हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
——-
मतलब
अगर ये कहा जाए तो बेजा बात न होगी कि इन्सान ख़्वाहिशों का पुतला है। इन्सान के अन्दर ख़्वाहिशात इतनी हैं कि एक पूरी होने नहीं पाती, दूसरी पैदा हो जाती है और इस तरह ख़्वाहिशों का एक समन्दर इन्सान के वुजूद में मौजें मारता रहता है। इन्सान की बहुत-सी ख़्वाहिशात जो पूरी हो भी जाती हैं लेकिन उनसे कहीं ज़्यादा वो ख़्वाहिशात होती हैं जो पूरी होने से रह जाती हैं और इन्हीं हसरतों के साथ इन्सान की मौत का वक़्त आ पहुँचता है। शेर का हासिल ये है कि ख़्वाहिशों को ही पूरी करने की फ़िक्र में नहीं लगे रहना चाहिये इनका हाल तो ये है कि मरते दम तक भी पूरी नहीं होंगी, बल्कि इन्सानियत के लिये कुछ कंट्रीब्यूट करने, समाज में अमनो-सलामती की बहाली और अद्लो-इन्साफ़ क़ायम करने के लिये हर वक़्त तैयार रहे।