महब्बत का उसूल है कि जिस किसी से जितनी ज़्यादा मुहब्बत होगी उससे उतना ही ज़्यादा ख़ौफ़ और डर भी होगा, इसीलिए अल्लाह ने ईमान लानेवालों से जहाँ एक तरफ़ ये कहा कि “मोमिन तो असल में वे हैं जो अल्लाह से शदीद मुहब्बत करते हैं.” (क़ुरआन 2:165) वहीँ दूसरी तरफ़ यह भी कहा कि “ऐ वे लोगो जो ईमान लाने का दावा करते हो अल्लाह से डरो, जैसा कि उससे डरने का हक़ है.” (3:102)
ये डरना किसी दरिन्दे या ख़ूँख़ार से डरने जैसा नहीं है, बल्कि जब किसी से महब्बत होती है तो हर वक़्त डर होता है कि महबूब नाराज़ न हो जाए. उसके पास महबूब के पसन्दीदा कामों की भी फ़हरिस्त होती है कि वही काम उसे करने होते हैं और उसके पास महबूब के नापसन्दीदा कामों की भी फ़हरिस्त होती है कि उन कामों को करने से बचता रहता है.
हम मोमिन हैं तो क्या हमारे पास अपने महबूब (अल्लाह) के पसन्दीदा और नापसन्दीदा कामों की फ़हरिस्त है?
अगर नहीं तो आइए क़ुरआन पढ़ें और फ़हरिस्त बना लें कि किन कामों को करना है और किन कामों से परहेज़ करना है.