समाज में पॉज़िटिव तब्दीली लाने के लिये दो चीज़ें बहुत अहम हैं :
एक ये कि जिस फ़र्द या गरोह को जिन उसूलों पर तब्दीली लानी है उसे उन उसूलों और बुनियादों का गहरा इल्म और शुऊर भी होना चाहिये और उनपर पुख़्ता यक़ीन भी। उन उसूलों पर ख़ुद पूरी यकसूई के साथ अमल-पैरा भी हो और दूसरों को उनकी तरफ़ दावत भी दे। इसी के साथ उस दौर के इल्म व फ़न में किसी हद तक महारत भी हो तो आसानी होगी।
दूसरे ये कि उस फ़र्द या गरोह को लोगों का इन्तिहाई ख़ैरख़ाह और ग़म-ख़्वार होना चाहिये। ये ग़मगुसारी गरोही या क़ौमी तास्सुब की बुनियाद पर नहीं बल्कि इन्सानी बुनियादों पर होनी चाहिये।
अक्सर देखा ये गया है कि ये दोनों ही काम जब इंस्टीट्यूशनलाइज़ हो जाते हैं तो इन कामों में तहरीकियत बाक़ी नहीं रहती बल्कि यही काम खाने-कमाने का ज़रिआ बन जाते हैं और लोगों के अन्दर एक गरोही और क़ौमी तास्सुब जन्म लेने लगता है; जिससे या तो निरी मज़हबियत परवान चढ़ने लगती है जो आसमान से ऊपर की बातें करते हैं या फिर तास्सुब में अन्धे होकर क़ौमी दिफ़ाअ में अपनी क़ुव्वतें और सलाहियतें ज़ाय करने लगते हैं, जिसे मुक़ाबिल की क़ौम कभी बर्दाश्त नहीं करती। अगर वो क़ौम ताक़त के नशे में चूर हो तो पहले गरोह को ग़ुलाम बनाकर रखती है और दूसरे को कुचलकर रख देती है।
अगर हम इस्लामी बुनियादों पर समाज में कोई बड़ी तब्दीली लाना चाहते हैं तो ज़रूरी है कि इस्लाम के उसूलों का पूरे शुऊर और यक़ीन के साथ इल्म हासिल करें, उनपर ख़ुद अमल करें, अपने मुआशरे को उनपर ढालने की कोशिश करते रहें और साथ ही साथ इन्सानी ग़मख़्वारी के जज़्बे से सरशार होकर इन्सानों को उन उसूलों की तरफ़ दावत के लिये उठ खड़े हों।