलान करके मैदान में उतर कर नौजवानों के दरम्यान बैठकर उनके अक़ीदों को दुरुस्त करके उन्हें एक बेहतरीन क़िस्म का इन्सान बनने की तरफ़ मुतवज्जेह करना होगा। इस मामले में जो साहिबे-इल्म-व-दानिश साथ दें और अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए आगे आएँ तो ठीक, वगरना ख़ुद ही इस मशाल को लेकर उठने की ज़रूरत है।

यक़ीन कीजिये कि इस सिलसिले में अल्लाह की किताब क़ुरआन हमारी हिदायत व रहनुमाई के लिये काफ़ी है।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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