साथियो! मुसलमान होने के नाते जिस दीन को हम फ़ॉलौ करते हैं वो बहुत ही सटीक और सीधा दीन है। इसमें किसी तरह की कोई ऐंच-पेंच और टेढ़ नहीं है। (क़ुरआन 18:1)
कभी-कभी हम इस्लाम की कोई बात बयान करते हुए हद से इतना आगे निकल जाते हैं कि उसके अन्दर ऐसी टेढ़ पैदा हो जाती है जिससे न सिर्फ़ उसका हुस्न जाता रहता है, बल्कि वो झूट की हद तक पहुँच जाती है और झूट इस्लाम के बिलकुल ख़िलाफ़ एक ऐसा अमल है जिससे समाज तबाह होकर रह जाता है।
झूट उस बात को कहते हैं जो हक़ीक़त के ख़िलाफ़ हो या किसी बात को किसी ऐसे शख़्स के साथ जोड़कर बयान करने को भी झूट कहते हैं जो उसने न कही हो। इसी लिये प्यारे नबी (सल्ल०) ने अपने मुताल्लिक़ फ़रमाया कि “जिस शख़्स ने मुझपर ऐसी बात कही जो मैंने न कही हो तो वो अपना ठिकाना (जहन्नम की) आग में बना ले। (बुख़ारी : 109, मुस्लिम : 2)
क़ुरआन में है कि झूट तो वही लोग घड़ा करते हैं जो अल्लाह की आयात पर ईमान नहीं रखते। (16:105) इसीलिये ताकीद की गई कि झूट से हमेशा दूर रहो। (22:30) और सच बोलनेवालों के साथ रहो। (09:119) जब भी बात करो सीधी और सच्ची बात करो। (33:70) और फ़रमाया कि
وَلاَ تَقُوْلُوْا لِمَا تَصِفُ أَلْسِنَتُکُمُ الْکَذِبَ ہٰذَا حَلاَلٌ وَّہٰذَا حَرَامٌ لِّتَفْتَرُوْا عَلَی اللہِ الْکَذِبَ إِنَّ الَّذِيْنَ يَفْتَرُوْنَ عَلَی اللہِ الْکَذِبَ لاَ يُفْلِحُوْنَ
अपनी ज़बानों के घड़े हुए झूठ की बिना पर यह न कहो कि यह हलाल है और यह हराम है कि तुम अल्लाह पर झूठी तोहमत लगाओ, बेशक जो लोग अल्लाह पर झूठी तोहमत लगाएंगे वे कामयाब नहीं होंगे। (16:116)
यानी न तो बग़ैर तहक़ीक़ के अपनी ज़बान से कोई बात निकाली जाए और न ही बग़ैर तहक़ीक़ के किसी बात पर अमल किया जाए और न ही बग़ैर तहक़ीक़ किसी बात की हिमायत की जाए क्योंकि प्यारे नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया कि “आदमी के झूटा होने के लिये बस इतनी बात काफ़ी है कि वो हर सुनी हुई बात को आगे बयान कर दे।” (हदीस मुस्लिम 5-11) एक और हदीस में उस बात को अपने भाई/बहन के साथ बहुत बड़ी ख़ियानत कहा गया है कि जो बात उससे कही जाए और वो उसे सच्च समझ रहा/रही हो लेकिन वो बात झूट हो। ये बात याद रहे कि ज़रूरी नहीं कि इंसान जान-बूझकर ही झूट बोल रहा हो बल्कि जैसा कि हदीस में आया है कि किसी बात को महज़ सुनकर बिला-तहक़ीक़ आगे बयान करना भी झूट ही है।
लिहाज़ा ये बहुत ही नाज़ुक मसला है इस तरफ़ बहुत एहतियात की ज़रूरत है। जोशे-तबलीग़ में हम अक्सर कहीं से भी कोई मैसेज कॉपी करते हैं और यूँ ही बहुत-सों को फ़ॉरवर्ड करते रहते हैं। या कोई बात कही तो गई है हदीस में और हम कह देते हैं क़ुरआन में ऐसा लिखा है। या अपनी तरफ़ से बोल देते हैं की हदीस में ऐसा लिखा है। ज़रूरत इस बात की है कि इस मामले में बहुत एहतियात से काम लिया जाए। यक़ीन जानिये अगर इस मामले में हमने एहतियात नहीं बरती तो अल्लाह का फ़रमान है कि जो झूटे हैं उन पर अल्लाह की लानत हो। (03:61)
अगर हम दीन की कुछ ख़िदमत करना चाहते हैं तो हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम बग़ैर तहक़ीक़ के कोई बात न कहें और न बग़ैर तहक़ीक़ कोई बात सुनें। जो बात भी कही जाए हवाले (Reference) के साथ कही जाए। उतनी ही कही जाए जितनी कि वो बात है। ख़ाह-म-ख़ाह बात को बढ़ा-चढ़ा कर बयान करने से हमारे गुनाह में पड़ जाने का ख़तरा बढ़ जाता है।
अल्लाह हमें बात को सही तौर से समझने की तौफ़ीक़ दे और दीन की सही समझ अता करे।