ये बात एक मुसल्लेमा हक़ीक़त की हैसियत रखती है कि हमारे मसायल का हल तालीम में नहीं बल्कि निज़ामे-तालीम की दुरुस्ती में है। और निज़ामे-तालीम अपने-आप में कोई मक़सद नहीं रखता बल्कि वो किसी न किसी मक़सद के ताबेअ (अधीन) होता है। मतलब ये कि कोई क़ौम या समाज जिस तरह का मक़सद रखता है वो अपना निज़ामे-तालीम उसी के मातहत बनाता है।
ये बात भी क़ाबिले-तवज्जोह है कि तालीम के दो लाज़िमी नतायज होने चाहियें। एक है इन्सान को बा-अख़लाक़ और बा-किरदार बनाना और दूसरा है मुख़्तलिफ़ क़िस्म की अहलियतें और सलाहियतें इन्सान के अन्दर पैदा करना और उन्हें परवान चढ़ाना। ये बात पूरे यक़ीन के साथ कही जा सकती है कि इन्सान के अन्दर मुख़्तलिफ़ क़िस्म की अहलियतें और सलाहियतें पैदा किये बग़ैर महज़ अख़लाक़ और किरदार बनाना तो बिलकुल ऐसा है जैसे खजूर का बनावटी पेड़ खड़ा करना जो देखने में तो भले ही ख़ूबसूरत लगे लेकिन न तो उससे किसी को साया मुयस्सर हो और न कोई फूल और फल।
इसके बरख़िलाफ़ अगर तालीम का नतीजा महज़ मुख़्तलिफ़ क़िस्म की अहलियतें और सलाहियतें पैदा करना हो और अख़लाक़ व किरदार बनाने पर कोई तवज्जोह न दी जाए तो इन्सान ख़ालिस माद्दा-परस्त होगा। उस शख़्स की हैसियत समाज में उस नर-भक्षी पौधे (Man eater plant) की सी होगी जो इन्सानों को ही अपनी ग़िज़ा बना लेता है। ऐसा शख़्स बेहतरीन डॉक्टर की शक्ल में एक बे-रहम जल्लाद होगा और बेहतरीन इंजीनियर की शक्ल में एक सफ़्फ़ाक डाकू होगा। ऐसे लोगों से मिलकर बनने वाले समाज में लोग बस एक-दूसरे को धोखा देने के मौक़े तलाश कर रहे होंगे। एक-दूसरे पर से लोगों का यक़ीन और भरोसा उठ चुका होगा। इस समाज का हर पढ़ा-लिखा इन्सान समाज के लिये नासूर साबित होगा जो कि इन्सानियत की हदों से निकल कर हैवानियत की अथाह गहराइयों में गिरा होगा।
कोई भी तालीम उस वक़्त तक बे-मानी और बे-सूद है जब तक वो हमें चीज़ों को देखने का सही नज़रिया और दुरुस्त अन्दाज़ नहीं सिखाती। चीज़ों को महज़ जान लेना तालीम का मक़सद नहीं बल्कि एक ज़ेहनी वर्ज़िश है जब तक कि उन चीज़ों को सही तौर से जानने और समझने के बाद उन्हें इन्सानों के लिये मुफ़ीद से मुफ़ीद-तर न बनाए।
लिहाज़ा हमें एक ऐसे निज़ामे-तालीम की ज़रूरत है जो एक तरफ़ हमारी नस्लों के अन्दर अहलियतें और सलाहियतें परवान चढ़ाता हो जो कि हमारी दुनियावी ज़रूरतों को बख़ूबी पूरा करे और दूसरी तरफ़ उस निज़ाम में अख़लाक़ी शुऊर को मरकज़ी (सेण्ट्रल) हैसियत हासिल हो, ताकि पूरे समाज में इन्सानी क़द्रों की पासदारी आम हो और लोग एक-दूसरे पर सच्चे दिल से भरोसा कर सकें।