हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) की अज़मत के हवाले से बहुत-से लोगों को दूसरी बड़ी ग़लतफ़हमी ये हुई है कि आप (सल्ल०) को महज़ एक समाज-सुधारक मान लिया गया है। जबकि एक समाज-सुधारक और एक नबी या रसूल में बहुत बड़ा फ़र्क़ होता है।
एक समाज-सुधारक समाज-सुधार के लिये ख़ुद से खड़ा होता है, जबकि एक नबी ख़ुद से खड़ा नहीं होता बल्कि उसे डेप्युट किया जाता है, यानी उसे ख़ुदा की तरफ़ से खड़ा किया जाता है।
एक समाज-सुधारक समाज को सुधारने के जतन करता है, जबकि एक नबी पूरी सामाजिक व्यवस्था को यकसर बदलकर एक नई व्यवस्था क़ायम करता है जिसमें राजा से लेकर प्रजा तक सबके दिलों में ख़ुदा के सामने जवाबदेही का यक़ीन पुख़्ता होता है और समाज को चलाने की बागडोर ऐसे लोगों के हाथों में सौंपी जाती है जो इस यक़ीन में दूसरे लोगों से ज़्यादा पुख़्ता होते हैं।
एक समाज-सुधारक सामाजिक समस्याओं को सुधारने के लिये आगे आता है और उन समस्याओं के सुधार के लिये क़ानून-व्यवस्था बनाने की जिद्दोजुहद करता है, जबकि एक नबी सामाजिक समस्याओं को सुधारने के लिये इन्सानों के तज़किये और तरबियत पर मेहनत करता है, यानी इन्सानों के नज़रियात और ख़यालात को दुरुस्त करके उनके किरदार को बुलन्द करता है, जिससे सामाजिक समस्याएँ ख़ात्मे के कगार पर पहुँच जाती हैं।
एक समाज सुधारक महज़ अपने समाज के सुधारने की फ़िक्र करता है जबकि मुहम्मद (सल्ल०) ने जो फ़िक्र पैदा की और समाज के सुधार का जो फ़ॉर्मूला दिया उससे पूरी इन्सानियत की इस्लाह व सुधार मुमकिन है।
लिहाज़ा मुहम्मद (सल्ल०) की अज़मत महज़ एक मज़हबी पेशवा होने या महज़ एक समाज-सुधारक होने से कहीं ज़्यादा इस बात में है कि आप (सल्ल०) एक ऐसे नबी और रसूल हैं जिन्होंने इन्सानों के नज़रियात और ख़यालात को बदलकर, उनके किरदार को अज़ीम बनाकर इन्सानी समाज में वो अज़ीमुश्शान इन्क़िलाब बरपा किया था जो रहती दुनिया तक के लिये एक आइडियल और नमूना है।
आप (सल्ल०) की अज़मत पे लाखों सलाम।