तीन क़ुव्वतें ऐसी हैं जो मुस्लिम-दुनिया पर हावी हैं और जिनका ख़ात्मा इस्लाम और मुसलमानों की तरक़्क़ी के लिये ज़रूरी है।
अव्वल ‘पापाइयत’ या दूसरी इस्तिलाह में कहें तो ‘मुल्लाइयत’ जिसने इज्तिहाद का दरवाज़ा बन्द कर रखा है, जिससे मुसलमानों की सोचने-समझने की ताक़त मुरझा कर रह गई है।
दूसरे ख़ुद आम मुसलमानों के ज़ेहनों में इस्लाम का मज़हबी तसव्वुर जिसने न सिर्फ़ मुसलमानों के अन्दर इस मुल्लाइयत को बाक़ी और ज़िन्दा रखा है बल्कि ज़िन्दगी की हक़ीक़तों को समझने के बजाय तरह-तरह के औहाम (अन्धविश्वासों) को बढ़ावा दिया है और इस तरह मुसलमान बे-हिस-व-हरकत और अमल से फ़ारिग़ होकर रह गए।
तीसरे इस्लाम को इज्तिमाई ज़िन्दगी से निकालकर इन्फ़िरादी ज़िन्दगी में क़ैद कर देना। यहाँ तक कि दीने-इस्लाम की (नमाज़, ज़कात और हज वग़ैरा जैसी) वो इज्तिमाई इबादात, जो तमाम मुसलमानों के अन्दर इज्तिमाई और समाजी शुऊर पैदा करती थीं, उनको भी इज्तिमाई मामलात से काटकर रख दिया और समाजी व सियासी मामलात में कुछ लोग सियाह-सफ़ेद के ख़ुद मुख़्तार बन बैठे। तुरफ़ा तमाशा ये कि इस ख़ुद-मुख़्तारी पर भी मज़हबी कण्ट्रोल का चाबुक इस क़द्र चुस्त कर दिया कि किसी को दम मारने की इजाज़त नहीं है।