तलाक़ का क़ुरआनी तरीक़ा
इस्लाम अपनी फ़ितरत और स्वभाव में रहमत का दीन है. इन्साफ़, मसावात (बराबरी) और मवासात (ग़मख़ारी) का दीन है. इस्लाम की नज़र में तमाम इन्सान बराबर हैं चाहे वे मर्द हों या औरत. पिछले कुछ दिनों से मीडिया में तीन तलाक़ के मसले पर ख़वातीन के ऊपर ज़ुल्म को लेकर काफ़ी बहस चल निकली है. मज़हब बेज़ार, नाम-निहाद मुस्लिम मर्द व ख़वातीन की एक फ़ौज है जिसने क़ुरआन को ढाल बनाकर तीन तलाक़ को ख़त्म कराने का बीड़ा उठा रखा है, इस आवाज़ में इस्लाम पसंद दानिश्वरों की आवाज़ भी कभी-कभी सुनने में आ जाती है. दूसरी तरफ़ शरीअत का डंडा लेकर हज़रत मौलानाओं और मज़हबी जमाअतों का लश्कर है जिनका दावा है कि हमें मुस्लिम अवाम में से बड़ी अक्सरियत की हिमायत हासिल है लेकिन क़ुरआनी दलीलों का फ़ुक़दान (कमी) है. ऐसी हालत में एक आम पढ़ा-लिखा और इस्लाम के ताल्लुक़ से हस्सास तबक़ा मसले की सही नौईअत जानना चाहता है ताकि वो ये जान सके कि आख़िर सही बात क्या है?
इस सिलसिले में सबसे पहली बात तो ये है कि हममें से हरेक को क़ुरआन से वाबस्ता होना चाहिए और उसके मुताबिक़ ही ज़िन्दगी के तमाम मामलात को हल करना चाहिए. क़ुरआन जिस काम को करने के लिए कहे वो करना चाहिए और जिस काम से रोक दे उससे रुक जाना चाहिए. बदक़िस्मती से ये काम न अब तक हो पाया है और न इस बहस में इस चीज़ को अब भी अहमियत दी जा रही है.
दूसरी बात ये कि अल्लाह ने शौहर-बीवी के रिश्ते के अन्दर मुहब्बत रखी है (क़ुरआन 30:21) इसलिए उनको चाहिए कि वे आपस के ताल्लुक़ात को निबाहने की पूरी-पूरी कोशिश करें और शादी-शुदा ज़िन्दगी से सुकून हासिल करें. इस सिलसिले में क़ुरआन ये उसूल बयान करता है कि एक दूसरे की कमी को नज़र अन्दाज़ करते हुए ख़ूबी पर नज़र रखें. बीवी के अन्दर कोई कमी है तो अल्लाह ने उसमें तुम्हारे लिए दूसरी कोई न कोई भलाई ज़रूर रखी होगी. (4:19)
तीसरी बात ये कि अगर दोनों में नाचाक़ी हो जाए तो समझने-समझाने की इन्तिहाई कोशिश करनी चाहिए, मर्द और औरत दोनों की तरफ़ से एक-एक आदमी ऐसा तय कर लिया जाए जो मसले को सुलझा सकने की सलाहियत रखता हो, अगर वे दोनों सुलह कराना चाहेंगे तो अल्लाह मसालिहत की कोई न कोई राह निकाल ही देगा. (4:34,35)
चौथी बात ये कि तलाक़ अगर देनी ही पड़ जाए (अल्लाह के नबी ने इसे जायज़ कामों में सबसे नापसन्द ठहराया है) तो सिर्फ़ एक ही बार देनी चाहिए. (तफ़सील के लिए देखें 65:1,2) यही क़ुरआनी तरीक़ा है. इस एक बार के तलाक़ देने से भी मुकम्मल अलाहदगी हो सकती है ज़रूरी नहीं है कि आप तीन बार ही तलाक़ कहें. जब एक बार के कहने से ही काम चल जाता हो तो इससे ज़्यादा की ज़रूरत ही क्या है. अलबत्ता एक बार के तलाक़ कहने से इस बात की गुंजाइश ज़रूर रहती है कि अगर शौहर-बीवी राज़ी हो जाएँ (और इसी बात की कोशिश भी की जाए) तो फिर से साथ रह सकते हैं. यह तलाक़ दो बार दी जा सकती है. (2:229) लेकिन अगर दो बार से ज़्यादा की नौबत आती है तो समझ लेना चाहिए कि तलाक़ कोई मज़ाक़ नहीं है कि ज़िन्दगी भर यही खेल चलता रहे. अब मुकम्मल अलाहदगी हो जाएगी और आपस के ताल्लुक़ को बहाल करने की कोई सूरत न बचेगी.
पाँचवी बात ये है कि तीन तलाक़ एक ही बार में देना इन्तिहाई घिनावनी, ज़लील और ग़ैर क़ुरआनी हरकत है. ऐसी हरकत कोई शख़्स दो ही वजहों से कर सकता है एक तो यह कि वह क़ुरआन को न जानता-समझता हो और किरदार का बहुत ही घटिया और ओछा हो; दूसरे यह कि उसे बीवी की किसी नाज़ेबा और नीच हरकत से ऐसी नफ़रत हो गई हो कि वह उसके साथ एक सेकंड के लिए भी रहना गवारा न कर सकता हो.
अगर पहली बात है तो ये औरत के वक़ार और गरिमा के ख़िलाफ़ है. औरत को चाहिए कि उस जाहिल और घटिया इन्सान के साथ ज़िन्दगी का एक लम्हा भी न गुज़ारे, बल्कि इस नाज़ेबा हरकत पर मर्द को सज़ा भी मिले, क्योंकि प्यारे नबी (सल्ल०) और हज़रत उमर (रज़ि०) ने इस तरह की ग़ैर-क़ुरआनी और घिनावनी हरकत करने वाले शख़्स को सज़ा दी है. अगर दूसरी बात साबित हो जाती है तो मर्द को भी अपनी गरिमा को बचाए रखने का हक़ दिया जाना चाहिए और ख़ामोशी से दोनों को हमेशा के लिए अलाहदा कर देना चाहिए.
लिहाज़ा इस सिलसिले में करने के तो बहुत-से काम हो सकते हैं लेकिन सरे-दस्त दो काम बहुत अहम हैं.
एक तो यह कि क़ुरआन की तालीमात को आम किया जाए ताकि आम लोगों (ख़ास तौर से नौजवान लड़के-लड़कियों) को निकाह व तलाक़ का सही तरीक़ा मालूम रहे. वे अपने हुक़ूक़ व इख़्तियारात से वाक़िफ़ हों और उन्हें अदा करने के बारे में फ़िक्रमन्द भी हों.
दूसरे यह कि अगर किसी ने बेवजह तीन तलाक़ें एक साथ दी हैं तो बजाए इसके कि तीन तलाक़ के option को ख़त्म किया जाए (कि rarest of the rarest मामलों में इसकी भी ज़रूरत पड़ सकती है) औरत के वक़ार को मजरूह होने से बचाया जाए, ऐसे शख़्स से फ़ौरन उसे नजात दिलाकर मर्द को सज़ा तजवीज़ की जाए.
मुहम्मद अली शाह शुऐब