शुक्र अदा करते हुए सब्र करनेवाले रोज़ेदार

शुक्र अदा करते हुए सब्र करनेवाले रोज़ेदार

“खाना खाकर अल्लाह का शुक्र अदा करनेवाला सब्र करनेवाले रोज़ेदार के बराबर है।” (तिरमिज़ी : 2486)

*तशरीह* : रोज़ेदार शख़्स रोज़े की हालत में ख़ुदा के लिए सब्र (कंट्रोल) करता है और खाने-पीने और जिंसी ख़ाहिश पूरी करने से रुका रहता है और जब शाम हो जाती है तो खाता-पीता है। पूरे दिन भूख-प्यास बर्दाश्त करने के बाद शाम को वो अल्लाह की दी हुए नेमत में से जब लुक़मा अपने हलक़ से उतारता है और शिद्दत की प्यास के आलम में ठन्डे पानी से अपने हलक़ को तर करता है तो उसके दिल से अपने रब की इन नेमतों के लिए शुक्र का जज़्बा पैदा होता है। रोज़ा रखने से उसे एहसास हुआ कि जिन नेमतों को हम इस्तेमाल कर रहे थे ये कितनी क़ीमती हैं! इन जज़्बात का उभरना ही असल में रोज़े का मक़सद है। इसी जज़्बे का नाम शुक्र है।

हदीस के मुताबिक़ इन्सान अगर शुक्र के जज़्बात से लबरेज़ है तो समझ लीजिए वो हर वक़्त रोज़े की हालत में है और अगर रोज़ा रखने के बाद भी इन्सान के अन्दर शुक्र के जज़्बात पैदा नहीं हुए तो उसका रोज़ा किसी काम का नहीं है उसे भूख-प्यास के सिवा कुछ हासिल नहीं हो रहा है।

सब्र और शुक्र ये दो ऐसी ख़ूबियाँ हैं जिनसे एक सच्चे और मतलूब मोमिन की तस्वीर उभरती है। एक हदीस में इस तस्वीर का ज़िक्र इस तरह किया गया है कि-

प्यारे नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया कि “मोमिन का अजब हाल है, अगर उसे भलाई हासिल होती है तो वो ख़ुदा की तारीफ़ करता है और उसका शुक्र अदा करता है और अगर उसे कोई मुसीबत पेश आती है तो उस पर भी वो ख़ुदा की तारीफ़ ही करता है और सब्र इख़्तियार करता है। इस तरह मोमिन को हर हाल में अज्र और सवाब हासिल होता है।” (हदीस : बेहक़ी)

शुक्र के असली मानी होते हैं ‘भर जाना’ और ‘इज़हार करना’ या ‘नुमायाँ करना’। इसलिये शुक्र का मतलब हुआ कि अल्लाह ने अगर आपको नेमतों से नवाज़ा है तो उन्हें अल्लाह के बन्दों से छिपा कर न रखना बल्कि जायज़ तरीक़ा अपनाते हुए उन्हें अल्लाह के बन्दों के लिये खुला रखना। इसके मुक़ाबले में कुफ़्र का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया गया है। क्योंकि कुफ़्र का मतलब होता है ढाँप देना, ज़ाहिर न होने देना, छिपा देना। क़ुरआन में कहा गया है, “कुफ़्राने-नेमत न करो (यानी मेरी नेमतों को ज़ाहिर करो और एहसानमंदी का रवैया इख़्तियार करो न उन नेमतों को छिपाओ और न उनकी नाक़द्री करो)।” (सूरा-2 बक़रा, आयत-153)

जब कोई बन्दा शुक्र से मुँह मोड़ता है तो समझ लीजिए कि अब वो सीधा शैतान के जाल में फँस चुका है। क्योंकि हम जानते हैं कि शैतान इन्सान का खुला दुश्मन है। जब शैतान के मुक़ाबले में इन्सान को अल्लाह की तरफ़ से बड़ाई मिली और शैतान को अल्लाह ने अपने दरबार से निकल जाने का हुक्म दिया तब शैतान ने अल्लाह से मुहलत माँगी। अल्लाह ने वो मुहलत उसे दे दी तब शैतान ने कहा,

“मैं अब तेरी सीधी राह पर इन इन्सानों की घात में लगा रहूँगा, आगे और पीछे, दायें और बाएँ हर तरफ़ से इनको घेरूँगा और तू इनमें से अक्सर को शुक्रगुज़ार न पाएगा.” (यानी इनमें से अक्सर ऐसे होंगे जो तेरी नेमतों के एहसानमन्द नहीं होंगे, उन पर ख़ुद ही क़ाबिज़ होकर बैठ जाएँगे लोगों के सामने ज़ाहिर और नुमायाँ नहीं करेंगे।)

इसका मतलब हुआ कि अगर ख़ुदा की कोई नेमत तुम्हारे पास है या तुमपर वो नेमत ज़ाहिर हो गई है तो इस सिलसिले में एहसानमन्द रहो और उनको हमेशा ज़ाहिर रखो छिपाओ नहीं ताकि ख़ुदा की दूसरी मख़लूक़ भी उनसे फ़ायदा उठाए।

ख़ुदा की अता की हुई नेमतों में वो सलाहियतें भी हैं जो ख़ुद इन्सान के अन्दर मौजूद होती हैं। इन सलाहियतों का शुक्र ये है कि इन सलाहियतों को ज़ाहिर किया जाए, ख़ुदा की मर्ज़ी के मुताबिक़ इनका भरपूर इस्तेमाल किया जाए और इस तरह किया जाए कि ख़ुदा की दूसरी मख़लूक़ उनसे फ़ायदा उठाए। क़ुरआन में है कि तुम ये दुआ और तमन्ना किया करो कि “ऐ मेरे रब, मुझे तौफ़ीक़ दे कि मैं तेरी उन नेमतों का शुक्र अदा करूँ जो तूने मुझे और मेरे माँ-बाप को अता की थीं और ऐसा नेक अमल करूँ जिससे तू राज़ी हो…”

अगर हम ग़ौर करें तो मालूम होगा कि ख़ुदा की अता की हुई नेमतों में सबसे बड़ी नेमत हमारे पास अल्लाह की किताब है। क़ुरआन में कहा गया है कि-

“…(इसी रमज़ान के महीने में) जिस हिदायत से तुम्हें नवाज़ा गया है (यानी क़ुरआन) उस पर अल्लाह की बड़ाई का इज़हार और एतिराफ़ करो और शुक्रगुज़ार बनो.” (सूरा-2 बक़रा, आयत-185)

इस आयत में बताया गया है कि अल्लाह ने जो ये हिदायातनामा (क़ुरआन की शक्ल में) तुम्हारे पास भेजा है उस पर तुम सबसे पहले तो उसकी बड़ाई बयान करो और फिर उसका शुक्र करो। शुक्र करने का मतलब यहाँ पर साफ़ ज़ाहिर हो रहा है कि इस नेमत को लोगों पर ज़ाहिर करो। इसके पैग़ाम को समझो, इस पर अमल करके लोगों को दिखाओ कि ये कैसी बेहतरीन रहनुमाई है, फिर अपनी ज़बान से भी इसको लोगों के सामने बयान करो और आख़िरकार इसको पूरे समाज पर ज़ाहिर और ग़ालिब करने की भरपूर कोशिश करो।

फिर शुक्र एक ऐसी ख़ूबी है जो इन्सान के इन्सान से ताल्लुक़ को मज़बूत कर देती है। चुनाँचे हदीस में बताया गया है कि जो शख़्स इन्सान का शुक्र अदा नहीं करता वो ख़ुदा का भी शुक्र अदा नहीं करता। यानी ख़ुदा की नेमतों पर शुक्र की जो मश्क़ कराई जा रही है वो इसलिए भी है कि तुम इन्सानों के एहसान का भी शुक्र अदा करो।

शुक्र अदा करने के फ़ायदों पर अगर नज़र डाली जाए तो वो इस तरह हैं-

-शुक्र अदा करने का सबसे बड़ा फ़ायदा तो ख़ुद इन्सान ही को पहुँचता है। क़ुरआन में है कि

“अल्लाह का शुक्र अदा करो। जो कोई शुक्र करे उसका शुक्र उसके अपने ही लिए फ़ायदेमंद है और जो कुफ़्र करे तो हक़ीक़त में अल्लाह बे-नियाज़ और आप से आप महमूद है।”

-शुक्र से दूसरा फ़ायदा ये है कि अल्लाह और ज़्यादा नेमतों से नवाज़ता है। क़ुरआन में है कि-

“अगर शुक्रगुज़ार (ख़ुदा के एहसानमन्द और उसकी नेमतों को ज़ाहिर करनेवाले) बनोगे तो मैं तुमको और ज़्यादा नवाज़ूँगा और अगर (मेरी नेमतों का) कुफ़्र करोगे (यानी छिपाओगे, ज़ाहिर नहीं करोगे) तो मेरी सज़ा बहुत सख़्त है।” (सूरा-14 इबराहीम, आयत-7)

-शुक्र से एक फ़ायदा ये है कि अल्लाह अज़ाब को टाल देता है। क़ुरआन में है कि-

“आख़िर अल्लाह को क्या पड़ी है कि तुम्हें ख़ाहमख़ाह अज़ाब में मुब्तिला करे, अगर तुम शुक्रगुज़ार (यानी अल्लाह की नेमतों का ठीक-ठीक इस्तेमाल करनेवाले और अल्लाह के बन्दों को उन नेमतों से फ़ायदा उठाने के लिये खुला रखनेवाले) बन्दे बने रहो और ईमान की रविश पर चलो, अल्लाह बड़ा शाकिर (क़द्रदान) है और सबके हाल को जानता है।” (सूरा-4 निसा, आयत-147)

तो आइए अहद करें कि रमज़ान के इस मुबारक महीने में हम अल्लाह की नेमतों की क़द्र करना सीखेंगे और उनके लिये शुक्र अदा करेंगे यानी अल्लाह की तमाम नेमतों (यानी अपने पैसे, वक़्त और अपनी सलाहियतों) को अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक़ ही इस्तेमाल करेंगे, ताकि हम ख़ुद भी उनसे भरपूर फ़ायदा उठा सकें और अल्लाह की दूसरी मख़लूक़ भी फ़ायदा उठाए।

Hindi

“खाना खाकर अल्लाह का शुक्र अदा करनेवाला सब्र करनेवाले रोज़ेदार के बराबर है।” (तिरमिज़ी : 2486)

*तशरीह* : रोज़ेदार शख़्स रोज़े की हालत में ख़ुदा के लिए सब्र (कंट्रोल) करता है और खाने-पीने और जिंसी ख़ाहिश पूरी करने से रुका रहता है और जब शाम हो जाती है तो खाता-पीता है। पूरे दिन भूख-प्यास बर्दाश्त करने के बाद शाम को वो अल्लाह की दी हुए नेमत में से जब लुक़मा अपने हलक़ से उतारता है और शिद्दत की प्यास के आलम में ठन्डे पानी से अपने हलक़ को तर करता है तो उसके दिल से अपने रब की इन नेमतों के लिए शुक्र का जज़्बा पैदा होता है। रोज़ा रखने से उसे एहसास हुआ कि जिन नेमतों को हम इस्तेमाल कर रहे थे ये कितनी क़ीमती हैं! इन जज़्बात का उभरना ही असल में रोज़े का मक़सद है। इसी जज़्बे का नाम शुक्र है।

हदीस के मुताबिक़ इन्सान अगर शुक्र के जज़्बात से लबरेज़ है तो समझ लीजिए वो हर वक़्त रोज़े की हालत में है और अगर रोज़ा रखने के बाद भी इन्सान के अन्दर शुक्र के जज़्बात पैदा नहीं हुए तो उसका रोज़ा किसी काम का नहीं है उसे भूख-प्यास के सिवा कुछ हासिल नहीं हो रहा है।

सब्र और शुक्र ये दो ऐसी ख़ूबियाँ हैं जिनसे एक सच्चे और मतलूब मोमिन की तस्वीर उभरती है। एक हदीस में इस तस्वीर का ज़िक्र इस तरह किया गया है कि-

प्यारे नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया कि “मोमिन का अजब हाल है, अगर उसे भलाई हासिल होती है तो वो ख़ुदा की तारीफ़ करता है और उसका शुक्र अदा करता है और अगर उसे कोई मुसीबत पेश आती है तो उस पर भी वो ख़ुदा की तारीफ़ ही करता है और सब्र इख़्तियार करता है। इस तरह मोमिन को हर हाल में अज्र और सवाब हासिल होता है।” (हदीस : बेहक़ी)

शुक्र के असली मानी होते हैं ‘भर जाना’ और ‘इज़हार करना’ या ‘नुमायाँ करना’। इसलिये शुक्र का मतलब हुआ कि अल्लाह ने अगर आपको नेमतों से नवाज़ा है तो उन्हें अल्लाह के बन्दों से छिपा कर न रखना बल्कि जायज़ तरीक़ा अपनाते हुए उन्हें अल्लाह के बन्दों के लिये खुला रखना। इसके मुक़ाबले में कुफ़्र का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया गया है। क्योंकि कुफ़्र का मतलब होता है ढाँप देना, ज़ाहिर न होने देना, छिपा देना। क़ुरआन में कहा गया है, “कुफ़्राने-नेमत न करो (यानी मेरी नेमतों को ज़ाहिर करो और एहसानमंदी का रवैया इख़्तियार करो न उन नेमतों को छिपाओ और न उनकी नाक़द्री करो)।” (सूरा-2 बक़रा, आयत-153)

जब कोई बन्दा शुक्र से मुँह मोड़ता है तो समझ लीजिए कि अब वो सीधा शैतान के जाल में फँस चुका है। क्योंकि हम जानते हैं कि शैतान इन्सान का खुला दुश्मन है। जब शैतान के मुक़ाबले में इन्सान को अल्लाह की तरफ़ से बड़ाई मिली और शैतान को अल्लाह ने अपने दरबार से निकल जाने का हुक्म दिया तब शैतान ने अल्लाह से मुहलत माँगी। अल्लाह ने वो मुहलत उसे दे दी तब शैतान ने कहा,

“मैं अब तेरी सीधी राह पर इन इन्सानों की घात में लगा रहूँगा, आगे और पीछे, दायें और बाएँ हर तरफ़ से इनको घेरूँगा और तू इनमें से अक्सर को शुक्रगुज़ार न पाएगा.” (यानी इनमें से अक्सर ऐसे होंगे जो तेरी नेमतों के एहसानमन्द नहीं होंगे, उन पर ख़ुद ही क़ाबिज़ होकर बैठ जाएँगे लोगों के सामने ज़ाहिर और नुमायाँ नहीं करेंगे।)

इसका मतलब हुआ कि अगर ख़ुदा की कोई नेमत तुम्हारे पास है या तुमपर वो नेमत ज़ाहिर हो गई है तो इस सिलसिले में एहसानमन्द रहो और उनको हमेशा ज़ाहिर रखो छिपाओ नहीं ताकि ख़ुदा की दूसरी मख़लूक़ भी उनसे फ़ायदा उठाए।

ख़ुदा की अता की हुई नेमतों में वो सलाहियतें भी हैं जो ख़ुद इन्सान के अन्दर मौजूद होती हैं। इन सलाहियतों का शुक्र ये है कि इन सलाहियतों को ज़ाहिर किया जाए, ख़ुदा की मर्ज़ी के मुताबिक़ इनका भरपूर इस्तेमाल किया जाए और इस तरह किया जाए कि ख़ुदा की दूसरी मख़लूक़ उनसे फ़ायदा उठाए। क़ुरआन में है कि तुम ये दुआ और तमन्ना किया करो कि “ऐ मेरे रब, मुझे तौफ़ीक़ दे कि मैं तेरी उन नेमतों का शुक्र अदा करूँ जो तूने मुझे और मेरे माँ-बाप को अता की थीं और ऐसा नेक अमल करूँ जिससे तू राज़ी हो…”

अगर हम ग़ौर करें तो मालूम होगा कि ख़ुदा की अता की हुई नेमतों में सबसे बड़ी नेमत हमारे पास अल्लाह की किताब है। क़ुरआन में कहा गया है कि-

“…(इसी रमज़ान के महीने में) जिस हिदायत से तुम्हें नवाज़ा गया है (यानी क़ुरआन) उस पर अल्लाह की बड़ाई का इज़हार और एतिराफ़ करो और शुक्रगुज़ार बनो.” (सूरा-2 बक़रा, आयत-185)

इस आयत में बताया गया है कि अल्लाह ने जो ये हिदायातनामा (क़ुरआन की शक्ल में) तुम्हारे पास भेजा है उस पर तुम सबसे पहले तो उसकी बड़ाई बयान करो और फिर उसका शुक्र करो। शुक्र करने का मतलब यहाँ पर साफ़ ज़ाहिर हो रहा है कि इस नेमत को लोगों पर ज़ाहिर करो। इसके पैग़ाम को समझो, इस पर अमल करके लोगों को दिखाओ कि ये कैसी बेहतरीन रहनुमाई है, फिर अपनी ज़बान से भी इसको लोगों के सामने बयान करो और आख़िरकार इसको पूरे समाज पर ज़ाहिर और ग़ालिब करने की भरपूर कोशिश करो।

फिर शुक्र एक ऐसी ख़ूबी है जो इन्सान के इन्सान से ताल्लुक़ को मज़बूत कर देती है। चुनाँचे हदीस में बताया गया है कि जो शख़्स इन्सान का शुक्र अदा नहीं करता वो ख़ुदा का भी शुक्र अदा नहीं करता। यानी ख़ुदा की नेमतों पर शुक्र की जो मश्क़ कराई जा रही है वो इसलिए भी है कि तुम इन्सानों के एहसान का भी शुक्र अदा करो।

शुक्र अदा करने के फ़ायदों पर अगर नज़र डाली जाए तो वो इस तरह हैं-

-शुक्र अदा करने का सबसे बड़ा फ़ायदा तो ख़ुद इन्सान ही को पहुँचता है। क़ुरआन में है कि

“अल्लाह का शुक्र अदा करो। जो कोई शुक्र करे उसका शुक्र उसके अपने ही लिए फ़ायदेमंद है और जो कुफ़्र करे तो हक़ीक़त में अल्लाह बे-नियाज़ और आप से आप महमूद है।”

-शुक्र से दूसरा फ़ायदा ये है कि अल्लाह और ज़्यादा नेमतों से नवाज़ता है। क़ुरआन में है कि-

“अगर शुक्रगुज़ार (ख़ुदा के एहसानमन्द और उसकी नेमतों को ज़ाहिर करनेवाले) बनोगे तो मैं तुमको और ज़्यादा नवाज़ूँगा और अगर (मेरी नेमतों का) कुफ़्र करोगे (यानी छिपाओगे, ज़ाहिर नहीं करोगे) तो मेरी सज़ा बहुत सख़्त है।” (सूरा-14 इबराहीम, आयत-7)

-शुक्र से एक फ़ायदा ये है कि अल्लाह अज़ाब को टाल देता है। क़ुरआन में है कि-

“आख़िर अल्लाह को क्या पड़ी है कि तुम्हें ख़ाहमख़ाह अज़ाब में मुब्तिला करे, अगर तुम शुक्रगुज़ार (यानी अल्लाह की नेमतों का ठीक-ठीक इस्तेमाल करनेवाले और अल्लाह के बन्दों को उन नेमतों से फ़ायदा उठाने के लिये खुला रखनेवाले) बन्दे बने रहो और ईमान की रविश पर चलो, अल्लाह बड़ा शाकिर (क़द्रदान) है और सबके हाल को जानता है।” (सूरा-4 निसा, आयत-147)

तो आइए अहद करें कि रमज़ान के इस मुबारक महीने में हम अल्लाह की नेमतों की क़द्र करना सीखेंगे और उनके लिये शुक्र अदा करेंगे यानी अल्लाह की तमाम नेमतों (यानी अपने पैसे, वक़्त और अपनी सलाहियतों) को अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक़ ही इस्तेमाल करेंगे, ताकि हम ख़ुद भी उनसे भरपूर फ़ायदा उठा सकें और अल्लाह की दूसरी मख़लूक़ भी फ़ायदा उठाए।

“खाना खाकर अल्लाह का शुक्र अदा करनेवाला सब्र करनेवाले रोज़ेदार के बराबर है।” (तिरमिज़ी : 2486)

*तशरीह* : रोज़ेदार शख़्स रोज़े की हालत में ख़ुदा के लिए सब्र (कंट्रोल) करता है और खाने-पीने और जिंसी ख़ाहिश पूरी करने से रुका रहता है और जब शाम हो जाती है तो खाता-पीता है। पूरे दिन भूख-प्यास बर्दाश्त करने के बाद शाम को वो अल्लाह की दी हुए नेमत में से जब लुक़मा अपने हलक़ से उतारता है और शिद्दत की प्यास के आलम में ठन्डे पानी से अपने हलक़ को तर करता है तो उसके दिल से अपने रब की इन नेमतों के लिए शुक्र का जज़्बा पैदा होता है। रोज़ा रखने से उसे एहसास हुआ कि जिन नेमतों को हम इस्तेमाल कर रहे थे ये कितनी क़ीमती हैं! इन जज़्बात का उभरना ही असल में रोज़े का मक़सद है। इसी जज़्बे का नाम शुक्र है।

हदीस के मुताबिक़ इन्सान अगर शुक्र के जज़्बात से लबरेज़ है तो समझ लीजिए वो हर वक़्त रोज़े की हालत में है और अगर रोज़ा रखने के बाद भी इन्सान के अन्दर शुक्र के जज़्बात पैदा नहीं हुए तो उसका रोज़ा किसी काम का नहीं है उसे भूख-प्यास के सिवा कुछ हासिल नहीं हो रहा है।

सब्र और शुक्र ये दो ऐसी ख़ूबियाँ हैं जिनसे एक सच्चे और मतलूब मोमिन की तस्वीर उभरती है। एक हदीस में इस तस्वीर का ज़िक्र इस तरह किया गया है कि-

प्यारे नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया कि “मोमिन का अजब हाल है, अगर उसे भलाई हासिल होती है तो वो ख़ुदा की तारीफ़ करता है और उसका शुक्र अदा करता है और अगर उसे कोई मुसीबत पेश आती है तो उस पर भी वो ख़ुदा की तारीफ़ ही करता है और सब्र इख़्तियार करता है। इस तरह मोमिन को हर हाल में अज्र और सवाब हासिल होता है।” (हदीस : बेहक़ी)

शुक्र के असली मानी होते हैं ‘भर जाना’ और ‘इज़हार करना’ या ‘नुमायाँ करना’। इसलिये शुक्र का मतलब हुआ कि अल्लाह ने अगर आपको नेमतों से नवाज़ा है तो उन्हें अल्लाह के बन्दों से छिपा कर न रखना बल्कि जायज़ तरीक़ा अपनाते हुए उन्हें अल्लाह के बन्दों के लिये खुला रखना। इसके मुक़ाबले में कुफ़्र का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया गया है। क्योंकि कुफ़्र का मतलब होता है ढाँप देना, ज़ाहिर न होने देना, छिपा देना। क़ुरआन में कहा गया है, “कुफ़्राने-नेमत न करो (यानी मेरी नेमतों को ज़ाहिर करो और एहसानमंदी का रवैया इख़्तियार करो न उन नेमतों को छिपाओ और न उनकी नाक़द्री करो)।” (सूरा-2 बक़रा, आयत-153)

जब कोई बन्दा शुक्र से मुँह मोड़ता है तो समझ लीजिए कि अब वो सीधा शैतान के जाल में फँस चुका है। क्योंकि हम जानते हैं कि शैतान इन्सान का खुला दुश्मन है। जब शैतान के मुक़ाबले में इन्सान को अल्लाह की तरफ़ से बड़ाई मिली और शैतान को अल्लाह ने अपने दरबार से निकल जाने का हुक्म दिया तब शैतान ने अल्लाह से मुहलत माँगी। अल्लाह ने वो मुहलत उसे दे दी तब शैतान ने कहा,

“मैं अब तेरी सीधी राह पर इन इन्सानों की घात में लगा रहूँगा, आगे और पीछे, दायें और बाएँ हर तरफ़ से इनको घेरूँगा और तू इनमें से अक्सर को शुक्रगुज़ार न पाएगा.” (यानी इनमें से अक्सर ऐसे होंगे जो तेरी नेमतों के एहसानमन्द नहीं होंगे, उन पर ख़ुद ही क़ाबिज़ होकर बैठ जाएँगे लोगों के सामने ज़ाहिर और नुमायाँ नहीं करेंगे।)

इसका मतलब हुआ कि अगर ख़ुदा की कोई नेमत तुम्हारे पास है या तुमपर वो नेमत ज़ाहिर हो गई है तो इस सिलसिले में एहसानमन्द रहो और उनको हमेशा ज़ाहिर रखो छिपाओ नहीं ताकि ख़ुदा की दूसरी मख़लूक़ भी उनसे फ़ायदा उठाए।

ख़ुदा की अता की हुई नेमतों में वो सलाहियतें भी हैं जो ख़ुद इन्सान के अन्दर मौजूद होती हैं। इन सलाहियतों का शुक्र ये है कि इन सलाहियतों को ज़ाहिर किया जाए, ख़ुदा की मर्ज़ी के मुताबिक़ इनका भरपूर इस्तेमाल किया जाए और इस तरह किया जाए कि ख़ुदा की दूसरी मख़लूक़ उनसे फ़ायदा उठाए। क़ुरआन में है कि तुम ये दुआ और तमन्ना किया करो कि “ऐ मेरे रब, मुझे तौफ़ीक़ दे कि मैं तेरी उन नेमतों का शुक्र अदा करूँ जो तूने मुझे और मेरे माँ-बाप को अता की थीं और ऐसा नेक अमल करूँ जिससे तू राज़ी हो…”

अगर हम ग़ौर करें तो मालूम होगा कि ख़ुदा की अता की हुई नेमतों में सबसे बड़ी नेमत हमारे पास अल्लाह की किताब है। क़ुरआन में कहा गया है कि-

“…(इसी रमज़ान के महीने में) जिस हिदायत से तुम्हें नवाज़ा गया है (यानी क़ुरआन) उस पर अल्लाह की बड़ाई का इज़हार और एतिराफ़ करो और शुक्रगुज़ार बनो.” (सूरा-2 बक़रा, आयत-185)

इस आयत में बताया गया है कि अल्लाह ने जो ये हिदायातनामा (क़ुरआन की शक्ल में) तुम्हारे पास भेजा है उस पर तुम सबसे पहले तो उसकी बड़ाई बयान करो और फिर उसका शुक्र करो। शुक्र करने का मतलब यहाँ पर साफ़ ज़ाहिर हो रहा है कि इस नेमत को लोगों पर ज़ाहिर करो। इसके पैग़ाम को समझो, इस पर अमल करके लोगों को दिखाओ कि ये कैसी बेहतरीन रहनुमाई है, फिर अपनी ज़बान से भी इसको लोगों के सामने बयान करो और आख़िरकार इसको पूरे समाज पर ज़ाहिर और ग़ालिब करने की भरपूर कोशिश करो।

फिर शुक्र एक ऐसी ख़ूबी है जो इन्सान के इन्सान से ताल्लुक़ को मज़बूत कर देती है। चुनाँचे हदीस में बताया गया है कि जो शख़्स इन्सान का शुक्र अदा नहीं करता वो ख़ुदा का भी शुक्र अदा नहीं करता। यानी ख़ुदा की नेमतों पर शुक्र की जो मश्क़ कराई जा रही है वो इसलिए भी है कि तुम इन्सानों के एहसान का भी शुक्र अदा करो।

शुक्र अदा करने के फ़ायदों पर अगर नज़र डाली जाए तो वो इस तरह हैं-

-शुक्र अदा करने का सबसे बड़ा फ़ायदा तो ख़ुद इन्सान ही को पहुँचता है। क़ुरआन में है कि

“अल्लाह का शुक्र अदा करो। जो कोई शुक्र करे उसका शुक्र उसके अपने ही लिए फ़ायदेमंद है और जो कुफ़्र करे तो हक़ीक़त में अल्लाह बे-नियाज़ और आप से आप महमूद है।”

-शुक्र से दूसरा फ़ायदा ये है कि अल्लाह और ज़्यादा नेमतों से नवाज़ता है। क़ुरआन में है कि-

“अगर शुक्रगुज़ार (ख़ुदा के एहसानमन्द और उसकी नेमतों को ज़ाहिर करनेवाले) बनोगे तो मैं तुमको और ज़्यादा नवाज़ूँगा और अगर (मेरी नेमतों का) कुफ़्र करोगे (यानी छिपाओगे, ज़ाहिर नहीं करोगे) तो मेरी सज़ा बहुत सख़्त है।” (सूरा-14 इबराहीम, आयत-7)

-शुक्र से एक फ़ायदा ये है कि अल्लाह अज़ाब को टाल देता है। क़ुरआन में है कि-

“आख़िर अल्लाह को क्या पड़ी है कि तुम्हें ख़ाहमख़ाह अज़ाब में मुब्तिला करे, अगर तुम शुक्रगुज़ार (यानी अल्लाह की नेमतों का ठीक-ठीक इस्तेमाल करनेवाले और अल्लाह के बन्दों को उन नेमतों से फ़ायदा उठाने के लिये खुला रखनेवाले) बन्दे बने रहो और ईमान की रविश पर चलो, अल्लाह बड़ा शाकिर (क़द्रदान) है और सबके हाल को जानता है।” (सूरा-4 निसा, आयत-147)

तो आइए अहद करें कि रमज़ान के इस मुबारक महीने में हम अल्लाह की नेमतों की क़द्र करना सीखेंगे और उनके लिये शुक्र अदा करेंगे यानी अल्लाह की तमाम नेमतों (यानी अपने पैसे, वक़्त और अपनी सलाहियतों) को अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक़ ही इस्तेमाल करेंगे, ताकि हम ख़ुद भी उनसे भरपूर फ़ायदा उठा सकें और अल्लाह की दूसरी मख़लूक़ भी फ़ायदा उठाए।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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