Ummat ka Bukhar

Ummat ka Bukhar

The fever of Ummah

उम्मत का बुख़ार

पिछले क़रीब 4 दिन लगातार बुख़ार की हालत से गुज़रा। बुख़ार की शुरुआत बहुत तेज़ सर्दी के साथ होती। बॉडी के अन्दर इन्तिहाई क़िस्म की कपकपाहट (shivering) होने लगती, जिसकी शिद्दत का अन्दाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि तीन-चार लिहाफ़ भी कम पड़ जाते थे लेकिन जिस्म की कपकपाहट कम नहीं होती थी। बॉडी का टेम्प्रेचर 104 तक चला जाता। किसी तरह जब टर्बुलेन्स कम होता तो बुख़ार कम करने के लिये सख़्त सर्दी के मौसम में ठन्डे पानी की पट्टियाँ रखी जातीं। बहरहाल मुस्तक़िल दवाई के इस्तेमाल और शायद वायरल फ़ीवर की अपनी मीआद पूरी हो जाने के बाद तबिअत बहाल हुई है और अब मैं रू-ब-सेहत हूँ। अल्हम्दुलिल्लाह, अश-शुक्रु-लिल्लाह।

जब बुख़ार की शिद्दत कम होती तो कुछ ग़ौर-फ़िक्र करने का मौक़ा मिलता। इस दौरान मुझे महसूस हुआ कि उम्मते-मुस्लिमा की हालत भी कुछ इसी तरह की है। ये उम्मत मुस्तक़िल किसी ज़बरदस्त ‘वायरल’ का शिकार है। जब कभी उम्मत में शदीद क़िस्म का टर्बुलेन्स पैदा होता है तो उम्मत के ख़ैरख़ाह वक़्ती तौर पर इलाज के लिये लिहाफ़ लेकर दौड़ पड़ते हैं, जो उस वक़्त की सिचुएशन के मुताबिक़ सही भी होता है। मगर लिहाफ़ पर लिहाफ़ डालकर वक़्ती तौर के टर्बुलेन्स को रोक लेना कोई इलाज नहीं है। इलाज तो ये है कि जिस वायरस का अटैक है उसके ख़िलाफ़ प्रॉपर तरीक़े से एंटी-वायरस दिया जाए ताकि उम्मत के अन्दर वायरस से लड़ने की जो ताक़तें हैं वो एक्टिव और मज़बूत हो सकें। और फिर सब्र के साथ वक़्त आने का इन्तिज़ार किया जाए। इंशाअल्लाह एक दिन उम्मत के अन्दर टर्बुलेन्स ख़त्म हो जाएँगे।

मगर अफ़सोस है कि टर्बुलेन्स के दौरान उम्मत के मुख़लेसीन की बड़ी तादाद लिहाफ़ लेकर ही दौड़ती है, प्रॉपर ट्रीटमेंट की तरफ़ तवज्जोह देनेवाले लोग आटे में नमक के बराबर भी नज़र नहीं आते हैं।

उम्मत के तमाम मुख़लेसीन से मेरी दरख़ास्त है कि उम्मत के प्रॉपर इलाज की फ़िक्र करें और उम्मत के इलाज को उठने से पहले इस बात को भी तस्लीम करें कि वो ख़ुद भी उसी उम्मत का हिस्सा हैं इसलिये उसी prescribed नुस्ख़े से इलाज की कोशिश करें जो नुस्ख़ा इस उम्मत के हकीमे-आला और हाकिमे-आला अल्लाह सुब्हानहु-व-तआला ने तजवीज़ किया था और हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) के ज़रिए उस नुस्ख़े के मुताबिक़ इस्लाह करके एक नमूना भी पेश करवा दिया था। फिर इस नुस्ख़े को सबसे पहले अपने ऊपर उसी तरह अप्लाई करें जिस तरह मुसलेहे-अव्वल हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) ने अपने ऊपर अप्लाई किया था।

वो नुस्ख़ा ये था कि सबसे पहले लोगों के सामने अल्लाह की आयात (क़ुरआन) की तिलावत की जाए, यानी अल्लाह की तरफ़ से आनेवाली आयात को ख़ूब समझ कर और अमल के साँचे में ढालकर ज्यों का त्यों लोगों के सामने पेश किया जाए, फिर जो लोग उन आयात पर लब्बैक कहें उनके अन्दर से खोट और कमज़ोरियों को दूर करके उनकी शख़्सियत को परवान चढ़ाया जाए और उन्हें मज़बूत किरदार का इन्सान बनाया जाए। फिर उन लोगों को मिलाकर एक ऐसा समाज वुजूद में लाने की जिद्दोजुहद की जाए जिसमें अमन व सलामती क़ायम हो, चाहे इसके लिये अमन-मुख़ालिफ़ ताक़तों से टकराना ही क्यों न पड़े।

Over the past four days, I endured an intense episode of fever.
It would begin with a sudden, fierce chill — an internal shivering so violent that even three or four blankets would fail to bring warmth, and yet the body would not stop trembling.
The temperature would spike to 104°F.
Only after the turbulence would subside a bit, we would resort to placing cold compresses — even in the harsh winter — to bring the fever down.
Eventually, through consistent medication — and perhaps after the virus had run its natural course — my health was restored.
Alḥamdulillāh, ash-shukru lillāh — I am now on the path to recovery.

During the moments when the fever’s intensity would ease, I found some time for reflection.
It struck me deeply that the current condition of the Muslim Ummah resembles this very state.
Our Ummah is suffering from a chronic ‘viral’ infection.
Whenever a severe turbulence strikes, the well-wishers of the Ummah rush to cover it with temporary ‘blankets’ — an instinct that may be suitable to the moment, but not a cure.

Stacking blanket upon blanket may temporarily ease the shaking, but it is no remedy.
The real solution lies in identifying the virus and administering a proper anti-virus.
so that the internal strength of the Ummah, its immune force, may awaken and regain its vigor.
And then, with patience, wait for the right time —
Inshā’Allāh, the turbulence will subside one day.

But alas! During times of crisis, the majority of the Ummah’s sincere servants merely rush with their blankets.
Very few are found who turn their attention toward a proper cure — they are as rare as salt in flour.

To all the sincere ones of the Ummah, I appeal:
Please concern yourselves with the true treatment of this ailing body.
And before seeking to heal the collective, let us humbly acknowledge:
We ourselves are a part of this very Ummah.
We too must undergo the same prescribed treatment as suggested by the Supreme Healer and Sovereign — Allah Subḥānahu wa Taʿālā.
And this divine prescription was not only revealed through His Messenger, Prophet Muhammad ﷺ,
but he himself applied it upon his own blessed self as the first patient — and as the perfect model.

That prescription begins with the recitation and presentation of Allah’s revelations — the āyāt of the Qur’an —
understood deeply, lived sincerely, and conveyed truthfully to the people.

Then, among those who respond to this call,
Efforts must be made to remove inner impurities, correct their flaws, and elevate their personalities —
nurturing them into people of strong, noble character.

From these individuals, we must strive to build a society rooted in peace and justice,
even if it means clashing with the powers that oppose peace.

گزشتہ چار دن مسلسل ایک شدید بخار کی حالت میں گزرے۔
بخار کی ابتدا انتہائی تیز سردی کے ساتھ ہوتی تھی۔ جسم کے اندر ایک غیرمعمولی کپکپاہٹ پیدا ہو جاتی،
جس کی شدت کا اندازہ یوں لگایا جا سکتا ہے کہ تین چار لحاف بھی ناکافی محسوس ہوتے،
مگر کپکپاہٹ ختم ہونے کا نام نہ لیتی۔
جسم کا درجہ حرارت 104 تک پہنچ جاتا۔
کسی طرح جب یہ شدت تھوڑی سی کم ہوتی تو شدید سردی کے موسم میں ٹھنڈے پانی کی پٹیاں رکھ کر بخار کو کم کرنے کی کوشش کی جاتی۔
بالآخر، مسلسل دوا کے استعمال اور شاید وائرس کے اپنی مدت پوری کرنے کے بعد، طبیعت میں بہتری آئی اور اب بحمداللہ میں رو بہ صحت ہوں۔
الحمد لللہ، الشکر لللہ۔

جب بخار کی شدت کچھ کم ہوتی تو غور و فکر کا موقع ملتا۔ اس دوران ایک احساس نے دل میں جنم لیا کہ امتِ مسلمہ کی حالت بھی کچھ ایسی ہی ہے۔
یہ امت ایک مسلسل ‘وائرس’ کا شکار ہے۔ جب کبھی امت میں شدید قسم کا اضطراب اور ہلچل پیدا ہوتی ہے تو امت کے خیرخواہ وقتی طور پر علاج کے لیے ‘لحاف’ لے کر دوڑ پڑتے ہیں — جو بظاہر اس وقت کی صورتحال کے مطابق مناسب بھی ہوتا ہے۔

لیکن لحاف پر لحاف ڈال کر وقتی لرزے کو روک لینا علاج نہیں ہے۔ علاج تو یہ ہے کہ اس وائرس کے خلاف صحیح اور مؤثر اینٹی وائرس دیا جائے تاکہ امت کے اندر جو مدافعتی قوتیں ہیں وہ بیدار ہوں، متحرک ہوں، اور مضبوط ہوں۔ پھر صبر کے ساتھ وقت کا انتظار کیا جائے — ان شاء اللہ ایک دن آئے گا جب امت کا اضطراب ختم ہو جائے گا۔

لیکن افسوس کہ جب امت میں طوفان اٹھتا ہے تو امت کے مخلصین کی ایک بڑی تعداد صرف لحاف لے کر دوڑتی ہے۔ جبکہ اصل علاج کی طرف متوجہ ہونے والے لوگ آٹے میں نمک کے برابر بھی نظر نہیں آتے۔

امت کے تمام مخلصین سے میری گزارش ہے کہ وہ امت کے صحیح اور مکمل علاج کی فکر کریں — اور اس علاج سے پہلے یہ اعتراف کریں کہ ہم خود بھی اسی امت کا حصہ ہیں، لہٰذا وہی نسخہ پہلے اپنے اوپر بھی لاگو کریں جو نسخہ اللہ سبحانہ و تعالیٰ نے بطور حکیمِ اعلیٰ تجویز فرمایا تھا، اور جسے حضرت محمد ﷺ کے ذریعے نہ صرف پہنچایا گیا بلکہ اس نسخے کے مطابق اصلاح کرکے ایک عملی نمونہ بھی امت کے سامنے پیش کر دیا گیا۔

وہ نسخہ یہ تھا کہ: سب سے پہلے لوگوں کے سامنے اللہ کی آیات (قرآن) کی تلاوت کی جائے — یعنی اللہ کی طرف سے نازل شدہ آیات کو سمجھ کر، ان پر عمل کرکے، لوگوں کے سامنے جوں کا توں پیش کیا جائے۔

پھر جو لوگ ان آیات پر لبیک کہیں، ان کے اندر سے نقائص اور کمزوریاں دور کی جائیں، ان کی شخصیت کو سنوارا جائے، اور انہیں مضبوط کردار کا انسان بنایا جائے۔

پھر ایسے افراد کو ملا کر ایک پر امن، باکردار اور عدل پر قائم معاشرہ وجود میں لانے کی جدوجہد کی جائے — چاہے اس کے لیے امن مخالف طاقتوں سے ٹکر لینا ہی کیوں نہ پڑے۔

Hindi

उम्मत का बुख़ार

पिछले क़रीब 4 दिन लगातार बुख़ार की हालत से गुज़रा। बुख़ार की शुरुआत बहुत तेज़ सर्दी के साथ होती। बॉडी के अन्दर इन्तिहाई क़िस्म की कपकपाहट (shivering) होने लगती, जिसकी शिद्दत का अन्दाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि तीन-चार लिहाफ़ भी कम पड़ जाते थे लेकिन जिस्म की कपकपाहट कम नहीं होती थी। बॉडी का टेम्प्रेचर 104 तक चला जाता। किसी तरह जब टर्बुलेन्स कम होता तो बुख़ार कम करने के लिये सख़्त सर्दी के मौसम में ठन्डे पानी की पट्टियाँ रखी जातीं। बहरहाल मुस्तक़िल दवाई के इस्तेमाल और शायद वायरल फ़ीवर की अपनी मीआद पूरी हो जाने के बाद तबिअत बहाल हुई है और अब मैं रू-ब-सेहत हूँ। अल्हम्दुलिल्लाह, अश-शुक्रु-लिल्लाह।

जब बुख़ार की शिद्दत कम होती तो कुछ ग़ौर-फ़िक्र करने का मौक़ा मिलता। इस दौरान मुझे महसूस हुआ कि उम्मते-मुस्लिमा की हालत भी कुछ इसी तरह की है। ये उम्मत मुस्तक़िल किसी ज़बरदस्त ‘वायरल’ का शिकार है। जब कभी उम्मत में शदीद क़िस्म का टर्बुलेन्स पैदा होता है तो उम्मत के ख़ैरख़ाह वक़्ती तौर पर इलाज के लिये लिहाफ़ लेकर दौड़ पड़ते हैं, जो उस वक़्त की सिचुएशन के मुताबिक़ सही भी होता है। मगर लिहाफ़ पर लिहाफ़ डालकर वक़्ती तौर के टर्बुलेन्स को रोक लेना कोई इलाज नहीं है। इलाज तो ये है कि जिस वायरस का अटैक है उसके ख़िलाफ़ प्रॉपर तरीक़े से एंटी-वायरस दिया जाए ताकि उम्मत के अन्दर वायरस से लड़ने की जो ताक़तें हैं वो एक्टिव और मज़बूत हो सकें। और फिर सब्र के साथ वक़्त आने का इन्तिज़ार किया जाए। इंशाअल्लाह एक दिन उम्मत के अन्दर टर्बुलेन्स ख़त्म हो जाएँगे।

मगर अफ़सोस है कि टर्बुलेन्स के दौरान उम्मत के मुख़लेसीन की बड़ी तादाद लिहाफ़ लेकर ही दौड़ती है, प्रॉपर ट्रीटमेंट की तरफ़ तवज्जोह देनेवाले लोग आटे में नमक के बराबर भी नज़र नहीं आते हैं।

उम्मत के तमाम मुख़लेसीन से मेरी दरख़ास्त है कि उम्मत के प्रॉपर इलाज की फ़िक्र करें और उम्मत के इलाज को उठने से पहले इस बात को भी तस्लीम करें कि वो ख़ुद भी उसी उम्मत का हिस्सा हैं इसलिये उसी prescribed नुस्ख़े से इलाज की कोशिश करें जो नुस्ख़ा इस उम्मत के हकीमे-आला और हाकिमे-आला अल्लाह सुब्हानहु-व-तआला ने तजवीज़ किया था और हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) के ज़रिए उस नुस्ख़े के मुताबिक़ इस्लाह करके एक नमूना भी पेश करवा दिया था। फिर इस नुस्ख़े को सबसे पहले अपने ऊपर उसी तरह अप्लाई करें जिस तरह मुसलेहे-अव्वल हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) ने अपने ऊपर अप्लाई किया था।

वो नुस्ख़ा ये था कि सबसे पहले लोगों के सामने अल्लाह की आयात (क़ुरआन) की तिलावत की जाए, यानी अल्लाह की तरफ़ से आनेवाली आयात को ख़ूब समझ कर और अमल के साँचे में ढालकर ज्यों का त्यों लोगों के सामने पेश किया जाए, फिर जो लोग उन आयात पर लब्बैक कहें उनके अन्दर से खोट और कमज़ोरियों को दूर करके उनकी शख़्सियत को परवान चढ़ाया जाए और उन्हें मज़बूत किरदार का इन्सान बनाया जाए। फिर उन लोगों को मिलाकर एक ऐसा समाज वुजूद में लाने की जिद्दोजुहद की जाए जिसमें अमन व सलामती क़ायम हो, चाहे इसके लिये अमन-मुख़ालिफ़ ताक़तों से टकराना ही क्यों न पड़े।

Over the past four days, I endured an intense episode of fever.
It would begin with a sudden, fierce chill — an internal shivering so violent that even three or four blankets would fail to bring warmth, and yet the body would not stop trembling.
The temperature would spike to 104°F.
Only after the turbulence would subside a bit, we would resort to placing cold compresses — even in the harsh winter — to bring the fever down.
Eventually, through consistent medication — and perhaps after the virus had run its natural course — my health was restored.
Alḥamdulillāh, ash-shukru lillāh — I am now on the path to recovery.

During the moments when the fever’s intensity would ease, I found some time for reflection.
It struck me deeply that the current condition of the Muslim Ummah resembles this very state.
Our Ummah is suffering from a chronic ‘viral’ infection.
Whenever a severe turbulence strikes, the well-wishers of the Ummah rush to cover it with temporary ‘blankets’ — an instinct that may be suitable to the moment, but not a cure.

Stacking blanket upon blanket may temporarily ease the shaking, but it is no remedy.
The real solution lies in identifying the virus and administering a proper anti-virus.
so that the internal strength of the Ummah, its immune force, may awaken and regain its vigor.
And then, with patience, wait for the right time —
Inshā’Allāh, the turbulence will subside one day.

But alas! During times of crisis, the majority of the Ummah’s sincere servants merely rush with their blankets.
Very few are found who turn their attention toward a proper cure — they are as rare as salt in flour.

To all the sincere ones of the Ummah, I appeal:
Please concern yourselves with the true treatment of this ailing body.
And before seeking to heal the collective, let us humbly acknowledge:
We ourselves are a part of this very Ummah.
We too must undergo the same prescribed treatment as suggested by the Supreme Healer and Sovereign — Allah Subḥānahu wa Taʿālā.
And this divine prescription was not only revealed through His Messenger, Prophet Muhammad ﷺ,
but he himself applied it upon his own blessed self as the first patient — and as the perfect model.

That prescription begins with the recitation and presentation of Allah’s revelations — the āyāt of the Qur’an —
understood deeply, lived sincerely, and conveyed truthfully to the people.

Then, among those who respond to this call,
Efforts must be made to remove inner impurities, correct their flaws, and elevate their personalities —
nurturing them into people of strong, noble character.

From these individuals, we must strive to build a society rooted in peace and justice,
even if it means clashing with the powers that oppose peace.

گزشتہ چار دن مسلسل ایک شدید بخار کی حالت میں گزرے۔
بخار کی ابتدا انتہائی تیز سردی کے ساتھ ہوتی تھی۔ جسم کے اندر ایک غیرمعمولی کپکپاہٹ پیدا ہو جاتی،
جس کی شدت کا اندازہ یوں لگایا جا سکتا ہے کہ تین چار لحاف بھی ناکافی محسوس ہوتے،
مگر کپکپاہٹ ختم ہونے کا نام نہ لیتی۔
جسم کا درجہ حرارت 104 تک پہنچ جاتا۔
کسی طرح جب یہ شدت تھوڑی سی کم ہوتی تو شدید سردی کے موسم میں ٹھنڈے پانی کی پٹیاں رکھ کر بخار کو کم کرنے کی کوشش کی جاتی۔
بالآخر، مسلسل دوا کے استعمال اور شاید وائرس کے اپنی مدت پوری کرنے کے بعد، طبیعت میں بہتری آئی اور اب بحمداللہ میں رو بہ صحت ہوں۔
الحمد لللہ، الشکر لللہ۔

جب بخار کی شدت کچھ کم ہوتی تو غور و فکر کا موقع ملتا۔ اس دوران ایک احساس نے دل میں جنم لیا کہ امتِ مسلمہ کی حالت بھی کچھ ایسی ہی ہے۔
یہ امت ایک مسلسل ‘وائرس’ کا شکار ہے۔ جب کبھی امت میں شدید قسم کا اضطراب اور ہلچل پیدا ہوتی ہے تو امت کے خیرخواہ وقتی طور پر علاج کے لیے ‘لحاف’ لے کر دوڑ پڑتے ہیں — جو بظاہر اس وقت کی صورتحال کے مطابق مناسب بھی ہوتا ہے۔

لیکن لحاف پر لحاف ڈال کر وقتی لرزے کو روک لینا علاج نہیں ہے۔ علاج تو یہ ہے کہ اس وائرس کے خلاف صحیح اور مؤثر اینٹی وائرس دیا جائے تاکہ امت کے اندر جو مدافعتی قوتیں ہیں وہ بیدار ہوں، متحرک ہوں، اور مضبوط ہوں۔ پھر صبر کے ساتھ وقت کا انتظار کیا جائے — ان شاء اللہ ایک دن آئے گا جب امت کا اضطراب ختم ہو جائے گا۔

لیکن افسوس کہ جب امت میں طوفان اٹھتا ہے تو امت کے مخلصین کی ایک بڑی تعداد صرف لحاف لے کر دوڑتی ہے۔ جبکہ اصل علاج کی طرف متوجہ ہونے والے لوگ آٹے میں نمک کے برابر بھی نظر نہیں آتے۔

امت کے تمام مخلصین سے میری گزارش ہے کہ وہ امت کے صحیح اور مکمل علاج کی فکر کریں — اور اس علاج سے پہلے یہ اعتراف کریں کہ ہم خود بھی اسی امت کا حصہ ہیں، لہٰذا وہی نسخہ پہلے اپنے اوپر بھی لاگو کریں جو نسخہ اللہ سبحانہ و تعالیٰ نے بطور حکیمِ اعلیٰ تجویز فرمایا تھا، اور جسے حضرت محمد ﷺ کے ذریعے نہ صرف پہنچایا گیا بلکہ اس نسخے کے مطابق اصلاح کرکے ایک عملی نمونہ بھی امت کے سامنے پیش کر دیا گیا۔

وہ نسخہ یہ تھا کہ: سب سے پہلے لوگوں کے سامنے اللہ کی آیات (قرآن) کی تلاوت کی جائے — یعنی اللہ کی طرف سے نازل شدہ آیات کو سمجھ کر، ان پر عمل کرکے، لوگوں کے سامنے جوں کا توں پیش کیا جائے۔

پھر جو لوگ ان آیات پر لبیک کہیں، ان کے اندر سے نقائص اور کمزوریاں دور کی جائیں، ان کی شخصیت کو سنوارا جائے، اور انہیں مضبوط کردار کا انسان بنایا جائے۔

پھر ایسے افراد کو ملا کر ایک پر امن، باکردار اور عدل پر قائم معاشرہ وجود میں لانے کی جدوجہد کی جائے — چاہے اس کے لیے امن مخالف طاقتوں سے ٹکر لینا ہی کیوں نہ پڑے۔

उम्मत का बुख़ार

पिछले क़रीब 4 दिन लगातार बुख़ार की हालत से गुज़रा। बुख़ार की शुरुआत बहुत तेज़ सर्दी के साथ होती। बॉडी के अन्दर इन्तिहाई क़िस्म की कपकपाहट (shivering) होने लगती, जिसकी शिद्दत का अन्दाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि तीन-चार लिहाफ़ भी कम पड़ जाते थे लेकिन जिस्म की कपकपाहट कम नहीं होती थी। बॉडी का टेम्प्रेचर 104 तक चला जाता। किसी तरह जब टर्बुलेन्स कम होता तो बुख़ार कम करने के लिये सख़्त सर्दी के मौसम में ठन्डे पानी की पट्टियाँ रखी जातीं। बहरहाल मुस्तक़िल दवाई के इस्तेमाल और शायद वायरल फ़ीवर की अपनी मीआद पूरी हो जाने के बाद तबिअत बहाल हुई है और अब मैं रू-ब-सेहत हूँ। अल्हम्दुलिल्लाह, अश-शुक्रु-लिल्लाह।

जब बुख़ार की शिद्दत कम होती तो कुछ ग़ौर-फ़िक्र करने का मौक़ा मिलता। इस दौरान मुझे महसूस हुआ कि उम्मते-मुस्लिमा की हालत भी कुछ इसी तरह की है। ये उम्मत मुस्तक़िल किसी ज़बरदस्त ‘वायरल’ का शिकार है। जब कभी उम्मत में शदीद क़िस्म का टर्बुलेन्स पैदा होता है तो उम्मत के ख़ैरख़ाह वक़्ती तौर पर इलाज के लिये लिहाफ़ लेकर दौड़ पड़ते हैं, जो उस वक़्त की सिचुएशन के मुताबिक़ सही भी होता है। मगर लिहाफ़ पर लिहाफ़ डालकर वक़्ती तौर के टर्बुलेन्स को रोक लेना कोई इलाज नहीं है। इलाज तो ये है कि जिस वायरस का अटैक है उसके ख़िलाफ़ प्रॉपर तरीक़े से एंटी-वायरस दिया जाए ताकि उम्मत के अन्दर वायरस से लड़ने की जो ताक़तें हैं वो एक्टिव और मज़बूत हो सकें। और फिर सब्र के साथ वक़्त आने का इन्तिज़ार किया जाए। इंशाअल्लाह एक दिन उम्मत के अन्दर टर्बुलेन्स ख़त्म हो जाएँगे।

मगर अफ़सोस है कि टर्बुलेन्स के दौरान उम्मत के मुख़लेसीन की बड़ी तादाद लिहाफ़ लेकर ही दौड़ती है, प्रॉपर ट्रीटमेंट की तरफ़ तवज्जोह देनेवाले लोग आटे में नमक के बराबर भी नज़र नहीं आते हैं।

उम्मत के तमाम मुख़लेसीन से मेरी दरख़ास्त है कि उम्मत के प्रॉपर इलाज की फ़िक्र करें और उम्मत के इलाज को उठने से पहले इस बात को भी तस्लीम करें कि वो ख़ुद भी उसी उम्मत का हिस्सा हैं इसलिये उसी prescribed नुस्ख़े से इलाज की कोशिश करें जो नुस्ख़ा इस उम्मत के हकीमे-आला और हाकिमे-आला अल्लाह सुब्हानहु-व-तआला ने तजवीज़ किया था और हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) के ज़रिए उस नुस्ख़े के मुताबिक़ इस्लाह करके एक नमूना भी पेश करवा दिया था। फिर इस नुस्ख़े को सबसे पहले अपने ऊपर उसी तरह अप्लाई करें जिस तरह मुसलेहे-अव्वल हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) ने अपने ऊपर अप्लाई किया था।

वो नुस्ख़ा ये था कि सबसे पहले लोगों के सामने अल्लाह की आयात (क़ुरआन) की तिलावत की जाए, यानी अल्लाह की तरफ़ से आनेवाली आयात को ख़ूब समझ कर और अमल के साँचे में ढालकर ज्यों का त्यों लोगों के सामने पेश किया जाए, फिर जो लोग उन आयात पर लब्बैक कहें उनके अन्दर से खोट और कमज़ोरियों को दूर करके उनकी शख़्सियत को परवान चढ़ाया जाए और उन्हें मज़बूत किरदार का इन्सान बनाया जाए। फिर उन लोगों को मिलाकर एक ऐसा समाज वुजूद में लाने की जिद्दोजुहद की जाए जिसमें अमन व सलामती क़ायम हो, चाहे इसके लिये अमन-मुख़ालिफ़ ताक़तों से टकराना ही क्यों न पड़े।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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