दावत का लुग़वी माना : दावत ‘द-अ-व’ से बना है जिसके माने हैं किसी को अपनी आवाज़ या बात से अपनी तरफ़ मायल और मुतवज्जेह कर लेना। सूरा बक़रा आयत-23 में कहा गया कि तुम अपने मददगारों को पुकारो।
وَ ادۡعُوۡا شُہَدَآءَکُمۡ مِّنۡ دُوۡنِ اللّٰہِ اِنۡ کُنۡتُمۡ صٰدِقِیۡنَ
“एक अल्लाह को छोड़कर बाक़ी जिसकी चाहो (मदद के लिये) बुला लो, अगर तुम सच्चे हो तो ये काम करके दिखाओ।
सूरा-2, आयत-61 में हैं कि अपने परवरदिगार को पुकारो। فَادۡعُ لَنَا رَبَّکَ
इसी से ‘दावा’ बना है जिसका मतलब बात, पुकार, मुतालबा या तक़ाज़ा है।
دَعۡوٰىہُمۡ فِیۡہَا سُبۡحٰنَکَ اللّٰہُمَّ ………وَ اٰخِرُ دَعۡوٰىہُمۡ اَنِ الۡحَمۡدُ لِلّٰہِ رَبِّ الۡعٰلَمِیۡنَ(10:10)
“वहाँ उनकी पुकार होगी कि ‘पाक है तू ऐ ख़ुदा!’….. और उनकी हर बात इस पर ख़त्म होगी कि “सारी तारीफ़ अल्लाह रब्बुल-आलमीन के लिये है।“
दावत के इस्तिलाही माना: दावत का इस्तिलाही माना होगा लोगों को एक अल्लाह की तरफ़ बुलाना या लोगों को उस दीन और निज़ामे-ज़िन्दगी की तरफ़ पुकारना जिसे अल्लाह की तरफ़ से मुहम्मद (सल्ल) ने हम तक पहुँचाया था।
दीन में दावत की अहमियत: जिस चीज़ या जिस बात की हमारी नज़र में बहुत ज़्यादा अहमियत होती है उसे हम बार-बार और मुख़्तलिफ़ नामों से जानते और पुकारते हैं। क़ुरआन में दावत की अहमियत के ताल्लुक़ से भी ये बात सच साबित होती है। क़ुरआन में इस दावत को बहुत बार और मुख़्तलिफ़ नामों से पुकारा गया है मसलन कहीं इसे शहादत-अलन्नास (यानी लोगों पर गवाही) के नाम से पुकारा गया है। (देखें क़ुरआन 2:143; 22:78) और कहीं इसे बयान और तबयीन का नाम दिया गया है। (देखें 2:160; 16:44) कहीं इसे नसीहत कहा गया; तो कहीं इसे तब्लीग़ का नाम दिया गया। (5:67) कहीं इसे इंज़ार और तबशीर (डराना और ख़ुशख़बरी) कहा है। (48:8) तो कहीं इसे तज़्कीर का नाम दिया गया। (87:9) ग़रज़ ये कि नाम भले ही मुख़्तलिफ़ हों लेकिन बात एक ही कही गई है कि लोगों को बुलाओ, पुकारो, नसीहत करो, डराओ या उसके पैग़ाम को पहुँचाओ वग़ैरा।
दावत के सिलसिले में ग़लतफ़हमियाँ : दावत के सिलसिले में ग़लतफ़हमी ये है कि ये फ़र्ज़ नहीं है बस उसी तरह का कोई अमल है कि न भी किया जाए तो कोई हरज नहीं है। ये ग़लतफ़हमी दरअस्ल दो-तीन वजह से पैदा हुई :
1) ये ग़लतफ़हमी इस वजह से है कि दावत का लफ़्ज़ हमने ग़ैर-मुस्लिम हज़रात के लिये ख़ास कर दिया कि दावत तो सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिमों को दी जाएगी मुसलमान इससे मुराद नहीं है, मुसलमानों में तो इस्लाह का काम किया जाएगा। हालाँकि क़ुरआन व हदीस में कहीं नहीं है कि दावत सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिम को ही दी जाएगी। अब चूंकि ग़ैर-मुस्लिम को दावत देने के लिये ख़ास सलाहियत होनी चाहिये और वो सलाहियत हममें मौजूद नहीं है इसलिये हम ये काम नहीं कर सकते।
2) दूसरी वजह ये रही है कि क़ुरआन में एक आयत में अल्लाह ने फ़रमाया है कि
وَ لْتَكُنْ مِّنْكُمْ اُمَّةٌ يَّدْعُوْنَ اِلَى الْخَيْرِ وَ يَاْمُرُوْنَ بِالْمَعْرُوْفِ وَ يَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ١ؕ وَ اُولٰٓىِٕكَ هُمُ الْمُفْلِحُوْنَ
“तुम में से कुछ लोग तो ऐसे ज़रूर ही होने चाहियें जो नेकी की तरफ़ बुलाएँ, भलाई का हुक्म दें, और बुराइयों से रोकते रहें। जो लोग ये काम करेंगे वही लोग कामयाब होंगे।”
इस आयत से ये समझ लिया गया कि इसमें कहा गया कि तुममें से कुछ लोग ऐसे होने चाहियें, लिहाज़ा सबके लिये ज़रूरी नहीं है। इसलिये ये फ़र्ज़े-किफ़ाया है न की फ़र्ज़े-ऐन। यानी अगर कुछ लोग कर लें तो सब पर से ये फ़र्ज़ अदा हो जाएगा। हालाँकि ख़ुद आयत इस बात की तरदीद करती है कि जो लोग ये काम करेंगे वही कामयाब होंगे। अल्लामा इब्ने-कसीर फ़रमाते हैं कि “इस आयत का मक़सूद ये है कि इस उम्मत का एक तबक़ा इस फ़रीज़े और हुक्म की अदायगी के लिये मौजूद होना चाहिये हालाँकि ये काम इस उम्मत के एक-एक फ़र्द पर इनफ़िरादी तौर पर अपनी-अपनी ताक़त और सलाहियत के मुताबिक़ वाजिब है।”
क़ुरआन से भी ये बात वाज़ेह होती है; चुनांचे कहा गया कि :
كُنْتُمْ خَيْرَ اُمَّةٍ اُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَاْمُرُوْنَ بِالْمَعْرُوْفِ وَ تَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَ تُؤْمِنُوْنَ بِاللّٰهِ١ؕ۱۱۰{البقرہ}
दुनिया में बेहतरीन गरोह तुम हो जिसे इन्सानों की हिदायत और इस्लाह के लिये मैदान में लाया गया है। तुम नेकी का हुक्म देते हो, बदी से रोकते और अल्लाह पर ईमान रखते हो।
फिर ये भी कि وَ كَذٰلِكَ جَعَلْنٰكُمْ اُمَّةً وَّسَطًا لِّتَكُوْنُوْا شُهَدَآءَ عَلَى النَّاسِ وَ يَكُوْنَ الرَّسُوْلُ عَلَيْكُمْ شَهِيْدًا
“और इसी तरह तो हमने तुम मुसलमानों को एक “बीच की उम्मत” बनाया है ताकि तुम दुनिया के लोगों पर गवाह हो और रसूल तुम पर गवाह हो।” (2:143)
दावत का काम क्यों ज़रूरी है : इस्लाम चूँकि दीने-रहमत है, चूँकि ये सलामती और शान्ति का दीन है और सलामती और शान्ति हर शख्स की बुनियादी ज़रूरत है इस लिहाज़ है दावत का काम ज़रूरी है। सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिम ही को नहीं मुसलमानों को भी सलामती की ज़रूरत है; इसलिये इस काम का किया जाना ज़रूरी है। हक़ीक़त में पूरी दुनिया को तबाही से बचाने का सिर्फ़ एक ही तरीक़ा है कि लोगों को अम्न और सलामती यानी इस्लाम की दावत दी जाए उनको रहमत की तरफ़ बुलाया जाए। अब चूँकि ख़ुद मुसलमान अम्न व सलामती के इस दीन से बहुत दूर हैं लिहाज़ा उन्हें सबसे पहले इसकी तरफ़ पुकारा जाए।
दावत का काम इसलिये भी ज़रूरी है कि क़ुरआन कहता है कि अगर तुम्हारे पास हक़ है और तुम उसको छिपा लो तो ये ज़ुल्मे-अज़ीम है :
وَ مَنْ اَظْلَمُ مِمَّنْ كَتَمَ شَهَادَةً عِنْدَهٗ مِنَ اللّٰه
इसके बरख़िलाफ़ ये भी कहा कि जो हक़ बात को पहुँचा दे तो इससे बड़ी भलाई का कोई काम नहीं है : وَمَنْ اَحْسَنُ قَوْلً مِّمّنْ دَعَ اِلَیْ اللہ وَعَمِلَ صاَلِحاًوَّقاَلَ اِنَّنیِ مِنَ الْمُسْلِمیِنْ
उस शख़्स से बढ़कर अच्छी बात और किसकी होगी जो लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाए और ख़ुद नेका अमल करे और कहे कि मैं मुसलमान हूँ।
एक आयत में अल्लाह फ़रमाता है कि जो हक़ को छिपा ले और लोगों तक न पहुँचाए उस पर अल्लाह की लानत और तमाम लानत करने वालों की लानत :
اِنَّ الَّذِيْنَ يَكْتُمُوْنَ مَاۤ اَنْزَلْنَا مِنَ الْبَيِّنٰتِ وَ الْهُدٰى مِنْۢ بَعْدِ مَا بَيَّنّٰهُ لِلنَّاسِ فِي الْكِتٰبِ١ۙ اُولٰٓىِٕكَ يَلْعَنُهُمُ اللّٰهُ وَ يَلْعَنُهُمُ اللّٰعِنُوْنَۙ 2:259
दावत क्या देनी है? दावत का मतलब और उसकी अहमियत समझ लेने के बाद एक बात ये भी समझने की है कि दावत क्या है जो लोगों तक पहुँचानी है। प्यारे नबी (सल्ल०) के सामने तो बस लोग थे जिनको आपने दावत पहुँचाई, लेकिन इस वक़्त मसला ये है कि हमारे सामने दो तरह के लोग हैं एक तो वो हैं जो इस्लाम को मानने का दावा करते हैं लेकिन इस्लाम से दूर हैं, और दूसरे कुछ लोग ऐसे हैं जो सिरे से इस्लाम को मानते ही नहीं हैं। चुनांचे इन दोनों तरह के लोगों को सामने रखते हुए हमारी दावत में तीन बातें हो सकती हैं जो बेलाग हैं :
1) तमाम बन्दगाने ख़ुदा को आम तौर से और मुसलमानों को ख़ास तौर से अल्लाह की बन्दगी की दावत दी जाए कि यही तमाम नबियों की दावत रही है।
2) जो लोग मुसलमान होने का दावा करते हैं उन्हें इस बात की तरफ़ दावत दी जाए कि जब वो मुसलमान हैं तो इस्लाम की सही-सही नुमाइन्दगी करें।
3) जिस समाज में हम रहते हैं उसमें जो ज़िम्मेदार हैं उन्हें इस बात की दावत दी जाए कि वो समाज में लोगों के साथ ख़ुदा से डरकर मामला करें या उन पदों पर ऐसे लोगों को बिठाने की दावत जो ख़ुदा से डरकर लोगों के साथ मामला करें।
दावत का तरीक़ा क्या होगा? इस सिलसिले में क़ुरआन ने रहनुमाई की है कि-
اُدْعُ اِلٰى سَبِيْلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَ الْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ وَ جَادِلْهُمْ بِالَّتِيْ هِيَ اَحْسَنُ١ؕ
लोगों को अल्लाह के रास्ते की तरफ़ बुलाओ हिकमत और उम्दा नसीहत के साथ और उनके साथ डिस्कशन करो बेहतरीन तरीक़े से (ताकि उनकी बात समझ में आए)
हिकमत से मुराद ये है कि लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाने में पूरी सूझ-बूझ और अक़लमन्दी से काम लिया जाए। उम्दा नसीहत से मुराद ये है कि कोई बात ग़लत न हो, ख़िलाफ़े-वाक़िआ न हो और हमदर्दी से भरी हुई हो। और फिर उनके साथ ऐसे तरीक़े से डिस्कशन करो कि वो बात को समझने के लिये आमादा हो जाएँ, जहाँ बात झगड़े और कठहुज्जती पर आ जाए तो रुक जाओ और किसी मुनासिब वक़्त का इन्तिज़ार करो ताकि वो बात को समझ सके। इस सिलसिले में सूरा यूसुफ़ का मुताला बहुत मुफ़ीद होगा कि हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपनी बात किस तरह लोगों तक पहुँचाई।
कुछ तरीक़े जो हमें दावत के सिलसिले में इख़्तियार करने चाहियें वो इस तरह हो सकते हैं : (अमन का ये पैग़ाम चाहे किसी ऐसे शख़्स को पहुँचाया जा रहा हो मुसलमान होने का दावा कर रहा हो या उसे जो इस्लाम को न मानता हो)
(1) कॉमन इशूज़ पर बात की शुरूआत करें (2) अपनी क़ौम का या अपने मसलक का ख़ाह-मख़ाह दिफ़ाअ (Deffence) न किया जाए। हम मुसलमानों की तरफ़ दावत देने या मसलक की तरफ़ दावत देने के लिये खड़े नहीं हुए हैं। (3) सामने वाले के मैयार और उसकी ज़बान का लिहाज़ रखा जाए ताकि उसे बात को समझने में आसानी हो। (4) किसी के मज़हब या मसलक की मुख़ालिफ़त न की जाए और न उनके बुज़ुर्गों को बुरा भला कहा जाए। (5) जिससे भी बात की जाए ख़ैर-ख़ाही के जज़्बे के साथ की जाए, उसे लगे कि आप उसकी और पूरे समाज की भलाई की बात कर रहे हैं। (6) बन्दों से अपने काम की अजर की तवक़्क़ो न रखें (7) लोगों की हिदायत के लिये अल्लाह से दुआ भी करें। कि हिदायत देनेवाला अल्लाह है
اِنَّكَ لَا تَهْدِيْ مَنْ اَحْبَبْتَ وَ لٰكِنَّ اللّٰهَ يَهْدِيْ مَنْ يَّشَآءُ١ۚ وَ هُوَ اَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِيْنَ ط
ऐ नबी, तुम जिसे चाहो उसे हिदायत नहीं दे सकते, मगर अल्लाह जिसे चाहता है हिदायत देता है और वो उन लोगों को ख़ूब जानता है जो हिदायत क़बूल करनेवाले हैं।
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नोट : हिफ़्ज़ करने के लिये आज की आयत सूरा-16, आयत-125
اُدْعُ اِلٰى سَبِيْلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَ الْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ وَ جَادِلْهُمْ بِالَّتِيْ هِيَ اَحْسَنُ١ؕ
लोगों को अल्लाह के रास्ते की तरफ़ बुलाओ हिकमत और उम्दा नसीहत के साथ और उनके साथ डिस्कशन करो बेहतरीन तरीक़े से (ताकि उनकी बात समझ में आए)