Kab aaeygi Allah ki madad

Kab aaeygi Allah ki madad

When will the help of Allah come?

कब आएगी अल्लाह की मदद

दुनिया में क़ौमों की हार-जीत का क़ायदा ये है कि जो गरोह सरकशी में एक हद से बढ़ता है तो अल्लाह उसे किसी दूसरे गरोह के ज़रिए हटाता रहता है, जो कि पहले के मुक़ाबले लोगों के दरम्यान अद्लो-इन्साफ़ का नारा लेकर उठता है।

“ये तो ज़माने के उतार-चढ़ाव हैं जिन्हें हम लोगों के बीच गर्दिश देते रहते हैं।” (3:140) क्योंकि

“अगर इस तरह अल्लाह इन्सानों के एक गरोह को दूसरे गरोह के ज़रिए से हटाता न रहता तो ज़मीन का निज़ाम बिगड़ जाता।” यक़ीनन ये इसीलिये होता है कि “दुनिया के लोगों पर अल्लाह की बड़ी मेहरबानी है” (कि वो इस तरह बिगाड़ को दूर करने का इन्तिज़ाम करता रहता है।)(2:251)

यानी अल्लाह ने अपनी ज़मीन का इन्तिज़ाम बनाए रखने के लिये ये क़ायदा बना रखा है कि वो इन्सानों के अलग-अलग गरोहों को एक ख़ास हद तक तो ज़मीन में ग़लबा और ताक़त हासिल करने देता है, मगर जब कोई गरोह हद से बढ़ने लगता है तो किसी दूसरे गरोह के ज़रिए से उसका ज़ोर तोड़ देता है। अगर कहीं ऐसा होता कि एक फ़र्द, एक क़ौम और कम्युनिटी या किसी एक पार्टी ही की हुकूमत ज़मीन में हमेशा बाक़ी रखी जाती और उसका क़हर (ज़ुल्म) और उसकी नाइंसाफ़ी कभी ख़त्म होनेवाली न होती, तो यक़ीनन अल्लाह की ज़मीन में एक बड़ी तबाही और फ़साद पैदा हो जाता। पूरी दुनिया की तारीख़ भी और ख़ुद हमारे प्यारे मुल्क हिंदुस्तान की तारीख़ भी इस बात की गवाह है कि जब एक हुक्मराँ गरोह के पापों का घड़ा भर गया तो अल्लाह ने उसी जैसे दूसरे गरोह के ज़रिए उसे हटा दिया, अब जब इस गरोह ने भी नफ़रत को ही बढ़ावा दिया तो उसी जैसे एक दूसरे गरोह के ज़रिए हटाने का इंतिज़ाम कर दिया गया।

लेकिन इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि दुनिया में अम्न के क़ियाम की ज़िम्मेदारी अल्लाह ने जिस गरोह को सौंपी थी वो इसी तरह की उठापटख़ से ख़ुश होता रहे और समझता रहे कि अब हमारे करने का काम ख़ुद-बख़ुद ही हो रहा है, और हमारे करने का काम बस इतना है कि जो कम बुरा है उसी को सपोर्ट करते रहें। जिन लोगों को अल्लाह ने हक़ की गवाही देने और अम्न के क़ियाम की ज़िम्मेदारी सौंपी है ये उनके लिये बड़ी इम्तिहान की घड़ी होती है कि वो किसी कम बुरे गरोह को जिताने की जिद्दोजुहद में अपनी मेहनत व सलाहियतें लगाते रहेंगे या एक मुद्दत तक अपने करने के काम पर फ़ोकस करते रहेंगे और जैसे ही अल्लाह की तरफ़ से कोई मौक़ा मुयस्सर आए तो अम्नो-अमान के क़ियाम और अद्लो-इन्साफ़ की बहाली के लिये मन्ज़रे-आम पर आएँगे।

ये बात याद रखनी चाहिये कि अम्न के क़ियाम के लिये जिद्दोजुहद करने वाले गरोह के कामयाब होने के लिये भी ख़ुदा का एक क़ानून है और वो ये कि वो गरोह उस पैग़ामे-हक़ पर पहले ख़ुद खरा उतर कर दिखाए और फिर उसे पूरे यक़ीन और एतिमाद के साथ लोगों के दरमियान बेलाग तरीक़े से पहुँचाए। इस काम को करते हुए हो सकता है एक लम्बी मुद्दत तक आज़माइशों की भट्टी में तपाया जाए, लेकिन अपने सब्र का, अपनी सच्चाई का, अपनी क़ुरबानी और फ़िदाकारी का, अपने ईमान की मज़बूती और अल्लाह पर अपने भरोसे का इम्तिहान दें। मुसीबतों और मुश्किलों के दौर से गुज़रकर अपने अन्दर वो सिफ़ात परवान चढ़ाएँ जिन्हें देखकर लोग पुकार उठें कि यही हैं वो लोग जो ज़मीन पर हक़ और इंसाफ़ क़ायम कर सकते हैं। लिहाज़ा उनको चाहिये कि सबसे पहले हक़ीक़ी इल्म, बुलन्द अख़लाक़, सब्रो-रज़ा और तकरीमे-इन्सानियत के हथियारों से जाहिलियत पर फ़तह हासिल करके दिखाएँ। इस तरह जब वो ये साबित कर देंगे कि हम कुछ लेने नहीं बल्कि इन्सानियत को कुछ देने आए हैं, किसी ख़ास गरोह के दुश्मन नहीं बल्कि तमाम इन्सानों के ख़ैरख़ाह हैं, इन्सानों को ग़ुलाम बनाना नहीं चाहते बल्कि इन्सानों को इन्सानों की ग़ुलामी से निकालकर एक अल्लाह की ग़ुलामी में ला खड़ा करना चाहते हैं। तब अल्लाह की नुसरत और मदद ठीक अपने वक़्त पर उनका हाथ थामने के लिए आ पहुँचेगी। याद रखें कि वक़्त से पहले अल्लाह की ताईद और नुसरत किसी के लिये नहीं उतरा करती, यहाँ तक कि नबियों के लिये भी नहीं।

मुल्के-अज़ीज़ हिंदुस्तान में अल्लाह की तरफ़ से बार-बार इस बात के मौक़े मिलते रहे हैं और आज भी मिल रहे हैं। इस मौक़े को ग़नीमत जानते हुए हक़ का अलम्बरदार गरोह उठे और सबसे पहले वो ख़ुद अपने आपको हक़ पर चलनेवाला साबित करे, अपने-आपको लोगों और इन्सानी समाज का ख़ैरख़ाह साबित करे। लोगों को ये यक़ीन दिलाए कि वो कुछ लेने नहीं बल्कि देने के लिये वुजूद में आया है। इस तरह न सिर्फ़ आम लोगों की हिमायत उस गरोह को मुयस्सर आएगी बल्कि ख़ुदा की ताईद और नुसरत भी नाज़िल होगी। ये कम बुरे लोगों की ताईद और हिमायत करके ख़तरे को टालने की नाकाम कोशिश करते रहना या आनेवाले मुश्किल हालात से घबराकर ज़्यादा बुरे लोगों की ही गोदों में जाकर बैठ जाने से ख़ुदा के सामने जो ज़बरदस्त और दोहरी पकड़ होगी उसकी संगीनी का तो ख़ैर कोई अन्दाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता बल्कि इस दुनिया में भी इन्सानियत को न कभी अद्लो-इन्साफ़ नसीब होगा और न कभी हक़ीक़ी अम्नो-सुकून मुयस्सर होगा।

अल्लाह हमारा हामी व नासिर हो।

In the world, the principle that governs the rise and fall of nations is this: when a group exceeds limits in rebellion, Allah removes it through another group that rises in comparison, bearing the banner of justice and equity among the people.
“These are the vicissitudes of time which We alternate among the people…” (Qur’an 3:140)
Because,
“If Allah did not repel some people by means of others, the earth would certainly be corrupted…” (Qur’an 2:251)
Indeed, this happens only because “Allah has immense mercy upon mankind” — He constantly arranges for disorder to be checked.
This means that Allah has established a law for managing the earth: He grants certain groups temporary dominance, but when one transgresses bounds, He breaks its power through another. Had any single individual, nation, community, or political party been granted eternal control — and if their tyranny and injustice were never brought to an end — then certainly a great corruption and devastation would have engulfed the earth.
The history of the entire world — and indeed our beloved country India — stands witness to this truth: when the sins of a ruling group reach their peak, Allah removes them through another. And when that new group also promotes hatred, Allah sets in place yet another to remove them.
But this by no means implies that the group entrusted by Allah with the responsibility to establish peace should simply sit back and feel content at the ongoing conflict. Nor should they assume that their only duty is to support the “lesser evil.” For those appointed as witnesses of truth and trustees of peace, this is a crucial moment of trial: will they waste their efforts and capabilities in trying to make the lesser evil prevail? Or will they stay focused on their own divine mission, and, when the time is right, rise to the stage with a vision of restoring justice and peace?
One must remember that even the success of a group striving for peace is subject to a divine law — that the group itself must first embody the message of truth and then convey it to others with confidence and sincerity. In doing so, they may be tested over a long period in the furnace of tribulations. They must prove their patience, honesty, sacrifice, and strong faith. Through these trials, they cultivate such qualities that the world itself begins to proclaim: These are the ones fit to establish truth and justice on earth!
Thus, they must first conquer ignorance with the weapons of authentic knowledge, noble character, patience, and human dignity. Once they prove that they have come not to take, but to give — not as enemies of a particular group, but as well-wishers of all humanity — once they demonstrate that they seek to liberate humans not to enslave them, but to deliver them from the servitude of fellow humans into the servitude of the One God — then Allah’s divine help will arrive at its appointed time.
Remember: divine assistance does not descend prematurely — not even for the Prophets.
In India too, Allah has continued to offer opportunities time and again — and even now such opportunities exist. Recognizing this, the group that carries the banner of truth must rise, and first and foremost, prove themselves to be true followers of truth, and genuine well-wishers of humanity. They must convince the people that they have come not to demand, but to give. In this way, not only will the support of the masses be granted to them, but divine help from Allah will also descend.
But if they keep attempting to ward off danger by supporting the lesser evil — or out of fear of tough times, fall into the lap of the greater evil — then the severe and doubled accountability before Allah will be unimaginable. And even in this world, humanity will never attain justice, nor experience true peace and tranquility.

May Allah be our Guardian and Helper.

 

دنیا میں قوموں کی ہار جیت کا قاعدہ یہی ہے کہ جب کوئی گروہ سرکشی میں ایک حد سے تجاوز کر جاتا ہے تو اللہ تعالیٰ اُسے کسی دوسرے گروہ کے ذریعے ہٹاتا رہتا ہے، جو کہ پہلے کے مقابلے میں عدل و انصاف کا نعرہ لے کر اٹھتا ہے۔

“یہ تو زمانے کے اتار چڑھاؤ ہیں جنہیں ہم لوگوں کے درمیان گردش دیتے رہتے ہیں۔” (آلِ عمران 3:140)
کیونکہ:
“اگر اللہ انسانوں کے ایک گروہ کو دوسرے گروہ کے ذریعے سے ہٹاتا نہ رہتا، تو زمین کا نظام بگڑ جاتا۔” (البقرہ 2:251)
یقیناً یہ اس لیے ہوتا ہے کہ “دنیا کے لوگوں پر اللہ کی بڑی مہربانی ہے” کہ وہ اس طرح بگاڑ کو دور کرنے کا انتظام فرماتا رہتا ہے۔

یعنی اللہ نے اپنی زمین کا نظام برقرار رکھنے کے لئے یہ قاعدہ مقرر فرمایا ہے کہ وہ انسانوں کے مختلف گروہوں کو ایک خاص حد تک تو زمین میں غلبہ اور طاقت عطا کرتا ہے، لیکن جب کوئی گروہ حد سے بڑھنے لگتا ہے تو کسی دوسرے گروہ کے ذریعے اس کا زور توڑ دیتا ہے۔ اگر ایسا نہ ہوتا اور کسی فرد، قوم، جماعت یا پارٹی کو ہمیشہ کے لیے حکومت دے دی جاتی، اور اس کا ظلم و ستم اور ناانصافی کبھی ختم نہ ہوتی، تو بلاشبہ زمین میں تباہی اور فساد پھیل جاتا۔

دنیا کی پوری تاریخ — اور خاص طور پر ہمارے پیارے ملک ہندوستان کی تاریخ — اس بات کی گواہ ہے کہ جب کسی حکمران گروہ کے گناہوں کا پیمانہ لبریز ہو گیا، تو اللہ نے اُسی جیسے کسی اور گروہ کے ذریعے اسے ہٹا دیا۔ اور جب وہ نیا گروہ بھی نفرت پھیلانے لگا تو اُسی جیسے ایک تیسرے گروہ کے ذریعے اُسے بھی ہٹا دیا گیا۔

لیکن اس کا مطلب ہرگز یہ نہیں کہ دنیا میں امن قائم کرنے کی جس ذمہ داری کو اللہ نے ایک خاص گروہ کے سپرد کیا ہے، وہ اس طرح کی اکھاڑ پچھاڑ دیکھ کر خوش ہوتا رہے، اور یہ سمجھ لے کہ ہمارے کرنے کا کام تو خودبخود ہو رہا ہے، اور بس ہمیں اتنا کرنا ہے کہ کم بُرے کو سپورٹ کرتے رہیں۔ جن لوگوں کو اللہ نے حق کی گواہی دینے اور امن قائم کرنے کی ذمہ داری دی ہے، اُن کے لیے یہ بڑی آزمائش کی گھڑی ہوتی ہے کہ وہ کم بُرے کو جتانے میں اپنی توانائیاں لگائیں گے یا اپنے اصل کام پر دھیان دیتے رہیں گے، اور جیسے ہی اللہ کی طرف سے موقع ملے، منظرِ عام پر آ کر عدل و انصاف کے قیام کے لیے سرگرم ہو جائیں گے۔

یاد رکھنا چاہیے کہ امن کے قیام کے لیے کوشاں گروہ کی کامیابی بھی اللہ کے ایک قانون کی تابع ہے — اور وہ یہ ہے کہ وہ گروہ خود پہلے اس پیغامِ حق پر پورا اُترے، اور پھر اسے یقین و اعتماد کے ساتھ لوگوں تک صاف گوئی سے پہنچائے۔ ممکن ہے کہ اس راہ میں ایک طویل مدت تک آزمائشوں کی بھٹی سے گزرنا پڑے، لیکن وہ اپنے صبر، سچائی، قربانی، وفاداری، ایمان کی مضبوطی اور اللہ پر بھروسے کا امتحان دیں۔ ان مشکلات سے گزر کر وہ اپنے اندر وہ اوصاف پیدا کریں جنہیں دیکھ کر لوگ پکار اٹھیں کہ یہی وہ لوگ ہیں جو زمین پر عدل و انصاف قائم کر سکتے ہیں۔

چنانچہ انہیں چاہیے کہ سب سے پہلے وہ علمِ حقیقی، بلند اخلاق، صبر و رضا اور انسانیت کی توقیر کے ہتھیاروں سے جاہلیت پر فتح حاصل کریں۔ جب وہ یہ ثابت کر دیں گے کہ ہم لینے نہیں بلکہ دینے آئے ہیں، ہم کسی خاص گروہ کے دشمن نہیں بلکہ پوری انسانیت کے خیر خواہ ہیں، ہم انسانوں کو غلام بنانے نہیں بلکہ انسانوں کو انسانوں کی غلامی سے نکال کر ایک اللہ کی غلامی میں لانا چاہتے ہیں — تب اللہ کی مدد اپنے وقت پر ان کا ہاتھ تھامنے کے لیے ضرور آئے گی۔

یاد رکھیں! وقت سے پہلے اللہ کی تائید اور نصرت کسی پر نازل نہیں ہوتی — یہاں تک کہ انبیاء پر بھی نہیں۔

ہندوستان میں بھی بار بار اللہ کی طرف سے یہ مواقع میسر آتے رہے ہیں، اور آج بھی میسر ہیں۔ ایسے میں جو گروہ حق کا عَلَم اٹھائے ہوئے ہے، اُسے چاہیے کہ سب سے پہلے خود کو حق پر ثابت قدم ثابت کرے، اور انسانوں کا خیر خواہ ثابت کرے۔ لوگوں کو یقین دلائے کہ وہ لینے نہیں بلکہ دینے کے لیے وجود میں آیا ہے۔ یوں نہ صرف عوامی حمایت اُسے نصیب ہو گی بلکہ اللہ کی مدد بھی نازل ہو گی۔

یہ کم بُرے کو سپورٹ کر کے خطرے کو ٹالنے کی ناکام کوششیں کرنا، یا آنے والے کٹھن حالات سے گھبرا کر زیادہ بُرے لوگوں کی گود میں جا بیٹھنا — یہ سب اللہ کے سامنے زبردست اور دوہری گرفت کا باعث بنے گا، جس کی سنگینی کا اندازہ بھی ممکن نہیں۔ بلکہ اس دنیا میں بھی انسانیت کو نہ کبھی عدل و انصاف نصیب ہوگا اور نہ کبھی حقیقی سکون و امن میسر آئے گا۔

اللہ ہمارا حامی و ناصر ہو۔

Hindi

कब आएगी अल्लाह की मदद

दुनिया में क़ौमों की हार-जीत का क़ायदा ये है कि जो गरोह सरकशी में एक हद से बढ़ता है तो अल्लाह उसे किसी दूसरे गरोह के ज़रिए हटाता रहता है, जो कि पहले के मुक़ाबले लोगों के दरम्यान अद्लो-इन्साफ़ का नारा लेकर उठता है।

“ये तो ज़माने के उतार-चढ़ाव हैं जिन्हें हम लोगों के बीच गर्दिश देते रहते हैं।” (3:140) क्योंकि

“अगर इस तरह अल्लाह इन्सानों के एक गरोह को दूसरे गरोह के ज़रिए से हटाता न रहता तो ज़मीन का निज़ाम बिगड़ जाता।” यक़ीनन ये इसीलिये होता है कि “दुनिया के लोगों पर अल्लाह की बड़ी मेहरबानी है” (कि वो इस तरह बिगाड़ को दूर करने का इन्तिज़ाम करता रहता है।)(2:251)

यानी अल्लाह ने अपनी ज़मीन का इन्तिज़ाम बनाए रखने के लिये ये क़ायदा बना रखा है कि वो इन्सानों के अलग-अलग गरोहों को एक ख़ास हद तक तो ज़मीन में ग़लबा और ताक़त हासिल करने देता है, मगर जब कोई गरोह हद से बढ़ने लगता है तो किसी दूसरे गरोह के ज़रिए से उसका ज़ोर तोड़ देता है। अगर कहीं ऐसा होता कि एक फ़र्द, एक क़ौम और कम्युनिटी या किसी एक पार्टी ही की हुकूमत ज़मीन में हमेशा बाक़ी रखी जाती और उसका क़हर (ज़ुल्म) और उसकी नाइंसाफ़ी कभी ख़त्म होनेवाली न होती, तो यक़ीनन अल्लाह की ज़मीन में एक बड़ी तबाही और फ़साद पैदा हो जाता। पूरी दुनिया की तारीख़ भी और ख़ुद हमारे प्यारे मुल्क हिंदुस्तान की तारीख़ भी इस बात की गवाह है कि जब एक हुक्मराँ गरोह के पापों का घड़ा भर गया तो अल्लाह ने उसी जैसे दूसरे गरोह के ज़रिए उसे हटा दिया, अब जब इस गरोह ने भी नफ़रत को ही बढ़ावा दिया तो उसी जैसे एक दूसरे गरोह के ज़रिए हटाने का इंतिज़ाम कर दिया गया।

लेकिन इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि दुनिया में अम्न के क़ियाम की ज़िम्मेदारी अल्लाह ने जिस गरोह को सौंपी थी वो इसी तरह की उठापटख़ से ख़ुश होता रहे और समझता रहे कि अब हमारे करने का काम ख़ुद-बख़ुद ही हो रहा है, और हमारे करने का काम बस इतना है कि जो कम बुरा है उसी को सपोर्ट करते रहें। जिन लोगों को अल्लाह ने हक़ की गवाही देने और अम्न के क़ियाम की ज़िम्मेदारी सौंपी है ये उनके लिये बड़ी इम्तिहान की घड़ी होती है कि वो किसी कम बुरे गरोह को जिताने की जिद्दोजुहद में अपनी मेहनत व सलाहियतें लगाते रहेंगे या एक मुद्दत तक अपने करने के काम पर फ़ोकस करते रहेंगे और जैसे ही अल्लाह की तरफ़ से कोई मौक़ा मुयस्सर आए तो अम्नो-अमान के क़ियाम और अद्लो-इन्साफ़ की बहाली के लिये मन्ज़रे-आम पर आएँगे।

ये बात याद रखनी चाहिये कि अम्न के क़ियाम के लिये जिद्दोजुहद करने वाले गरोह के कामयाब होने के लिये भी ख़ुदा का एक क़ानून है और वो ये कि वो गरोह उस पैग़ामे-हक़ पर पहले ख़ुद खरा उतर कर दिखाए और फिर उसे पूरे यक़ीन और एतिमाद के साथ लोगों के दरमियान बेलाग तरीक़े से पहुँचाए। इस काम को करते हुए हो सकता है एक लम्बी मुद्दत तक आज़माइशों की भट्टी में तपाया जाए, लेकिन अपने सब्र का, अपनी सच्चाई का, अपनी क़ुरबानी और फ़िदाकारी का, अपने ईमान की मज़बूती और अल्लाह पर अपने भरोसे का इम्तिहान दें। मुसीबतों और मुश्किलों के दौर से गुज़रकर अपने अन्दर वो सिफ़ात परवान चढ़ाएँ जिन्हें देखकर लोग पुकार उठें कि यही हैं वो लोग जो ज़मीन पर हक़ और इंसाफ़ क़ायम कर सकते हैं। लिहाज़ा उनको चाहिये कि सबसे पहले हक़ीक़ी इल्म, बुलन्द अख़लाक़, सब्रो-रज़ा और तकरीमे-इन्सानियत के हथियारों से जाहिलियत पर फ़तह हासिल करके दिखाएँ। इस तरह जब वो ये साबित कर देंगे कि हम कुछ लेने नहीं बल्कि इन्सानियत को कुछ देने आए हैं, किसी ख़ास गरोह के दुश्मन नहीं बल्कि तमाम इन्सानों के ख़ैरख़ाह हैं, इन्सानों को ग़ुलाम बनाना नहीं चाहते बल्कि इन्सानों को इन्सानों की ग़ुलामी से निकालकर एक अल्लाह की ग़ुलामी में ला खड़ा करना चाहते हैं। तब अल्लाह की नुसरत और मदद ठीक अपने वक़्त पर उनका हाथ थामने के लिए आ पहुँचेगी। याद रखें कि वक़्त से पहले अल्लाह की ताईद और नुसरत किसी के लिये नहीं उतरा करती, यहाँ तक कि नबियों के लिये भी नहीं।

मुल्के-अज़ीज़ हिंदुस्तान में अल्लाह की तरफ़ से बार-बार इस बात के मौक़े मिलते रहे हैं और आज भी मिल रहे हैं। इस मौक़े को ग़नीमत जानते हुए हक़ का अलम्बरदार गरोह उठे और सबसे पहले वो ख़ुद अपने आपको हक़ पर चलनेवाला साबित करे, अपने-आपको लोगों और इन्सानी समाज का ख़ैरख़ाह साबित करे। लोगों को ये यक़ीन दिलाए कि वो कुछ लेने नहीं बल्कि देने के लिये वुजूद में आया है। इस तरह न सिर्फ़ आम लोगों की हिमायत उस गरोह को मुयस्सर आएगी बल्कि ख़ुदा की ताईद और नुसरत भी नाज़िल होगी। ये कम बुरे लोगों की ताईद और हिमायत करके ख़तरे को टालने की नाकाम कोशिश करते रहना या आनेवाले मुश्किल हालात से घबराकर ज़्यादा बुरे लोगों की ही गोदों में जाकर बैठ जाने से ख़ुदा के सामने जो ज़बरदस्त और दोहरी पकड़ होगी उसकी संगीनी का तो ख़ैर कोई अन्दाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता बल्कि इस दुनिया में भी इन्सानियत को न कभी अद्लो-इन्साफ़ नसीब होगा और न कभी हक़ीक़ी अम्नो-सुकून मुयस्सर होगा।

अल्लाह हमारा हामी व नासिर हो।

In the world, the principle that governs the rise and fall of nations is this: when a group exceeds limits in rebellion, Allah removes it through another group that rises in comparison, bearing the banner of justice and equity among the people.
“These are the vicissitudes of time which We alternate among the people…” (Qur’an 3:140)
Because,
“If Allah did not repel some people by means of others, the earth would certainly be corrupted…” (Qur’an 2:251)
Indeed, this happens only because “Allah has immense mercy upon mankind” — He constantly arranges for disorder to be checked.
This means that Allah has established a law for managing the earth: He grants certain groups temporary dominance, but when one transgresses bounds, He breaks its power through another. Had any single individual, nation, community, or political party been granted eternal control — and if their tyranny and injustice were never brought to an end — then certainly a great corruption and devastation would have engulfed the earth.
The history of the entire world — and indeed our beloved country India — stands witness to this truth: when the sins of a ruling group reach their peak, Allah removes them through another. And when that new group also promotes hatred, Allah sets in place yet another to remove them.
But this by no means implies that the group entrusted by Allah with the responsibility to establish peace should simply sit back and feel content at the ongoing conflict. Nor should they assume that their only duty is to support the “lesser evil.” For those appointed as witnesses of truth and trustees of peace, this is a crucial moment of trial: will they waste their efforts and capabilities in trying to make the lesser evil prevail? Or will they stay focused on their own divine mission, and, when the time is right, rise to the stage with a vision of restoring justice and peace?
One must remember that even the success of a group striving for peace is subject to a divine law — that the group itself must first embody the message of truth and then convey it to others with confidence and sincerity. In doing so, they may be tested over a long period in the furnace of tribulations. They must prove their patience, honesty, sacrifice, and strong faith. Through these trials, they cultivate such qualities that the world itself begins to proclaim: These are the ones fit to establish truth and justice on earth!
Thus, they must first conquer ignorance with the weapons of authentic knowledge, noble character, patience, and human dignity. Once they prove that they have come not to take, but to give — not as enemies of a particular group, but as well-wishers of all humanity — once they demonstrate that they seek to liberate humans not to enslave them, but to deliver them from the servitude of fellow humans into the servitude of the One God — then Allah’s divine help will arrive at its appointed time.
Remember: divine assistance does not descend prematurely — not even for the Prophets.
In India too, Allah has continued to offer opportunities time and again — and even now such opportunities exist. Recognizing this, the group that carries the banner of truth must rise, and first and foremost, prove themselves to be true followers of truth, and genuine well-wishers of humanity. They must convince the people that they have come not to demand, but to give. In this way, not only will the support of the masses be granted to them, but divine help from Allah will also descend.
But if they keep attempting to ward off danger by supporting the lesser evil — or out of fear of tough times, fall into the lap of the greater evil — then the severe and doubled accountability before Allah will be unimaginable. And even in this world, humanity will never attain justice, nor experience true peace and tranquility.

May Allah be our Guardian and Helper.

 

دنیا میں قوموں کی ہار جیت کا قاعدہ یہی ہے کہ جب کوئی گروہ سرکشی میں ایک حد سے تجاوز کر جاتا ہے تو اللہ تعالیٰ اُسے کسی دوسرے گروہ کے ذریعے ہٹاتا رہتا ہے، جو کہ پہلے کے مقابلے میں عدل و انصاف کا نعرہ لے کر اٹھتا ہے۔

“یہ تو زمانے کے اتار چڑھاؤ ہیں جنہیں ہم لوگوں کے درمیان گردش دیتے رہتے ہیں۔” (آلِ عمران 3:140)
کیونکہ:
“اگر اللہ انسانوں کے ایک گروہ کو دوسرے گروہ کے ذریعے سے ہٹاتا نہ رہتا، تو زمین کا نظام بگڑ جاتا۔” (البقرہ 2:251)
یقیناً یہ اس لیے ہوتا ہے کہ “دنیا کے لوگوں پر اللہ کی بڑی مہربانی ہے” کہ وہ اس طرح بگاڑ کو دور کرنے کا انتظام فرماتا رہتا ہے۔

یعنی اللہ نے اپنی زمین کا نظام برقرار رکھنے کے لئے یہ قاعدہ مقرر فرمایا ہے کہ وہ انسانوں کے مختلف گروہوں کو ایک خاص حد تک تو زمین میں غلبہ اور طاقت عطا کرتا ہے، لیکن جب کوئی گروہ حد سے بڑھنے لگتا ہے تو کسی دوسرے گروہ کے ذریعے اس کا زور توڑ دیتا ہے۔ اگر ایسا نہ ہوتا اور کسی فرد، قوم، جماعت یا پارٹی کو ہمیشہ کے لیے حکومت دے دی جاتی، اور اس کا ظلم و ستم اور ناانصافی کبھی ختم نہ ہوتی، تو بلاشبہ زمین میں تباہی اور فساد پھیل جاتا۔

دنیا کی پوری تاریخ — اور خاص طور پر ہمارے پیارے ملک ہندوستان کی تاریخ — اس بات کی گواہ ہے کہ جب کسی حکمران گروہ کے گناہوں کا پیمانہ لبریز ہو گیا، تو اللہ نے اُسی جیسے کسی اور گروہ کے ذریعے اسے ہٹا دیا۔ اور جب وہ نیا گروہ بھی نفرت پھیلانے لگا تو اُسی جیسے ایک تیسرے گروہ کے ذریعے اُسے بھی ہٹا دیا گیا۔

لیکن اس کا مطلب ہرگز یہ نہیں کہ دنیا میں امن قائم کرنے کی جس ذمہ داری کو اللہ نے ایک خاص گروہ کے سپرد کیا ہے، وہ اس طرح کی اکھاڑ پچھاڑ دیکھ کر خوش ہوتا رہے، اور یہ سمجھ لے کہ ہمارے کرنے کا کام تو خودبخود ہو رہا ہے، اور بس ہمیں اتنا کرنا ہے کہ کم بُرے کو سپورٹ کرتے رہیں۔ جن لوگوں کو اللہ نے حق کی گواہی دینے اور امن قائم کرنے کی ذمہ داری دی ہے، اُن کے لیے یہ بڑی آزمائش کی گھڑی ہوتی ہے کہ وہ کم بُرے کو جتانے میں اپنی توانائیاں لگائیں گے یا اپنے اصل کام پر دھیان دیتے رہیں گے، اور جیسے ہی اللہ کی طرف سے موقع ملے، منظرِ عام پر آ کر عدل و انصاف کے قیام کے لیے سرگرم ہو جائیں گے۔

یاد رکھنا چاہیے کہ امن کے قیام کے لیے کوشاں گروہ کی کامیابی بھی اللہ کے ایک قانون کی تابع ہے — اور وہ یہ ہے کہ وہ گروہ خود پہلے اس پیغامِ حق پر پورا اُترے، اور پھر اسے یقین و اعتماد کے ساتھ لوگوں تک صاف گوئی سے پہنچائے۔ ممکن ہے کہ اس راہ میں ایک طویل مدت تک آزمائشوں کی بھٹی سے گزرنا پڑے، لیکن وہ اپنے صبر، سچائی، قربانی، وفاداری، ایمان کی مضبوطی اور اللہ پر بھروسے کا امتحان دیں۔ ان مشکلات سے گزر کر وہ اپنے اندر وہ اوصاف پیدا کریں جنہیں دیکھ کر لوگ پکار اٹھیں کہ یہی وہ لوگ ہیں جو زمین پر عدل و انصاف قائم کر سکتے ہیں۔

چنانچہ انہیں چاہیے کہ سب سے پہلے وہ علمِ حقیقی، بلند اخلاق، صبر و رضا اور انسانیت کی توقیر کے ہتھیاروں سے جاہلیت پر فتح حاصل کریں۔ جب وہ یہ ثابت کر دیں گے کہ ہم لینے نہیں بلکہ دینے آئے ہیں، ہم کسی خاص گروہ کے دشمن نہیں بلکہ پوری انسانیت کے خیر خواہ ہیں، ہم انسانوں کو غلام بنانے نہیں بلکہ انسانوں کو انسانوں کی غلامی سے نکال کر ایک اللہ کی غلامی میں لانا چاہتے ہیں — تب اللہ کی مدد اپنے وقت پر ان کا ہاتھ تھامنے کے لیے ضرور آئے گی۔

یاد رکھیں! وقت سے پہلے اللہ کی تائید اور نصرت کسی پر نازل نہیں ہوتی — یہاں تک کہ انبیاء پر بھی نہیں۔

ہندوستان میں بھی بار بار اللہ کی طرف سے یہ مواقع میسر آتے رہے ہیں، اور آج بھی میسر ہیں۔ ایسے میں جو گروہ حق کا عَلَم اٹھائے ہوئے ہے، اُسے چاہیے کہ سب سے پہلے خود کو حق پر ثابت قدم ثابت کرے، اور انسانوں کا خیر خواہ ثابت کرے۔ لوگوں کو یقین دلائے کہ وہ لینے نہیں بلکہ دینے کے لیے وجود میں آیا ہے۔ یوں نہ صرف عوامی حمایت اُسے نصیب ہو گی بلکہ اللہ کی مدد بھی نازل ہو گی۔

یہ کم بُرے کو سپورٹ کر کے خطرے کو ٹالنے کی ناکام کوششیں کرنا، یا آنے والے کٹھن حالات سے گھبرا کر زیادہ بُرے لوگوں کی گود میں جا بیٹھنا — یہ سب اللہ کے سامنے زبردست اور دوہری گرفت کا باعث بنے گا، جس کی سنگینی کا اندازہ بھی ممکن نہیں۔ بلکہ اس دنیا میں بھی انسانیت کو نہ کبھی عدل و انصاف نصیب ہوگا اور نہ کبھی حقیقی سکون و امن میسر آئے گا۔

اللہ ہمارا حامی و ناصر ہو۔

कब आएगी अल्लाह की मदद

दुनिया में क़ौमों की हार-जीत का क़ायदा ये है कि जो गरोह सरकशी में एक हद से बढ़ता है तो अल्लाह उसे किसी दूसरे गरोह के ज़रिए हटाता रहता है, जो कि पहले के मुक़ाबले लोगों के दरम्यान अद्लो-इन्साफ़ का नारा लेकर उठता है।

“ये तो ज़माने के उतार-चढ़ाव हैं जिन्हें हम लोगों के बीच गर्दिश देते रहते हैं।” (3:140) क्योंकि

“अगर इस तरह अल्लाह इन्सानों के एक गरोह को दूसरे गरोह के ज़रिए से हटाता न रहता तो ज़मीन का निज़ाम बिगड़ जाता।” यक़ीनन ये इसीलिये होता है कि “दुनिया के लोगों पर अल्लाह की बड़ी मेहरबानी है” (कि वो इस तरह बिगाड़ को दूर करने का इन्तिज़ाम करता रहता है।)(2:251)

यानी अल्लाह ने अपनी ज़मीन का इन्तिज़ाम बनाए रखने के लिये ये क़ायदा बना रखा है कि वो इन्सानों के अलग-अलग गरोहों को एक ख़ास हद तक तो ज़मीन में ग़लबा और ताक़त हासिल करने देता है, मगर जब कोई गरोह हद से बढ़ने लगता है तो किसी दूसरे गरोह के ज़रिए से उसका ज़ोर तोड़ देता है। अगर कहीं ऐसा होता कि एक फ़र्द, एक क़ौम और कम्युनिटी या किसी एक पार्टी ही की हुकूमत ज़मीन में हमेशा बाक़ी रखी जाती और उसका क़हर (ज़ुल्म) और उसकी नाइंसाफ़ी कभी ख़त्म होनेवाली न होती, तो यक़ीनन अल्लाह की ज़मीन में एक बड़ी तबाही और फ़साद पैदा हो जाता। पूरी दुनिया की तारीख़ भी और ख़ुद हमारे प्यारे मुल्क हिंदुस्तान की तारीख़ भी इस बात की गवाह है कि जब एक हुक्मराँ गरोह के पापों का घड़ा भर गया तो अल्लाह ने उसी जैसे दूसरे गरोह के ज़रिए उसे हटा दिया, अब जब इस गरोह ने भी नफ़रत को ही बढ़ावा दिया तो उसी जैसे एक दूसरे गरोह के ज़रिए हटाने का इंतिज़ाम कर दिया गया।

लेकिन इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि दुनिया में अम्न के क़ियाम की ज़िम्मेदारी अल्लाह ने जिस गरोह को सौंपी थी वो इसी तरह की उठापटख़ से ख़ुश होता रहे और समझता रहे कि अब हमारे करने का काम ख़ुद-बख़ुद ही हो रहा है, और हमारे करने का काम बस इतना है कि जो कम बुरा है उसी को सपोर्ट करते रहें। जिन लोगों को अल्लाह ने हक़ की गवाही देने और अम्न के क़ियाम की ज़िम्मेदारी सौंपी है ये उनके लिये बड़ी इम्तिहान की घड़ी होती है कि वो किसी कम बुरे गरोह को जिताने की जिद्दोजुहद में अपनी मेहनत व सलाहियतें लगाते रहेंगे या एक मुद्दत तक अपने करने के काम पर फ़ोकस करते रहेंगे और जैसे ही अल्लाह की तरफ़ से कोई मौक़ा मुयस्सर आए तो अम्नो-अमान के क़ियाम और अद्लो-इन्साफ़ की बहाली के लिये मन्ज़रे-आम पर आएँगे।

ये बात याद रखनी चाहिये कि अम्न के क़ियाम के लिये जिद्दोजुहद करने वाले गरोह के कामयाब होने के लिये भी ख़ुदा का एक क़ानून है और वो ये कि वो गरोह उस पैग़ामे-हक़ पर पहले ख़ुद खरा उतर कर दिखाए और फिर उसे पूरे यक़ीन और एतिमाद के साथ लोगों के दरमियान बेलाग तरीक़े से पहुँचाए। इस काम को करते हुए हो सकता है एक लम्बी मुद्दत तक आज़माइशों की भट्टी में तपाया जाए, लेकिन अपने सब्र का, अपनी सच्चाई का, अपनी क़ुरबानी और फ़िदाकारी का, अपने ईमान की मज़बूती और अल्लाह पर अपने भरोसे का इम्तिहान दें। मुसीबतों और मुश्किलों के दौर से गुज़रकर अपने अन्दर वो सिफ़ात परवान चढ़ाएँ जिन्हें देखकर लोग पुकार उठें कि यही हैं वो लोग जो ज़मीन पर हक़ और इंसाफ़ क़ायम कर सकते हैं। लिहाज़ा उनको चाहिये कि सबसे पहले हक़ीक़ी इल्म, बुलन्द अख़लाक़, सब्रो-रज़ा और तकरीमे-इन्सानियत के हथियारों से जाहिलियत पर फ़तह हासिल करके दिखाएँ। इस तरह जब वो ये साबित कर देंगे कि हम कुछ लेने नहीं बल्कि इन्सानियत को कुछ देने आए हैं, किसी ख़ास गरोह के दुश्मन नहीं बल्कि तमाम इन्सानों के ख़ैरख़ाह हैं, इन्सानों को ग़ुलाम बनाना नहीं चाहते बल्कि इन्सानों को इन्सानों की ग़ुलामी से निकालकर एक अल्लाह की ग़ुलामी में ला खड़ा करना चाहते हैं। तब अल्लाह की नुसरत और मदद ठीक अपने वक़्त पर उनका हाथ थामने के लिए आ पहुँचेगी। याद रखें कि वक़्त से पहले अल्लाह की ताईद और नुसरत किसी के लिये नहीं उतरा करती, यहाँ तक कि नबियों के लिये भी नहीं।

मुल्के-अज़ीज़ हिंदुस्तान में अल्लाह की तरफ़ से बार-बार इस बात के मौक़े मिलते रहे हैं और आज भी मिल रहे हैं। इस मौक़े को ग़नीमत जानते हुए हक़ का अलम्बरदार गरोह उठे और सबसे पहले वो ख़ुद अपने आपको हक़ पर चलनेवाला साबित करे, अपने-आपको लोगों और इन्सानी समाज का ख़ैरख़ाह साबित करे। लोगों को ये यक़ीन दिलाए कि वो कुछ लेने नहीं बल्कि देने के लिये वुजूद में आया है। इस तरह न सिर्फ़ आम लोगों की हिमायत उस गरोह को मुयस्सर आएगी बल्कि ख़ुदा की ताईद और नुसरत भी नाज़िल होगी। ये कम बुरे लोगों की ताईद और हिमायत करके ख़तरे को टालने की नाकाम कोशिश करते रहना या आनेवाले मुश्किल हालात से घबराकर ज़्यादा बुरे लोगों की ही गोदों में जाकर बैठ जाने से ख़ुदा के सामने जो ज़बरदस्त और दोहरी पकड़ होगी उसकी संगीनी का तो ख़ैर कोई अन्दाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता बल्कि इस दुनिया में भी इन्सानियत को न कभी अद्लो-इन्साफ़ नसीब होगा और न कभी हक़ीक़ी अम्नो-सुकून मुयस्सर होगा।

अल्लाह हमारा हामी व नासिर हो।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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