दीन कहते हैं एक ऐसे निज़ामे-ज़िन्दगी को जिसमें ज़मामे-इक़्तिदार के तहत नज़्म-व-नस्क़ हो, जज़ा और सज़ा हो, फ़ैसले और उनका निफ़ाज़ हो।
दीन कहते हैं ज़िन्दगी के उस ज़ाब्ते और क़ानून को जिसमें इताअत-गुज़री और फ़रमाँबरदारी हो, पूछ-गछ और हिसाब-किताब का इन्तिज़ाम हो।
अगर लुग़वी ऐतिबार से देखा जाए तो दीन बहुत-से हैं, मगर जिस दीन को अंबिया लेकर आते हैं उसे ‘अद-दीन’ यानी एक ख़ास ‘दीन’ कहते हैं जिसके बारे में क़ुरआन कहता है कि इन्सानों के लिये अल्लाह के नज़दीक पसन्दीदा दीन ‘इस्लाम’ है।
अंबिया के ज़रिए दिया गया दीन ज़िन्दगी के हर शोबे में इन्सान की उसूली रहनुमाई करता है और तफ़सीलात के लिये ख़ुद उसकी ज़रूरत और हालात के पेशे-नज़र ग़ौर करके तय करने के लिये आज़ाद छोड़ देता है।
हमेशा से होता आया है कि अल्लाह की तरफ़ से भेजे गए दीन (ज़िन्दगी के तमाम शोबों में उसूली रहनुमाई) में फेर-बदल करके उन उसूलों को अपनी मर्ज़ी के मातहत बना लिया जाता है और उन भेजी गई उसूली रहनुमाइयों में से रुसूमात को उसूलों का दर्जा दे दिया जाता है। दीन की इसी बदली हुई शक्ल को मज़हब कहा जाता है।
इस ऐतिबार से दीन ज़िन्दगी के इन्फ़िरादी और इज्तिमाई (सियासी, समाजी और मुआशी) मामलों में उसूली रहनुमाई का नाम है, जिनके तहत चन्द रसूमात और आदाब भी आते हैं,
जबकि मज़हब महज़ रुसूमात का मजमूआ होता है जिसमें उसूलों को तक़द्दुस का मक़ाम तो हासिल होता है मगर ज़िन्दगी के तमाम अहम् शोबे अपनी मर्ज़ी या लोगों की मर्ज़ी के मातहत काम कर रहे होते हैं।
दीन सिर्फ़ एक होता है एक शाहराह की तरह, जिस पर रहते हुए लोग उसूली तौर पर कभी मुन्तशिर और मुतफ़र्रिक़ नहीं हो सकते,
जबकि मज़हब उस शाहराह से निकली हुई पगडण्डियों और छोटे-छोटे रास्तों की तरह होता है जो एक नहीं बल्कि बहुत-से होते हैं, जिस पर चलने वाले लोग कभी मुत्तफ़िक़ व मुत्तहिद नहीं हो सकते।
अगर देखा जाए तो हक़ीक़ी तौर पर इस्लाम एक दीन था लेकिन आज मज़हब बन कर रह गया है जिसमें उसूली रहनुमाई को तक़द्दुस का मक़ाम ज़रूर हासिल है, मगर हक़ीक़ी ज़िन्दगी से बेदख़ल है और उन उसूलों को तक़वीयत पहुँचाने वाली जितनी रुसूमात या आदाब थे उन्हें उसूल का दर्जा हासिल हो चुका है।