लोगों को भलाई की तरफ़ बुलाने और बुराई से रोकने का काम उस वक़्त तक जारी रहना चाहिए जब तक कि सुननेवाले कान और सोचने-समझनेवाले दिल मौजूद हों और हक़ की क़बूलियत की किसी भी सूरत में बहुत थोड़ी सी भी उम्मीद पाई जाती हो. अगर लोगों तक हक़ को पहुँचाने के तमाम ज़राए ख़त्म हो जाएँ और हक़ को क़बूल करने के तमाम दरवाज़े बन्द हो जाएँ और सूरते-हाल इतनी संगीन हो जाए कि उसका मुक़ाबला करना इंसान की ताक़त और बरदाश्त से बाहर हो तो ऐसी सूरत में मोमिन के लिए सब्र के सिवा कोई और चारा नहीं.
लेकिन सब्र का यहाँ ये मतलब हरगिज़ नहीं है कि मोमिन जी हारकर बैठ जाए, बल्कि सब्र का मतलब ये है कि वह अल्लाह के फ़ैसले का इस तरह इन्तिज़ार करे कि उसका सीना बातिल (झूठ) के ख़िलाफ़ इस तरह उबाल खा रहा हो, जिस तरह आग के ऊपर रखी हुई हांडी में पानी उबाल खाता है. यानी सब्र यह है कि इन बिगड़े हुए हालात को बदल डालने के लिए हिकमत और बुर्दबारी के साथ अनथक कोशिश करे. जो लोग समाज में फैली बुराई को बुराई जानते हैं उन्हें अन्दर ही अन्दर उसे ख़त्म करने के लिए आमादा करे और एक ऐसी जमाअत मुनज़्ज़म करे जिस पर अल्लाह (की मदद) का हाथ हो.