उम्मत का बुख़ार
पिछले क़रीब 4 दिन लगातार बुख़ार की हालत से गुज़रा। बुख़ार की शुरुआत बहुत तेज़ सर्दी के साथ होती। बॉडी के अन्दर इन्तिहाई क़िस्म की कपकपाहट (shivering) होने लगती, जिसकी शिद्दत का अन्दाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि तीन-चार लिहाफ़ भी कम पड़ जाते थे लेकिन जिस्म की कपकपाहट कम नहीं होती थी। बॉडी का टेम्प्रेचर 104 तक चला जाता। किसी तरह जब टर्बुलेन्स कम होता तो बुख़ार कम करने के लिये सख़्त सर्दी के मौसम में ठन्डे पानी की पट्टियाँ रखी जातीं। बहरहाल मुस्तक़िल दवाई के इस्तेमाल और शायद वायरल फ़ीवर की अपनी मीआद पूरी हो जाने के बाद तबिअत बहाल हुई है और अब मैं रू-ब-सेहत हूँ। अल्हम्दुलिल्लाह, अश-शुक्रु-लिल्लाह।
जब बुख़ार की शिद्दत कम होती तो कुछ ग़ौर-फ़िक्र करने का मौक़ा मिलता। इस दौरान मुझे महसूस हुआ कि उम्मते-मुस्लिमा की हालत भी कुछ इसी तरह की है। ये उम्मत मुस्तक़िल किसी ज़बरदस्त ‘वायरल’ का शिकार है। जब कभी उम्मत में शदीद क़िस्म का टर्बुलेन्स पैदा होता है तो उम्मत के ख़ैरख़ाह वक़्ती तौर पर इलाज के लिये लिहाफ़ लेकर दौड़ पड़ते हैं, जो उस वक़्त की सिचुएशन के मुताबिक़ सही भी होता है। मगर लिहाफ़ पर लिहाफ़ डालकर वक़्ती तौर के टर्बुलेन्स को रोक लेना कोई इलाज नहीं है। इलाज तो ये है कि जिस वायरस का अटैक है उसके ख़िलाफ़ प्रॉपर तरीक़े से एंटी-वायरस दिया जाए ताकि उम्मत के अन्दर वायरस से लड़ने की जो ताक़तें हैं वो एक्टिव और मज़बूत हो सकें। और फिर सब्र के साथ वक़्त आने का इन्तिज़ार किया जाए। इंशाअल्लाह एक दिन उम्मत के अन्दर टर्बुलेन्स ख़त्म हो जाएँगे।
मगर अफ़सोस है कि टर्बुलेन्स के दौरान उम्मत के मुख़लेसीन की बड़ी तादाद लिहाफ़ लेकर ही दौड़ती है, प्रॉपर ट्रीटमेंट की तरफ़ तवज्जोह देनेवाले लोग आटे में नमक के बराबर भी नज़र नहीं आते हैं।
उम्मत के तमाम मुख़लेसीन से मेरी दरख़ास्त है कि उम्मत के प्रॉपर इलाज की फ़िक्र करें और उम्मत के इलाज को उठने से पहले इस बात को भी तस्लीम करें कि वो ख़ुद भी उसी उम्मत का हिस्सा हैं इसलिये उसी prescribed नुस्ख़े से इलाज की कोशिश करें जो नुस्ख़ा इस उम्मत के हकीमे-आला और हाकिमे-आला अल्लाह सुब्हानहु-व-तआला ने तजवीज़ किया था और हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) के ज़रिए उस नुस्ख़े के मुताबिक़ इस्लाह करके एक नमूना भी पेश करवा दिया था। फिर इस नुस्ख़े को सबसे पहले अपने ऊपर उसी तरह अप्लाई करें जिस तरह मुसलेहे-अव्वल हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) ने अपने ऊपर अप्लाई किया था।
वो नुस्ख़ा ये था कि सबसे पहले लोगों के सामने अल्लाह की आयात (क़ुरआन) की तिलावत की जाए, यानी अल्लाह की तरफ़ से आनेवाली आयात को ख़ूब समझ कर और अमल के साँचे में ढालकर ज्यों का त्यों लोगों के सामने पेश किया जाए, फिर जो लोग उन आयात पर लब्बैक कहें उनके अन्दर से खोट और कमज़ोरियों को दूर करके उनकी शख़्सियत को परवान चढ़ाया जाए और उन्हें मज़बूत किरदार का इन्सान बनाया जाए। फिर उन लोगों को मिलाकर एक ऐसा समाज वुजूद में लाने की जिद्दोजुहद की जाए जिसमें अमन व सलामती क़ायम हो, चाहे इसके लिये अमन-मुख़ालिफ़ ताक़तों से टकराना ही क्यों न पड़े।