Kya Quran aaj ki Plural society k liye bhi Kitabe-Hidayat hai?

Kya Quran aaj ki Plural society k liye bhi Kitabe-Hidayat hai?

क्या क़ुरआन आज की प्लुरल सोसाइटी के लिये भी किताबे-हिदायत है?

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कुछ लोग मानते हैं कि क़ुरआन नबी के मिशन की रुदाद है, नबी का इन्क़िलाब एक मोजज़ा है और क़ुरआन उस मोजज़े का दस्तावेज़ है। क़ुरआन से इस प्लुरल सोसायटी के लिए कोई हिदायत तलाश करना एक इंपॉसिबल मिशन है। यानी क़ुरआन किताबे-हिदायत सिर्फ़ मुहम्मद (सल्ल०) के लिये थी, मुहम्मद (सल्ल०) के बाद इसकी हैसियत महज़ एक दस्तावेज़ की है और इसे महज़ एक तारीख़ी दस्तावेज़ की हैसियत ही से महफ़ूज़ किया गया है ताकि लोग मुहम्मद (सल्ल०) के उस मोजज़े को महज़ पढ़ते और महज़ूज़ होते रहें।

अगर इस बात को तस्लीम किया जाए तो क़ुरआन पर ईमान लाना, बल्कि इसे अल्लाह की किताब तस्लीम करना ही सिरे से बे-माना है। इसे बार-बार पढ़ना और अपनी इबादात (नमाज़ वग़ैरा) में दोहराते रहना फ़ुज़ूल है, बल्कि इसकी बुनियाद पर किसी मुआशरे की तामीर करना कारे-अबस और मुआशरे की तामीर का सोचना भी दिमाग़ का ख़लल है। इसका मतलब ये होगा कि क़ुरआन न तो कोई तहज़ीब की बुनियाद रखता है और न ही किसी समाज का नक़्शा इन्सान को देता है। ज़ाहिर है फिर इस किताब को (नाउज़ू-बिल्लाह) पढ़ना तो दूर की बात इसे घरों में रखना भी ख़ाह-म-ख़ाह की एक बात है, तारीख़ी दस्तावेज़ की हैसियत से महज़ चन्द लाइब्रेरियों में रखवा दिया जाए और इसके मुख़्तलिफ़ हिस्से करके तारीख़ (History) या सोशल साइंस के सिलेबस के तौर पर कुछ कोर्सेज़ में लगवा दिया जाए। इसकी बुनियाद पर जो क़ौम दुनिया में पाई जाती है उसे तहलील कर दिया जाए। मुसलमान नाम का कोई शख़्स बाक़ी ही क्यों रहे? इस किताब की हैसियत अगर महज़ एक तारीख़ी दस्तावेज़ की है तो फिर कोई मुसलमान किस हैसियत से कहलाएगा और क्योंकर कहलाएगा।

इसके बरख़िलाफ़ दूसरी बात ये है कि क़ुरआन किताबे-हिदायत थी, आज भी है और क़ियामत तक के इन्सानों के लिये हिदायत का काम करेगी चाहे सोसाइटी किसी भी तरह की हो और ज़माने के हालात में चाहे कैसा ही भी तग़य्युर आ गया हो।

अगर इस दूसरी बात को तस्लीम किया जाए तो इसका नतीजा पहली बात के बिलकुल बरख़िलाफ़ निकलेगा। इस बात को तस्लीम कर लेने से ये बात लाज़िम होगी कि ये किताब असलन तो एक इन्सान को एड्रेस करती है। उसके नफ़्स को पाक करना और उसकी शख़्सियत को परवान चढ़ाना चाहती है, लेकिन चूँकि इन्सानों से मिलकर ही सोसाइटी बनती है लिहाज़ा ये किताब सिर्फ़ मुहम्मद (सल्ल०) वाले समाज ही के लिये नहीं बल्कि उनको मुख़ातब बनाकर तमाम इन्सानी दुनिया को रहनुमाई फ़राहम करती है। ये किताब न सिर्फ़ एक इन्सान की रहनुमाई करती है बल्कि एक और एक इन्सान मिलकर जब एक समाज बनाते हैं तो उन्हें किन बातों को इख़्तियार करना चाहिये और किन बातों से परहेज़ करना चाहिये इस तरफ़ भी रहनुमाई करती है। इन्सानों से मिलकर बनने वाले इस समाज को किस तरह गवर्न करना और चलाना चाहिये इस तरफ़ भी रहनुमाई करती है और इस तरफ़ भी रहनुमाई करती है कि मुख़्तलिफ़ तहज़ीबों को माननेवाले लोग अगर एक साथ रहते हों तो (इस प्लुरल सोसाइटी में) लोगों को आपस में किस तरह का बिहेवियर करना चाहिये। इस किताब को हिदायत की किताब तस्लीम करके अगर कोई शख़्स मुसलमान है तो फिर ये उसकी ज़िम्मेदारी है कि वो लोगों को ये बताए कि हम इस किताब को किताबे-हिदायत तस्लीम करते हैं, इसी लिये हम इस पर ईमान लाते हैं और इस पर ईमान लाकर एक तहज़ीब और एक तमद्दुन भी रखते हैं जो दुनिया में इन्सानों की बनाई हुई तहज़ीबों से यकसर मुख़्तलिफ़ है क्योंकि इस तहज़ीब की बुनियाद दूसरी तहज़ीबों की तरह इन्सानों के बनाए हुए फ़लसफ़ों और नज़रयात पर नहीं बल्कि इस तहज़ीब की बुनियाद उस ख़ालिक़े-कायनात के बताए उसूलों और ज़ाब्तों पर रखी गई है जिसने न सिर्फ़ इस दुनिया और ख़ुद इन्सान को तख़लीक़ किया बल्कि वो इस इन्सान के फ़ितरी रुझानात को भी अच्छी तरह समझता और जानता है।

अल्हम्दुलिल्लाह मैं इस सिलसिले में दूसरी बात पर पुख़्ता यक़ीन रखता हूँ और अल्लाह से दुआ करता हूँ कि एक मुसलमान होने की हैसियत से आप भी इसी बात को हक़ और सच तस्लीम करें।

Some people believe that the Qur’an is merely a chronicle of the Prophet Muhammad’s ﷺ mission — that his revolution was a miracle, and the Qur’an is but a recorded testament to that miracle. According to this view, seeking guidance from the Qur’an in today’s pluralistic society is an impossible endeavor. In essence, the Qur’an was a book of guidance solely for Muhammad ﷺ, and after him, it holds no more than the status of a historical document — preserved merely for people to read and admire the miracle of his time.

But if this notion is accepted, then to believe in the Qur’an—or even to call it the Book of Allah—becomes meaningless. Reciting it repeatedly, using it in prayers, or basing any social structure upon it becomes a vain exercise — even a sign of delusion. It would mean that the Qur’an neither forms the foundation of any civilization nor provides any blueprint for a just society. And then, reading this book — let alone preserving it in our homes — becomes unnecessary. It should, instead, be archived in a few libraries as a piece of history, with its selected portions included in the syllabus of history or social sciences. And the community that identifies itself based on this Book — the Muslims — should, by that logic, be dissolved. After all, if the Qur’an is merely a historical relic, then what significance does a Muslim have, and by what basis can they still claim that name?

In stark contrast to this view stands another belief: that the Qur’an was, is, and will remain a book of divine guidance for all humanity—until the end of time—regardless of the kind of society or the nature of the era.

If one accepts this truth, then it follows necessarily that the Qur’an addresses the individual human being, seeking to purify his soul, refine his character, and elevate his being. But since societies are composed of individuals, this guidance naturally extends to society at large. Thus, this Book does not address only the people of the Prophet’s time ﷺ but, through them, offers timeless direction to all of humankind.

It not only guides the individual but also provides principles for societal development, instructing communities on what values to uphold and what to avoid. It outlines how societies should be governed and how people of diverse cultures, creeds, and civilizations should interact in pluralistic settings.

If a person embraces this Book as guidance and calls himself a Muslim because of it, then it becomes his moral responsibility to declare:
We believe in this Book as divine guidance; we live by it; and we uphold a civilization that is fundamentally different from all man-made ideologies — because its foundation is not rooted in human philosophy, but in the eternal principles revealed by the Creator of both man and universe — the One who alone understands the depths of human nature and its inherent inclinations.

Alhamdulillah,
I firmly believe in this second truth, and I pray to Allah that you, too, as a Muslim, recognize it as the ultimate truth and live by it.

بعض لوگ یہ خیال رکھتے ہیں کہ قرآن محض نبی کریم ﷺ کے مشن کی روداد ہے، نبی کا انقلاب ایک معجزہ تھا اور قرآن اسی معجزے کی ایک تحریری شہادت ہے۔ ان کے نزدیک قرآن سے آج کی تکثیری سماج کے لیے کوئی رہنمائی تلاش کرنا ایک ناممکن مشن ہے۔ گویا قرآن صرف رسول اللہ ﷺ کے زمانے کے لیے ہدایت کی کتاب تھی، اور اب اس کی حیثیت محض ایک تاریخی دستاویز کی ہے، جسے صرف محفوظ رکھنے کے لیے رکھا گیا ہے تاکہ لوگ محمد ﷺ کے اس عظیم معجزے کو پڑھیں اور محظوظ ہوں۔

اگر یہ تصور تسلیم کر لیا جائے تو پھر قرآن پر ایمان لانے، یا اسے اللہ کی کتاب ماننے کا کوئی مفہوم باقی نہیں رہتا۔ اسے بار بار پڑھنا، عبادات میں دہراتے رہنا، ایک لاحاصل عمل بن جائے گا۔ بلکہ اس کی بنیاد پر کسی معاشرے کی تشکیل کرنا ایک فضول کام بلکہ ذہنی خلل کہلائے گا۔ اس کا مطلب یہ ہوگا کہ قرآن نہ تو تہذیب کی کوئی بنیاد فراہم کرتا ہے اور نہ ہی کسی صالح سماج کا نقشہ پیش کرتا ہے۔ ظاہر ہے، ایسی صورت میں (نعوذ باللہ) قرآن کو گھروں میں رکھنا بھی بےمعنی ہے — بس چند تاریخی لائبریریوں کی زینت بنایا جائے اور اس کے اجزاء کو سماجی علوم یا تاریخ کے کورسز میں شامل کر دیا جائے۔ اور جو قوم اس کتاب کی بنیاد پر دنیا میں موجود ہے، اسے تحلیل کر دینا چاہئے۔ “مسلمان” نام کا کوئی فرد باقی ہی کیوں رہے؟ اگر قرآن محض ایک تاریخی کتاب ہے تو پھر مسلمان کی شناخت کیا ہے اور کس بنیاد پر ہے؟

اس کے برخلاف دوسرا نقطۂ نظر یہ ہے کہ قرآن نہ صرف اُس وقت ہدایت کی کتاب تھا بلکہ آج بھی ہے، اور قیامت تک آنے والی نسلِ انسانی کے لیے ہر دور اور ہر سوسائٹی میں ہدایت کا سرچشمہ رہے گا، خواہ زمانہ کتنی ہی تبدیلیوں سے کیوں نہ گزرے۔

اگر اس نظریے کو تسلیم کر لیا جائے تو اس کا نتیجہ مکمل طور پر پہلا نظریہ رد کر دیتا ہے۔ یہ ماننا لازم ہوگا کہ یہ کتاب براہِ راست انسان کو مخاطب کرتی ہے، اس کے نفس کو پاک کرنا اور اس کی شخصیت کو پروان چڑھانا اس کا مقصد ہے۔ چونکہ انسانوں سے ہی معاشرہ تشکیل پاتا ہے، لہٰذا یہ کتاب صرف محمد ﷺ کے معاشرے کے لیے مخصوص نہیں بلکہ اُس معاشرے کو مخاطب بنا کر پوری انسانیت کے لیے رہنمائی فراہم کرتی ہے۔ یہ نہ صرف فرد کو رہنمائی دیتی ہے بلکہ جب افراد مل کر ایک سماج تشکیل دیں، تو وہ سماج کن اصولوں پر قائم ہو، کن باتوں کو اختیار کرے، کن سے بچے — اس پر بھی قرآن روشنی ڈالتا ہے۔

یہ کتاب بتاتی ہے کہ مختلف تہذیبوں کے ماننے والے اگر ایک ساتھ کسی معاشرے میں رہیں تو اس تکثیری سماج میں لوگوں کے درمیان کیسا طرزِ عمل ہونا چاہئے۔

پس اگر کوئی شخص قرآن کو کتابِ ہدایت مانتا ہے اور اس بنیاد پر مسلمان کہلاتا ہے، تو اس پر لازم ہے کہ وہ دنیا کو بتائے کہ ہم اس کتاب کو اللہ کی طرف سے ہدایت کا سرچشمہ مانتے ہیں، اسی پر ایمان رکھتے ہیں، اور اسی کے مطابق ایک تہذیب و تمدن رکھتے ہیں — جو انسانوں کی بنائی ہوئی دوسری تہذیبوں سے یکسر مختلف ہے، کیونکہ اس تہذیب کی بنیاد انسانی خیالات و فلسفوں پر نہیں بلکہ اُس خالقِ کائنات کے بتائے ہوئے اصولوں پر ہے جس نے نہ صرف اس دنیا اور انسان کو پیدا کیا بلکہ وہ انسان کی فطری میلانات اور اس کے نفسیاتی رجحانات سے بھی خوب واقف ہے۔

الحمد للّٰہ!
میں خود اس دوسرے نظریے پر کامل یقین رکھتا ہوں، اور اللہ تعالیٰ سے دعا گو ہوں کہ آپ بھی ایک سچے مسلمان کی حیثیت سے اسی نظریے کو حق و صداقت تسلیم کریں۔

Hindi

क्या क़ुरआन आज की प्लुरल सोसाइटी के लिये भी किताबे-हिदायत है?

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कुछ लोग मानते हैं कि क़ुरआन नबी के मिशन की रुदाद है, नबी का इन्क़िलाब एक मोजज़ा है और क़ुरआन उस मोजज़े का दस्तावेज़ है। क़ुरआन से इस प्लुरल सोसायटी के लिए कोई हिदायत तलाश करना एक इंपॉसिबल मिशन है। यानी क़ुरआन किताबे-हिदायत सिर्फ़ मुहम्मद (सल्ल०) के लिये थी, मुहम्मद (सल्ल०) के बाद इसकी हैसियत महज़ एक दस्तावेज़ की है और इसे महज़ एक तारीख़ी दस्तावेज़ की हैसियत ही से महफ़ूज़ किया गया है ताकि लोग मुहम्मद (सल्ल०) के उस मोजज़े को महज़ पढ़ते और महज़ूज़ होते रहें।

अगर इस बात को तस्लीम किया जाए तो क़ुरआन पर ईमान लाना, बल्कि इसे अल्लाह की किताब तस्लीम करना ही सिरे से बे-माना है। इसे बार-बार पढ़ना और अपनी इबादात (नमाज़ वग़ैरा) में दोहराते रहना फ़ुज़ूल है, बल्कि इसकी बुनियाद पर किसी मुआशरे की तामीर करना कारे-अबस और मुआशरे की तामीर का सोचना भी दिमाग़ का ख़लल है। इसका मतलब ये होगा कि क़ुरआन न तो कोई तहज़ीब की बुनियाद रखता है और न ही किसी समाज का नक़्शा इन्सान को देता है। ज़ाहिर है फिर इस किताब को (नाउज़ू-बिल्लाह) पढ़ना तो दूर की बात इसे घरों में रखना भी ख़ाह-म-ख़ाह की एक बात है, तारीख़ी दस्तावेज़ की हैसियत से महज़ चन्द लाइब्रेरियों में रखवा दिया जाए और इसके मुख़्तलिफ़ हिस्से करके तारीख़ (History) या सोशल साइंस के सिलेबस के तौर पर कुछ कोर्सेज़ में लगवा दिया जाए। इसकी बुनियाद पर जो क़ौम दुनिया में पाई जाती है उसे तहलील कर दिया जाए। मुसलमान नाम का कोई शख़्स बाक़ी ही क्यों रहे? इस किताब की हैसियत अगर महज़ एक तारीख़ी दस्तावेज़ की है तो फिर कोई मुसलमान किस हैसियत से कहलाएगा और क्योंकर कहलाएगा।

इसके बरख़िलाफ़ दूसरी बात ये है कि क़ुरआन किताबे-हिदायत थी, आज भी है और क़ियामत तक के इन्सानों के लिये हिदायत का काम करेगी चाहे सोसाइटी किसी भी तरह की हो और ज़माने के हालात में चाहे कैसा ही भी तग़य्युर आ गया हो।

अगर इस दूसरी बात को तस्लीम किया जाए तो इसका नतीजा पहली बात के बिलकुल बरख़िलाफ़ निकलेगा। इस बात को तस्लीम कर लेने से ये बात लाज़िम होगी कि ये किताब असलन तो एक इन्सान को एड्रेस करती है। उसके नफ़्स को पाक करना और उसकी शख़्सियत को परवान चढ़ाना चाहती है, लेकिन चूँकि इन्सानों से मिलकर ही सोसाइटी बनती है लिहाज़ा ये किताब सिर्फ़ मुहम्मद (सल्ल०) वाले समाज ही के लिये नहीं बल्कि उनको मुख़ातब बनाकर तमाम इन्सानी दुनिया को रहनुमाई फ़राहम करती है। ये किताब न सिर्फ़ एक इन्सान की रहनुमाई करती है बल्कि एक और एक इन्सान मिलकर जब एक समाज बनाते हैं तो उन्हें किन बातों को इख़्तियार करना चाहिये और किन बातों से परहेज़ करना चाहिये इस तरफ़ भी रहनुमाई करती है। इन्सानों से मिलकर बनने वाले इस समाज को किस तरह गवर्न करना और चलाना चाहिये इस तरफ़ भी रहनुमाई करती है और इस तरफ़ भी रहनुमाई करती है कि मुख़्तलिफ़ तहज़ीबों को माननेवाले लोग अगर एक साथ रहते हों तो (इस प्लुरल सोसाइटी में) लोगों को आपस में किस तरह का बिहेवियर करना चाहिये। इस किताब को हिदायत की किताब तस्लीम करके अगर कोई शख़्स मुसलमान है तो फिर ये उसकी ज़िम्मेदारी है कि वो लोगों को ये बताए कि हम इस किताब को किताबे-हिदायत तस्लीम करते हैं, इसी लिये हम इस पर ईमान लाते हैं और इस पर ईमान लाकर एक तहज़ीब और एक तमद्दुन भी रखते हैं जो दुनिया में इन्सानों की बनाई हुई तहज़ीबों से यकसर मुख़्तलिफ़ है क्योंकि इस तहज़ीब की बुनियाद दूसरी तहज़ीबों की तरह इन्सानों के बनाए हुए फ़लसफ़ों और नज़रयात पर नहीं बल्कि इस तहज़ीब की बुनियाद उस ख़ालिक़े-कायनात के बताए उसूलों और ज़ाब्तों पर रखी गई है जिसने न सिर्फ़ इस दुनिया और ख़ुद इन्सान को तख़लीक़ किया बल्कि वो इस इन्सान के फ़ितरी रुझानात को भी अच्छी तरह समझता और जानता है।

अल्हम्दुलिल्लाह मैं इस सिलसिले में दूसरी बात पर पुख़्ता यक़ीन रखता हूँ और अल्लाह से दुआ करता हूँ कि एक मुसलमान होने की हैसियत से आप भी इसी बात को हक़ और सच तस्लीम करें।

Some people believe that the Qur’an is merely a chronicle of the Prophet Muhammad’s ﷺ mission — that his revolution was a miracle, and the Qur’an is but a recorded testament to that miracle. According to this view, seeking guidance from the Qur’an in today’s pluralistic society is an impossible endeavor. In essence, the Qur’an was a book of guidance solely for Muhammad ﷺ, and after him, it holds no more than the status of a historical document — preserved merely for people to read and admire the miracle of his time.

But if this notion is accepted, then to believe in the Qur’an—or even to call it the Book of Allah—becomes meaningless. Reciting it repeatedly, using it in prayers, or basing any social structure upon it becomes a vain exercise — even a sign of delusion. It would mean that the Qur’an neither forms the foundation of any civilization nor provides any blueprint for a just society. And then, reading this book — let alone preserving it in our homes — becomes unnecessary. It should, instead, be archived in a few libraries as a piece of history, with its selected portions included in the syllabus of history or social sciences. And the community that identifies itself based on this Book — the Muslims — should, by that logic, be dissolved. After all, if the Qur’an is merely a historical relic, then what significance does a Muslim have, and by what basis can they still claim that name?

In stark contrast to this view stands another belief: that the Qur’an was, is, and will remain a book of divine guidance for all humanity—until the end of time—regardless of the kind of society or the nature of the era.

If one accepts this truth, then it follows necessarily that the Qur’an addresses the individual human being, seeking to purify his soul, refine his character, and elevate his being. But since societies are composed of individuals, this guidance naturally extends to society at large. Thus, this Book does not address only the people of the Prophet’s time ﷺ but, through them, offers timeless direction to all of humankind.

It not only guides the individual but also provides principles for societal development, instructing communities on what values to uphold and what to avoid. It outlines how societies should be governed and how people of diverse cultures, creeds, and civilizations should interact in pluralistic settings.

If a person embraces this Book as guidance and calls himself a Muslim because of it, then it becomes his moral responsibility to declare:
We believe in this Book as divine guidance; we live by it; and we uphold a civilization that is fundamentally different from all man-made ideologies — because its foundation is not rooted in human philosophy, but in the eternal principles revealed by the Creator of both man and universe — the One who alone understands the depths of human nature and its inherent inclinations.

Alhamdulillah,
I firmly believe in this second truth, and I pray to Allah that you, too, as a Muslim, recognize it as the ultimate truth and live by it.

بعض لوگ یہ خیال رکھتے ہیں کہ قرآن محض نبی کریم ﷺ کے مشن کی روداد ہے، نبی کا انقلاب ایک معجزہ تھا اور قرآن اسی معجزے کی ایک تحریری شہادت ہے۔ ان کے نزدیک قرآن سے آج کی تکثیری سماج کے لیے کوئی رہنمائی تلاش کرنا ایک ناممکن مشن ہے۔ گویا قرآن صرف رسول اللہ ﷺ کے زمانے کے لیے ہدایت کی کتاب تھی، اور اب اس کی حیثیت محض ایک تاریخی دستاویز کی ہے، جسے صرف محفوظ رکھنے کے لیے رکھا گیا ہے تاکہ لوگ محمد ﷺ کے اس عظیم معجزے کو پڑھیں اور محظوظ ہوں۔

اگر یہ تصور تسلیم کر لیا جائے تو پھر قرآن پر ایمان لانے، یا اسے اللہ کی کتاب ماننے کا کوئی مفہوم باقی نہیں رہتا۔ اسے بار بار پڑھنا، عبادات میں دہراتے رہنا، ایک لاحاصل عمل بن جائے گا۔ بلکہ اس کی بنیاد پر کسی معاشرے کی تشکیل کرنا ایک فضول کام بلکہ ذہنی خلل کہلائے گا۔ اس کا مطلب یہ ہوگا کہ قرآن نہ تو تہذیب کی کوئی بنیاد فراہم کرتا ہے اور نہ ہی کسی صالح سماج کا نقشہ پیش کرتا ہے۔ ظاہر ہے، ایسی صورت میں (نعوذ باللہ) قرآن کو گھروں میں رکھنا بھی بےمعنی ہے — بس چند تاریخی لائبریریوں کی زینت بنایا جائے اور اس کے اجزاء کو سماجی علوم یا تاریخ کے کورسز میں شامل کر دیا جائے۔ اور جو قوم اس کتاب کی بنیاد پر دنیا میں موجود ہے، اسے تحلیل کر دینا چاہئے۔ “مسلمان” نام کا کوئی فرد باقی ہی کیوں رہے؟ اگر قرآن محض ایک تاریخی کتاب ہے تو پھر مسلمان کی شناخت کیا ہے اور کس بنیاد پر ہے؟

اس کے برخلاف دوسرا نقطۂ نظر یہ ہے کہ قرآن نہ صرف اُس وقت ہدایت کی کتاب تھا بلکہ آج بھی ہے، اور قیامت تک آنے والی نسلِ انسانی کے لیے ہر دور اور ہر سوسائٹی میں ہدایت کا سرچشمہ رہے گا، خواہ زمانہ کتنی ہی تبدیلیوں سے کیوں نہ گزرے۔

اگر اس نظریے کو تسلیم کر لیا جائے تو اس کا نتیجہ مکمل طور پر پہلا نظریہ رد کر دیتا ہے۔ یہ ماننا لازم ہوگا کہ یہ کتاب براہِ راست انسان کو مخاطب کرتی ہے، اس کے نفس کو پاک کرنا اور اس کی شخصیت کو پروان چڑھانا اس کا مقصد ہے۔ چونکہ انسانوں سے ہی معاشرہ تشکیل پاتا ہے، لہٰذا یہ کتاب صرف محمد ﷺ کے معاشرے کے لیے مخصوص نہیں بلکہ اُس معاشرے کو مخاطب بنا کر پوری انسانیت کے لیے رہنمائی فراہم کرتی ہے۔ یہ نہ صرف فرد کو رہنمائی دیتی ہے بلکہ جب افراد مل کر ایک سماج تشکیل دیں، تو وہ سماج کن اصولوں پر قائم ہو، کن باتوں کو اختیار کرے، کن سے بچے — اس پر بھی قرآن روشنی ڈالتا ہے۔

یہ کتاب بتاتی ہے کہ مختلف تہذیبوں کے ماننے والے اگر ایک ساتھ کسی معاشرے میں رہیں تو اس تکثیری سماج میں لوگوں کے درمیان کیسا طرزِ عمل ہونا چاہئے۔

پس اگر کوئی شخص قرآن کو کتابِ ہدایت مانتا ہے اور اس بنیاد پر مسلمان کہلاتا ہے، تو اس پر لازم ہے کہ وہ دنیا کو بتائے کہ ہم اس کتاب کو اللہ کی طرف سے ہدایت کا سرچشمہ مانتے ہیں، اسی پر ایمان رکھتے ہیں، اور اسی کے مطابق ایک تہذیب و تمدن رکھتے ہیں — جو انسانوں کی بنائی ہوئی دوسری تہذیبوں سے یکسر مختلف ہے، کیونکہ اس تہذیب کی بنیاد انسانی خیالات و فلسفوں پر نہیں بلکہ اُس خالقِ کائنات کے بتائے ہوئے اصولوں پر ہے جس نے نہ صرف اس دنیا اور انسان کو پیدا کیا بلکہ وہ انسان کی فطری میلانات اور اس کے نفسیاتی رجحانات سے بھی خوب واقف ہے۔

الحمد للّٰہ!
میں خود اس دوسرے نظریے پر کامل یقین رکھتا ہوں، اور اللہ تعالیٰ سے دعا گو ہوں کہ آپ بھی ایک سچے مسلمان کی حیثیت سے اسی نظریے کو حق و صداقت تسلیم کریں۔

क्या क़ुरआन आज की प्लुरल सोसाइटी के लिये भी किताबे-हिदायत है?

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कुछ लोग मानते हैं कि क़ुरआन नबी के मिशन की रुदाद है, नबी का इन्क़िलाब एक मोजज़ा है और क़ुरआन उस मोजज़े का दस्तावेज़ है। क़ुरआन से इस प्लुरल सोसायटी के लिए कोई हिदायत तलाश करना एक इंपॉसिबल मिशन है। यानी क़ुरआन किताबे-हिदायत सिर्फ़ मुहम्मद (सल्ल०) के लिये थी, मुहम्मद (सल्ल०) के बाद इसकी हैसियत महज़ एक दस्तावेज़ की है और इसे महज़ एक तारीख़ी दस्तावेज़ की हैसियत ही से महफ़ूज़ किया गया है ताकि लोग मुहम्मद (सल्ल०) के उस मोजज़े को महज़ पढ़ते और महज़ूज़ होते रहें।

अगर इस बात को तस्लीम किया जाए तो क़ुरआन पर ईमान लाना, बल्कि इसे अल्लाह की किताब तस्लीम करना ही सिरे से बे-माना है। इसे बार-बार पढ़ना और अपनी इबादात (नमाज़ वग़ैरा) में दोहराते रहना फ़ुज़ूल है, बल्कि इसकी बुनियाद पर किसी मुआशरे की तामीर करना कारे-अबस और मुआशरे की तामीर का सोचना भी दिमाग़ का ख़लल है। इसका मतलब ये होगा कि क़ुरआन न तो कोई तहज़ीब की बुनियाद रखता है और न ही किसी समाज का नक़्शा इन्सान को देता है। ज़ाहिर है फिर इस किताब को (नाउज़ू-बिल्लाह) पढ़ना तो दूर की बात इसे घरों में रखना भी ख़ाह-म-ख़ाह की एक बात है, तारीख़ी दस्तावेज़ की हैसियत से महज़ चन्द लाइब्रेरियों में रखवा दिया जाए और इसके मुख़्तलिफ़ हिस्से करके तारीख़ (History) या सोशल साइंस के सिलेबस के तौर पर कुछ कोर्सेज़ में लगवा दिया जाए। इसकी बुनियाद पर जो क़ौम दुनिया में पाई जाती है उसे तहलील कर दिया जाए। मुसलमान नाम का कोई शख़्स बाक़ी ही क्यों रहे? इस किताब की हैसियत अगर महज़ एक तारीख़ी दस्तावेज़ की है तो फिर कोई मुसलमान किस हैसियत से कहलाएगा और क्योंकर कहलाएगा।

इसके बरख़िलाफ़ दूसरी बात ये है कि क़ुरआन किताबे-हिदायत थी, आज भी है और क़ियामत तक के इन्सानों के लिये हिदायत का काम करेगी चाहे सोसाइटी किसी भी तरह की हो और ज़माने के हालात में चाहे कैसा ही भी तग़य्युर आ गया हो।

अगर इस दूसरी बात को तस्लीम किया जाए तो इसका नतीजा पहली बात के बिलकुल बरख़िलाफ़ निकलेगा। इस बात को तस्लीम कर लेने से ये बात लाज़िम होगी कि ये किताब असलन तो एक इन्सान को एड्रेस करती है। उसके नफ़्स को पाक करना और उसकी शख़्सियत को परवान चढ़ाना चाहती है, लेकिन चूँकि इन्सानों से मिलकर ही सोसाइटी बनती है लिहाज़ा ये किताब सिर्फ़ मुहम्मद (सल्ल०) वाले समाज ही के लिये नहीं बल्कि उनको मुख़ातब बनाकर तमाम इन्सानी दुनिया को रहनुमाई फ़राहम करती है। ये किताब न सिर्फ़ एक इन्सान की रहनुमाई करती है बल्कि एक और एक इन्सान मिलकर जब एक समाज बनाते हैं तो उन्हें किन बातों को इख़्तियार करना चाहिये और किन बातों से परहेज़ करना चाहिये इस तरफ़ भी रहनुमाई करती है। इन्सानों से मिलकर बनने वाले इस समाज को किस तरह गवर्न करना और चलाना चाहिये इस तरफ़ भी रहनुमाई करती है और इस तरफ़ भी रहनुमाई करती है कि मुख़्तलिफ़ तहज़ीबों को माननेवाले लोग अगर एक साथ रहते हों तो (इस प्लुरल सोसाइटी में) लोगों को आपस में किस तरह का बिहेवियर करना चाहिये। इस किताब को हिदायत की किताब तस्लीम करके अगर कोई शख़्स मुसलमान है तो फिर ये उसकी ज़िम्मेदारी है कि वो लोगों को ये बताए कि हम इस किताब को किताबे-हिदायत तस्लीम करते हैं, इसी लिये हम इस पर ईमान लाते हैं और इस पर ईमान लाकर एक तहज़ीब और एक तमद्दुन भी रखते हैं जो दुनिया में इन्सानों की बनाई हुई तहज़ीबों से यकसर मुख़्तलिफ़ है क्योंकि इस तहज़ीब की बुनियाद दूसरी तहज़ीबों की तरह इन्सानों के बनाए हुए फ़लसफ़ों और नज़रयात पर नहीं बल्कि इस तहज़ीब की बुनियाद उस ख़ालिक़े-कायनात के बताए उसूलों और ज़ाब्तों पर रखी गई है जिसने न सिर्फ़ इस दुनिया और ख़ुद इन्सान को तख़लीक़ किया बल्कि वो इस इन्सान के फ़ितरी रुझानात को भी अच्छी तरह समझता और जानता है।

अल्हम्दुलिल्लाह मैं इस सिलसिले में दूसरी बात पर पुख़्ता यक़ीन रखता हूँ और अल्लाह से दुआ करता हूँ कि एक मुसलमान होने की हैसियत से आप भी इसी बात को हक़ और सच तस्लीम करें।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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