“खाना खाकर अल्लाह का शुक्र अदा करनेवाला सब्र करनेवाले रोज़ेदार के बराबर है।” (तिरमिज़ी : 2486)
*तशरीह* : रोज़ेदार शख़्स रोज़े की हालत में ख़ुदा के लिए सब्र (कंट्रोल) करता है और खाने-पीने और जिंसी ख़ाहिश पूरी करने से रुका रहता है और जब शाम हो जाती है तो खाता-पीता है। पूरे दिन भूख-प्यास बर्दाश्त करने के बाद शाम को वो अल्लाह की दी हुए नेमत में से जब लुक़मा अपने हलक़ से उतारता है और शिद्दत की प्यास के आलम में ठन्डे पानी से अपने हलक़ को तर करता है तो उसके दिल से अपने रब की इन नेमतों के लिए शुक्र का जज़्बा पैदा होता है। रोज़ा रखने से उसे एहसास हुआ कि जिन नेमतों को हम इस्तेमाल कर रहे थे ये कितनी क़ीमती हैं! इन जज़्बात का उभरना ही असल में रोज़े का मक़सद है। इसी जज़्बे का नाम शुक्र है।
हदीस के मुताबिक़ इन्सान अगर शुक्र के जज़्बात से लबरेज़ है तो समझ लीजिए वो हर वक़्त रोज़े की हालत में है और अगर रोज़ा रखने के बाद भी इन्सान के अन्दर शुक्र के जज़्बात पैदा नहीं हुए तो उसका रोज़ा किसी काम का नहीं है उसे भूख-प्यास के सिवा कुछ हासिल नहीं हो रहा है।
सब्र और शुक्र ये दो ऐसी ख़ूबियाँ हैं जिनसे एक सच्चे और मतलूब मोमिन की तस्वीर उभरती है। एक हदीस में इस तस्वीर का ज़िक्र इस तरह किया गया है कि-
प्यारे नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया कि “मोमिन का अजब हाल है, अगर उसे भलाई हासिल होती है तो वो ख़ुदा की तारीफ़ करता है और उसका शुक्र अदा करता है और अगर उसे कोई मुसीबत पेश आती है तो उस पर भी वो ख़ुदा की तारीफ़ ही करता है और सब्र इख़्तियार करता है। इस तरह मोमिन को हर हाल में अज्र और सवाब हासिल होता है।” (हदीस : बेहक़ी)
शुक्र के असली मानी होते हैं ‘भर जाना’ और ‘इज़हार करना’ या ‘नुमायाँ करना’। इसलिये शुक्र का मतलब हुआ कि अल्लाह ने अगर आपको नेमतों से नवाज़ा है तो उन्हें अल्लाह के बन्दों से छिपा कर न रखना बल्कि जायज़ तरीक़ा अपनाते हुए उन्हें अल्लाह के बन्दों के लिये खुला रखना। इसके मुक़ाबले में कुफ़्र का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया गया है। क्योंकि कुफ़्र का मतलब होता है ढाँप देना, ज़ाहिर न होने देना, छिपा देना। क़ुरआन में कहा गया है, “कुफ़्राने-नेमत न करो (यानी मेरी नेमतों को ज़ाहिर करो और एहसानमंदी का रवैया इख़्तियार करो न उन नेमतों को छिपाओ और न उनकी नाक़द्री करो)।” (सूरा-2 बक़रा, आयत-153)
जब कोई बन्दा शुक्र से मुँह मोड़ता है तो समझ लीजिए कि अब वो सीधा शैतान के जाल में फँस चुका है। क्योंकि हम जानते हैं कि शैतान इन्सान का खुला दुश्मन है। जब शैतान के मुक़ाबले में इन्सान को अल्लाह की तरफ़ से बड़ाई मिली और शैतान को अल्लाह ने अपने दरबार से निकल जाने का हुक्म दिया तब शैतान ने अल्लाह से मुहलत माँगी। अल्लाह ने वो मुहलत उसे दे दी तब शैतान ने कहा,
“मैं अब तेरी सीधी राह पर इन इन्सानों की घात में लगा रहूँगा, आगे और पीछे, दायें और बाएँ हर तरफ़ से इनको घेरूँगा और तू इनमें से अक्सर को शुक्रगुज़ार न पाएगा.” (यानी इनमें से अक्सर ऐसे होंगे जो तेरी नेमतों के एहसानमन्द नहीं होंगे, उन पर ख़ुद ही क़ाबिज़ होकर बैठ जाएँगे लोगों के सामने ज़ाहिर और नुमायाँ नहीं करेंगे।)
इसका मतलब हुआ कि अगर ख़ुदा की कोई नेमत तुम्हारे पास है या तुमपर वो नेमत ज़ाहिर हो गई है तो इस सिलसिले में एहसानमन्द रहो और उनको हमेशा ज़ाहिर रखो छिपाओ नहीं ताकि ख़ुदा की दूसरी मख़लूक़ भी उनसे फ़ायदा उठाए।
ख़ुदा की अता की हुई नेमतों में वो सलाहियतें भी हैं जो ख़ुद इन्सान के अन्दर मौजूद होती हैं। इन सलाहियतों का शुक्र ये है कि इन सलाहियतों को ज़ाहिर किया जाए, ख़ुदा की मर्ज़ी के मुताबिक़ इनका भरपूर इस्तेमाल किया जाए और इस तरह किया जाए कि ख़ुदा की दूसरी मख़लूक़ उनसे फ़ायदा उठाए। क़ुरआन में है कि तुम ये दुआ और तमन्ना किया करो कि “ऐ मेरे रब, मुझे तौफ़ीक़ दे कि मैं तेरी उन नेमतों का शुक्र अदा करूँ जो तूने मुझे और मेरे माँ-बाप को अता की थीं और ऐसा नेक अमल करूँ जिससे तू राज़ी हो…”
अगर हम ग़ौर करें तो मालूम होगा कि ख़ुदा की अता की हुई नेमतों में सबसे बड़ी नेमत हमारे पास अल्लाह की किताब है। क़ुरआन में कहा गया है कि-
“…(इसी रमज़ान के महीने में) जिस हिदायत से तुम्हें नवाज़ा गया है (यानी क़ुरआन) उस पर अल्लाह की बड़ाई का इज़हार और एतिराफ़ करो और शुक्रगुज़ार बनो.” (सूरा-2 बक़रा, आयत-185)
इस आयत में बताया गया है कि अल्लाह ने जो ये हिदायातनामा (क़ुरआन की शक्ल में) तुम्हारे पास भेजा है उस पर तुम सबसे पहले तो उसकी बड़ाई बयान करो और फिर उसका शुक्र करो। शुक्र करने का मतलब यहाँ पर साफ़ ज़ाहिर हो रहा है कि इस नेमत को लोगों पर ज़ाहिर करो। इसके पैग़ाम को समझो, इस पर अमल करके लोगों को दिखाओ कि ये कैसी बेहतरीन रहनुमाई है, फिर अपनी ज़बान से भी इसको लोगों के सामने बयान करो और आख़िरकार इसको पूरे समाज पर ज़ाहिर और ग़ालिब करने की भरपूर कोशिश करो।
फिर शुक्र एक ऐसी ख़ूबी है जो इन्सान के इन्सान से ताल्लुक़ को मज़बूत कर देती है। चुनाँचे हदीस में बताया गया है कि जो शख़्स इन्सान का शुक्र अदा नहीं करता वो ख़ुदा का भी शुक्र अदा नहीं करता। यानी ख़ुदा की नेमतों पर शुक्र की जो मश्क़ कराई जा रही है वो इसलिए भी है कि तुम इन्सानों के एहसान का भी शुक्र अदा करो।
शुक्र अदा करने के फ़ायदों पर अगर नज़र डाली जाए तो वो इस तरह हैं-
-शुक्र अदा करने का सबसे बड़ा फ़ायदा तो ख़ुद इन्सान ही को पहुँचता है। क़ुरआन में है कि
“अल्लाह का शुक्र अदा करो। जो कोई शुक्र करे उसका शुक्र उसके अपने ही लिए फ़ायदेमंद है और जो कुफ़्र करे तो हक़ीक़त में अल्लाह बे-नियाज़ और आप से आप महमूद है।”
-शुक्र से दूसरा फ़ायदा ये है कि अल्लाह और ज़्यादा नेमतों से नवाज़ता है। क़ुरआन में है कि-
“अगर शुक्रगुज़ार (ख़ुदा के एहसानमन्द और उसकी नेमतों को ज़ाहिर करनेवाले) बनोगे तो मैं तुमको और ज़्यादा नवाज़ूँगा और अगर (मेरी नेमतों का) कुफ़्र करोगे (यानी छिपाओगे, ज़ाहिर नहीं करोगे) तो मेरी सज़ा बहुत सख़्त है।” (सूरा-14 इबराहीम, आयत-7)
-शुक्र से एक फ़ायदा ये है कि अल्लाह अज़ाब को टाल देता है। क़ुरआन में है कि-
“आख़िर अल्लाह को क्या पड़ी है कि तुम्हें ख़ाहमख़ाह अज़ाब में मुब्तिला करे, अगर तुम शुक्रगुज़ार (यानी अल्लाह की नेमतों का ठीक-ठीक इस्तेमाल करनेवाले और अल्लाह के बन्दों को उन नेमतों से फ़ायदा उठाने के लिये खुला रखनेवाले) बन्दे बने रहो और ईमान की रविश पर चलो, अल्लाह बड़ा शाकिर (क़द्रदान) है और सबके हाल को जानता है।” (सूरा-4 निसा, आयत-147)
तो आइए अहद करें कि रमज़ान के इस मुबारक महीने में हम अल्लाह की नेमतों की क़द्र करना सीखेंगे और उनके लिये शुक्र अदा करेंगे यानी अल्लाह की तमाम नेमतों (यानी अपने पैसे, वक़्त और अपनी सलाहियतों) को अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक़ ही इस्तेमाल करेंगे, ताकि हम ख़ुद भी उनसे भरपूर फ़ायदा उठा सकें और अल्लाह की दूसरी मख़लूक़ भी फ़ायदा उठाए।