पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल०) ने फ़रमाया: बन्दा ख़ुदा के सबसे ज़्यादा क़रीब उस वक़्त होता है जब वो (नमाज़ की हालत में) सजदे में होता है.
इस हदीस से मालूम होता है कि नमाज़ ख़ुदा से क़रीब होने और उस तक अपनी बात पहुँचाने का बेहतरीन ज़रिआ है. लेकिन बहुत-से लोग ऐसे बदक़िस्मत भी हैं जो नमाज़ पढ़ने के बावजूद अपने रब के क़रीब नहीं हो पाते.
वे कौन लोग हैं?
उनके बारे में प्यारे नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया कि
जिसकी नमाज़ ने उसे फ़ुहश और बुरे कामों से न रोका, उससे तो वो ख़ुदा से और भी ज़्यादा दूर हो गया।
इस्लाम चाहता यह है कि इंसान की ज़िन्दगी नमाज़ के मुताबिक़ हो. नमाज़ इंसान की ज़िन्दगी की तशरीह साबित हो। इस मक़सद को हासिल करने के लिए ज़रूरी है कि नमाज़ समझ-बूझकर पढ़ी जाए। नमाज़ पढ़ते वक़्त इंसान को यह ख़याल रहे कि वह अपने पालनहार रब के सामने खड़ा है और उसी से वह दुआ कर रहा है। यह ख़याल तो दिल में ज़रूर ही रहना चाहिए कि ख़ुदा उसे देख रहा है और उसकी बातें सुन रहा है।
नमाज़ से पूरा फ़ायदा उठाने के लिए ये भी ज़रूरी है कि इंसान अपना जायज़ा लेता रहे कि नमाज़ में उसने अपने रब से जो भी वादे किये हैं उनको पूरा करने की पूरी कोशिश करेगा.