रसूलुल्लाह (सल्ल०) की अज़मत को तस्लीम करते हुए उसके इज़हार का एक पहलू तो ये है कि हम उनके जन्म-दिन पर जुलूस निकालें, उनकी तारीफ़ में नअतें पढ़ें और नारे लगाएँ और फ़िज़ाओं को एहसास दिला दें कि हम आशिक़े-रसूल हैं।
रसूलुल्लाह (सल्ल०) की अज़मत के इज़हार का दूसरा और पहले से भी ज़्यादा बेहतर पहलू ये है कि हम आप (सल्ल०) के जन्म दिन पर जगह-जगह जलसे करें, महफ़िलें सजाएँ और लोगों को बताएँ कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) की अज़मत क्या है और हम क्यों आशिक़े-रसूल हैं।
रसूलुल्लाह (सल्ल०) की अज़मत के इज़हार का एक तीसरा पहलू और दोनों पहलुओं से अफ़ज़ल पहलू ये है कि हम रसूलुल्लाह (सल्ल०) की तालीमात पर पूरे साल गुफ़्तगू करें लोगों को उसकी तालीमात का तआरुफ़ (परिचय) कराएँ ताकि लोगों के ज़ेहनो-दिमाग़ में रसूलुल्लाह (सल्ल०) की शख़्सियत और आपकी तालीमात के सिलसिले में किसी क़िस्म की ग़लतफ़हमी न रहे।
रसूलुल्लाह (सल्ल०) की अज़मत के इज़हार का तीसरा और सबसे अज़ीम और अफ़ज़ल पहलू ये है कि हम रसूलुल्लाह (सल्ल०) की तालीमात को पहले ख़ुद अच्छे से समझें और उन तालीमात को अपनी ज़िन्दगी में उतारें, उन तालीमात के मुताबिक़ अपनी ज़िन्दगी को ढालें और लोगों के सामने उन तालीमात का अमली नमूना पेश करें।
इन्तिहाई अफ़सोस की बात है कि जो शख़्सियत इतनी अज़ीम है कि जिनकी अज़मत के इज़हार के लिये हमें सबसे अफ़ज़ल पहलू को अपनाना चाहिये था उस अज़ीम हस्ती की अज़मत के इज़हार के लिये हम सबसे कम दर्जे के पहलू को इख़्तियार करके मुत्मइन हो जाते हैं।
आप (सल्ल०) की अज़मत में लाखों सलाम।