आलिम नबियों के वारिस किस तरह हैं?
बेशक उलमाए-हक़, नबियों (अलैहि०) के वारिस और जानशीन हैं। (हदीस) उनका अंबिया का वारिस होना उसी वक़्त दुरुस्त और मुकम्मल हो सकता है जबकि उनकी ज़िन्दगी का मक़सद और उनकी कोशिशों का मरकज़ भी वही हो जो नबियों का था।
वो मक़सदे-ज़िन्दगी और वो कोशिशों का मरकज़ क्या है?
दो लफ़्ज़ों में “दीने-ख़ालिस” या एक लफ़्ज़ में “तौहीद”।
यानी एक-अकेले अल्लाह की ख़ालिस इबादत और कामिल इताअत, जो सिर्फ़ और सिर्फ़ उसी का हक़ है, उसको अपनी ज़ात से अमल में लाना और दूसरों में इसके लिये जिद्दोजुहद करना।
“ख़बरदार दीन ख़ालिस अल्लाह का हक़ है।” (39:3)
“दीन सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह के लिये हो जाए।” (02:193)
“और हमने आपसे पहले कोई पैग़म्बर नहीं भेजा अगर भेजा तो सिर्फ़ उसको यही हुक्म लेकर भेजा कि मेरे सिवा किसी की बन्दगी नहीं, इसलिये बस मेरी ही बन्दगी करो।” (21:25)
“वो है जिसने अपना रसूल रहनुमाई और सच्चे दीन के साथ भेजा, ताकि इसको सब दीनों (तमाम क़िस्म के निज़ामे-इताअत) पर ग़ालिब करे, भले ही शिर्क करनेवालों को ये नागवार हो।” (61:09)