Mahauliyati bohran aur Islam

Mahauliyati bohran aur Islam

*माहौलियाती बोहरान और इस्लाम* अल्लाह तआला ने इस पूरी कायनात को हिकमत और ख़ूबसूरती के साथ पैदा किया है। ये कायनात एक बाग़ की तरह है और अल्लाह इस बाग़ का माली है। इस बाग़ में हर चीज़ तरतीब, सलीक़े और एतिदाल (संतुलन) के साथ रखी गई है। आप क़ुरआन पर नज़र डालें तो साफ़ तौर पर अल्लाह फ़रमाता है: “उस (अल्लाह) ने जो कुछ भी पैदा किया, बहुत ही ख़ूबसूरती के साथ पैदा किया” (सूरह अस-सजदा: 7)। एक और जगह फ़रमाया : “फिर बार-बार निगाह दौड़ाओ, क्या तुम्हें कोई दरार नज़र आती है? निगाह थककर नामुराद लौट आएगी।” (सूरह अल-मुल्क: 3–4)। यानी अल्लाह के इस बाग़ में कोई झोल नहीं, कोई कमी नहीं, सब कुछ नज़ाकत और पूरे एहतिमाम के साथ बनाया गया है। इस कायनात का एक छोटा-सा हिस्सा ये दुनिया है, जिसे इंसान के रहने और इम्तिहान के लिये बनाया गया है। अल्लाह ने इंसान को इस दुनिया में अपना ख़लीफ़ा मुक़र्रर किया है। “मैं ज़मीन में एक ख़लीफ़ा बनाने वाला हूँ” (सूरह अल-बक़रा: 30)। इंसान को अक़्ल, सूझ-बूझ और तमीज़ दी गई ताकि वो इस बाग़ की हिफ़ाज़त करे, इसकी ख़ूबसूरती को बरक़रार रखे, और इसकी हर नेमत का सही इस्तेमाल करे। मगर इसी अक़्ल का ग़लत इस्तेमाल करके इंसान इस बाग़ में बिगाड़ भी पैदा कर सकता है। अगर इंसान अक़्ल और शुऊर का सही इस्तेमाल करे तो इससे दो फ़ायदे होते हैं — पहला ये कि ये दुनिया एक ख़ूबसूरत, सलीक़ेदार और रहने लायक जगह बनी रहती है जिससे इंसानों को राहत, अमन और सुकून हासिल होता है। दूसरा ये कि इस बाग़ का माली यानी अल्लाह उससे ख़ुश होता है, और उसकी इस ज़िम्मेदारी और समझदारी के इनाम के तौर पर उसे उससे भी बेहतर एक और दुनिया (बाग़) अता करेगा जहाँ वो हमेशा रहेगा। लेकिन अगर इंसान अपनी अक़्ल का ग़लत इस्तेमाल करे और इस बाग़ में फ़साद फैलाए, इसे गंदा करे, नेमतों की नाक़द्री करे और ताबाही मचाए, तो इसके भी दो नुक़सान होंगे — एक ये कि ख़ुद उसे भी और उस जैसे दूसरे लोगों को भी इस दुनिया में रहने और बसने में परेशानियाँ और मुश्किलात पेश आएँगी, और दूसरा ये कि इस बाग़ का माली, अल्लाह तआला, उस इंसान से नाराज़ होगा और उसे उस बाग़ का हिस्सा नहीं बनाएगा जो उसने नेक बन्दों के लिए तैयार किया है। बल्कि चूँकि उस इंसान ने बग़ावत का रवैया इख़्तियार करके इस बाग़ की नाक़द्री की, इसलिए उसे भी नाक़द्र बना दिया जाएगा और कबाड़ख़ाने (जहन्नम) में औंधे मुँह फेंक दिया जाएगा। इसीलिए क़ुरआन इंसान को बार-बार इस बाग़ (ज़मीन में) फ़साद से रोकता है और इस्लाह की हिदायत करता है। “ज़मीन की इस्लाह के बाद उसमें फ़साद मत फैलाओ” (सूरह अल-आराफ़: 56)। एक और जगह फ़रमाया : “ख़ुश्की (ज़मीन) में और पानी (समंदर) में फ़साद फैला उन कामों की वजह से जो लोगों के हाथों ने किए…” (सूरह रोम: 41)। यानी जब माहौलियाती आलूदगी (Environmental Crises) पैदा करे यानी पेड़ काटे, पानी गंदा करे, हवा में ज़हर घोले, ज़मीन को बंजर बनाए और जानवरों की नस्लें ख़त्म करे तो इससे ज़मीन में फ़साद बरपा होता है — और यह सीधे तौर पर अल्लाह की बनाई हुई दुनिया से बग़ावत है। इसलिए नबी करीम ﷺ ने हमें बार-बार तालीम दी कि इस कायनात को सँवारो, इसे संजोकर रखो। आप (सल्ल०) ने फरमाया: “अगर क़यामत क़रीब हो और तुम्हारे हाथ में पौधा हो, और तुम उसे लगा सकते हो तो उसे ज़रूर लगा दो।” (मुसनद अहमद: 12933) आपने ये भी फरमाया: “कोई मुसलमान ऐसा दरख़्त लगाता है जिससे इंसान, परिन्दा या जानवर फायदा उठाएँ तो वह उसके लिए सदक़ा होता है” (बुख़ारी: 6012)। एक हदीस में है कि हज़रत सलमान फ़ारसी ने अपने मालिक से अपनी ग़ुलामी की रिहाई के लिये 300 खजूर के पौधे लगाना तय कर लिया तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने वे तमाम पौधे अपने हाथों से लगाए। (देखें हदीस मुसनद अहमद : 24138) एक और हदीस में रसूलुल्लाह (सल्ल) ने पेड़ लगाने को सदक़ए-जारिया क़रार दिया और फ़रमाया पेड़ लगानेवाले को उस वक़्त तक अजर मिलता रहेगा जब तक लोग उससे फ़ायदा उठाते रहेंगे। (हदीस मजमउल-ज़वाइद : 4739) एक और हदीस में है कि जब कोई बन्दा कोई पेड़ लगाता है तो उसे उतना ही अज्र मिलता है जितना उसमें फल निकलता है। (मजमउल-ज़वाइद : 6266) ख़ुद क़ुरआन में अल्लाह ने और हदीसों में रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़ुज़ूल-ख़र्ची से दूर रहने की तलक़ीन की ताकि अल्लाह की नेमतों का सही इस्तेमाल हो सके। चुनांचे वुज़ू करते वक़्त भी आपने पानी फ़ुज़ूल बहाने से मना किया, चाहे आदमी दरिया के किनारे ही क्यों न हो (इब्ने माजा: 425)। क़ुरआन ने भी साफ़ तौर पर फ़रमाया: “बेशक फ़ुज़ूलख़र्च लोग शैतान के भाई हैं” (सूरह बनी इस्राईल: 27)। यानी जब इंसान पानी, खाना, हवा, लकड़ी, ऊर्जा जैसी क़ुदरती नेमतों में फ़ुज़ूल-ख़र्ची करता या बरबाद करता है तो वो शैतानी अमल करता है, और यही माहौलियाती बोहरान की जड़ है। साफ-सफ़ाई को आधा ईमान क़रार दिया (सहीह मुस्लिम: 223) ताकि खाने और पीने की चीज़ों को साफ़ सुथरा रखा जा सके जिससे माहौलियाती आलूदगी से पूरी तरह बचा जा सके। हरियाली को क़ायम रखने, पेड़ लगाने और ज़मीन को महकाने की ताकीद की और इसे इबादत का हिस्सा क़रार दिया। ऊपर की एक हदीस से ये बात वाज़ेह हो गई कि अगर कोई शख़्स पेड़ लगाए और उससे कोई परिन्दा खाए तो ये भी एक सदक़ा है। इसलिये हमारी ये ज़िम्मेदारी है कि इस बाग़ को बर्बाद करने की बजाय इसे सँवारेँ। इसमें पेड़ लगाएँ, पानी साफ़ रखें, ज़मीन को महकाएँ, जानवरों का हक़ अदा करें और खाने-पीने व दूसरी नेमतों को बरबाद न करें। यही अल्लाह की रज़ा का रास्ता है, और यही हमारी दुनिया और आख़िरत दोनों की ख़ूबसूरती का राज़ है। तो आइये हम सब मिलकर माहौलियाती आलूदगी को दूर करें, अल्लाह के इस चमन को पेड़ों से महकाएँ ताकि ये दुनिया भी ख़ूबसूरत बनी रहे और हमारा रब भी हमसे राज़ी हो जाए ताकि इस बाग़ (दुनिया) से बेहतर बाग़ (जन्नत) के हम हक़दार क़रार पाएँ।
Hindi
*माहौलियाती बोहरान और इस्लाम* अल्लाह तआला ने इस पूरी कायनात को हिकमत और ख़ूबसूरती के साथ पैदा किया है। ये कायनात एक बाग़ की तरह है और अल्लाह इस बाग़ का माली है। इस बाग़ में हर चीज़ तरतीब, सलीक़े और एतिदाल (संतुलन) के साथ रखी गई है। आप क़ुरआन पर नज़र डालें तो साफ़ तौर पर अल्लाह फ़रमाता है: “उस (अल्लाह) ने जो कुछ भी पैदा किया, बहुत ही ख़ूबसूरती के साथ पैदा किया” (सूरह अस-सजदा: 7)। एक और जगह फ़रमाया : “फिर बार-बार निगाह दौड़ाओ, क्या तुम्हें कोई दरार नज़र आती है? निगाह थककर नामुराद लौट आएगी।” (सूरह अल-मुल्क: 3–4)। यानी अल्लाह के इस बाग़ में कोई झोल नहीं, कोई कमी नहीं, सब कुछ नज़ाकत और पूरे एहतिमाम के साथ बनाया गया है। इस कायनात का एक छोटा-सा हिस्सा ये दुनिया है, जिसे इंसान के रहने और इम्तिहान के लिये बनाया गया है। अल्लाह ने इंसान को इस दुनिया में अपना ख़लीफ़ा मुक़र्रर किया है। “मैं ज़मीन में एक ख़लीफ़ा बनाने वाला हूँ” (सूरह अल-बक़रा: 30)। इंसान को अक़्ल, सूझ-बूझ और तमीज़ दी गई ताकि वो इस बाग़ की हिफ़ाज़त करे, इसकी ख़ूबसूरती को बरक़रार रखे, और इसकी हर नेमत का सही इस्तेमाल करे। मगर इसी अक़्ल का ग़लत इस्तेमाल करके इंसान इस बाग़ में बिगाड़ भी पैदा कर सकता है। अगर इंसान अक़्ल और शुऊर का सही इस्तेमाल करे तो इससे दो फ़ायदे होते हैं — पहला ये कि ये दुनिया एक ख़ूबसूरत, सलीक़ेदार और रहने लायक जगह बनी रहती है जिससे इंसानों को राहत, अमन और सुकून हासिल होता है। दूसरा ये कि इस बाग़ का माली यानी अल्लाह उससे ख़ुश होता है, और उसकी इस ज़िम्मेदारी और समझदारी के इनाम के तौर पर उसे उससे भी बेहतर एक और दुनिया (बाग़) अता करेगा जहाँ वो हमेशा रहेगा। लेकिन अगर इंसान अपनी अक़्ल का ग़लत इस्तेमाल करे और इस बाग़ में फ़साद फैलाए, इसे गंदा करे, नेमतों की नाक़द्री करे और ताबाही मचाए, तो इसके भी दो नुक़सान होंगे — एक ये कि ख़ुद उसे भी और उस जैसे दूसरे लोगों को भी इस दुनिया में रहने और बसने में परेशानियाँ और मुश्किलात पेश आएँगी, और दूसरा ये कि इस बाग़ का माली, अल्लाह तआला, उस इंसान से नाराज़ होगा और उसे उस बाग़ का हिस्सा नहीं बनाएगा जो उसने नेक बन्दों के लिए तैयार किया है। बल्कि चूँकि उस इंसान ने बग़ावत का रवैया इख़्तियार करके इस बाग़ की नाक़द्री की, इसलिए उसे भी नाक़द्र बना दिया जाएगा और कबाड़ख़ाने (जहन्नम) में औंधे मुँह फेंक दिया जाएगा। इसीलिए क़ुरआन इंसान को बार-बार इस बाग़ (ज़मीन में) फ़साद से रोकता है और इस्लाह की हिदायत करता है। “ज़मीन की इस्लाह के बाद उसमें फ़साद मत फैलाओ” (सूरह अल-आराफ़: 56)। एक और जगह फ़रमाया : “ख़ुश्की (ज़मीन) में और पानी (समंदर) में फ़साद फैला उन कामों की वजह से जो लोगों के हाथों ने किए…” (सूरह रोम: 41)। यानी जब माहौलियाती आलूदगी (Environmental Crises) पैदा करे यानी पेड़ काटे, पानी गंदा करे, हवा में ज़हर घोले, ज़मीन को बंजर बनाए और जानवरों की नस्लें ख़त्म करे तो इससे ज़मीन में फ़साद बरपा होता है — और यह सीधे तौर पर अल्लाह की बनाई हुई दुनिया से बग़ावत है। इसलिए नबी करीम ﷺ ने हमें बार-बार तालीम दी कि इस कायनात को सँवारो, इसे संजोकर रखो। आप (सल्ल०) ने फरमाया: “अगर क़यामत क़रीब हो और तुम्हारे हाथ में पौधा हो, और तुम उसे लगा सकते हो तो उसे ज़रूर लगा दो।” (मुसनद अहमद: 12933) आपने ये भी फरमाया: “कोई मुसलमान ऐसा दरख़्त लगाता है जिससे इंसान, परिन्दा या जानवर फायदा उठाएँ तो वह उसके लिए सदक़ा होता है” (बुख़ारी: 6012)। एक हदीस में है कि हज़रत सलमान फ़ारसी ने अपने मालिक से अपनी ग़ुलामी की रिहाई के लिये 300 खजूर के पौधे लगाना तय कर लिया तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने वे तमाम पौधे अपने हाथों से लगाए। (देखें हदीस मुसनद अहमद : 24138) एक और हदीस में रसूलुल्लाह (सल्ल) ने पेड़ लगाने को सदक़ए-जारिया क़रार दिया और फ़रमाया पेड़ लगानेवाले को उस वक़्त तक अजर मिलता रहेगा जब तक लोग उससे फ़ायदा उठाते रहेंगे। (हदीस मजमउल-ज़वाइद : 4739) एक और हदीस में है कि जब कोई बन्दा कोई पेड़ लगाता है तो उसे उतना ही अज्र मिलता है जितना उसमें फल निकलता है। (मजमउल-ज़वाइद : 6266) ख़ुद क़ुरआन में अल्लाह ने और हदीसों में रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़ुज़ूल-ख़र्ची से दूर रहने की तलक़ीन की ताकि अल्लाह की नेमतों का सही इस्तेमाल हो सके। चुनांचे वुज़ू करते वक़्त भी आपने पानी फ़ुज़ूल बहाने से मना किया, चाहे आदमी दरिया के किनारे ही क्यों न हो (इब्ने माजा: 425)। क़ुरआन ने भी साफ़ तौर पर फ़रमाया: “बेशक फ़ुज़ूलख़र्च लोग शैतान के भाई हैं” (सूरह बनी इस्राईल: 27)। यानी जब इंसान पानी, खाना, हवा, लकड़ी, ऊर्जा जैसी क़ुदरती नेमतों में फ़ुज़ूल-ख़र्ची करता या बरबाद करता है तो वो शैतानी अमल करता है, और यही माहौलियाती बोहरान की जड़ है। साफ-सफ़ाई को आधा ईमान क़रार दिया (सहीह मुस्लिम: 223) ताकि खाने और पीने की चीज़ों को साफ़ सुथरा रखा जा सके जिससे माहौलियाती आलूदगी से पूरी तरह बचा जा सके। हरियाली को क़ायम रखने, पेड़ लगाने और ज़मीन को महकाने की ताकीद की और इसे इबादत का हिस्सा क़रार दिया। ऊपर की एक हदीस से ये बात वाज़ेह हो गई कि अगर कोई शख़्स पेड़ लगाए और उससे कोई परिन्दा खाए तो ये भी एक सदक़ा है। इसलिये हमारी ये ज़िम्मेदारी है कि इस बाग़ को बर्बाद करने की बजाय इसे सँवारेँ। इसमें पेड़ लगाएँ, पानी साफ़ रखें, ज़मीन को महकाएँ, जानवरों का हक़ अदा करें और खाने-पीने व दूसरी नेमतों को बरबाद न करें। यही अल्लाह की रज़ा का रास्ता है, और यही हमारी दुनिया और आख़िरत दोनों की ख़ूबसूरती का राज़ है। तो आइये हम सब मिलकर माहौलियाती आलूदगी को दूर करें, अल्लाह के इस चमन को पेड़ों से महकाएँ ताकि ये दुनिया भी ख़ूबसूरत बनी रहे और हमारा रब भी हमसे राज़ी हो जाए ताकि इस बाग़ (दुनिया) से बेहतर बाग़ (जन्नत) के हम हक़दार क़रार पाएँ।

*माहौलियाती बोहरान और इस्लाम*

अल्लाह तआला ने इस पूरी कायनात को हिकमत और ख़ूबसूरती के साथ पैदा किया है। ये कायनात एक बाग़ की तरह है और अल्लाह इस बाग़ का माली है। इस बाग़ में हर चीज़ तरतीब, सलीक़े और एतिदाल (संतुलन) के साथ रखी गई है। आप क़ुरआन पर नज़र डालें तो साफ़ तौर पर अल्लाह फ़रमाता है:
“उस (अल्लाह) ने जो कुछ भी पैदा किया, बहुत ही ख़ूबसूरती के साथ पैदा किया” (सूरह अस-सजदा: 7)। एक और जगह फ़रमाया :
“फिर बार-बार निगाह दौड़ाओ, क्या तुम्हें कोई दरार नज़र आती है? निगाह थककर नामुराद लौट आएगी।” (सूरह अल-मुल्क: 3–4)।
यानी अल्लाह के इस बाग़ में कोई झोल नहीं, कोई कमी नहीं, सब कुछ नज़ाकत और पूरे एहतिमाम के साथ बनाया गया है।

इस कायनात का एक छोटा-सा हिस्सा ये दुनिया है, जिसे इंसान के रहने और इम्तिहान के लिये बनाया गया है। अल्लाह ने इंसान को इस दुनिया में अपना ख़लीफ़ा मुक़र्रर किया है।
“मैं ज़मीन में एक ख़लीफ़ा बनाने वाला हूँ” (सूरह अल-बक़रा: 30)।
इंसान को अक़्ल, सूझ-बूझ और तमीज़ दी गई ताकि वो इस बाग़ की हिफ़ाज़त करे, इसकी ख़ूबसूरती को बरक़रार रखे, और इसकी हर नेमत का सही इस्तेमाल करे। मगर इसी अक़्ल का ग़लत इस्तेमाल करके इंसान इस बाग़ में बिगाड़ भी पैदा कर सकता है।

अगर इंसान अक़्ल और शुऊर का सही इस्तेमाल करे तो इससे दो फ़ायदे होते हैं —
पहला ये कि ये दुनिया एक ख़ूबसूरत, सलीक़ेदार और रहने लायक जगह बनी रहती है जिससे इंसानों को राहत, अमन और सुकून हासिल होता है।
दूसरा ये कि इस बाग़ का माली यानी अल्लाह उससे ख़ुश होता है, और उसकी इस ज़िम्मेदारी और समझदारी के इनाम के तौर पर उसे उससे भी बेहतर एक और दुनिया (बाग़) अता करेगा जहाँ वो हमेशा रहेगा।

लेकिन अगर इंसान अपनी अक़्ल का ग़लत इस्तेमाल करे और इस बाग़ में फ़साद फैलाए, इसे गंदा करे, नेमतों की नाक़द्री करे और ताबाही मचाए, तो इसके भी दो नुक़सान होंगे —
एक ये कि ख़ुद उसे भी और उस जैसे दूसरे लोगों को भी इस दुनिया में रहने और बसने में परेशानियाँ और मुश्किलात पेश आएँगी, और
दूसरा ये कि इस बाग़ का माली, अल्लाह तआला, उस इंसान से नाराज़ होगा और उसे उस बाग़ का हिस्सा नहीं बनाएगा जो उसने नेक बन्दों के लिए तैयार किया है। बल्कि चूँकि उस इंसान ने बग़ावत का रवैया इख़्तियार करके इस बाग़ की नाक़द्री की, इसलिए उसे भी नाक़द्र बना दिया जाएगा और कबाड़ख़ाने (जहन्नम) में औंधे मुँह फेंक दिया जाएगा।

इसीलिए क़ुरआन इंसान को बार-बार इस बाग़ (ज़मीन में) फ़साद से रोकता है और इस्लाह की हिदायत करता है।
“ज़मीन की इस्लाह के बाद उसमें फ़साद मत फैलाओ” (सूरह अल-आराफ़: 56)।
एक और जगह फ़रमाया :
“ख़ुश्की (ज़मीन) में और पानी (समंदर) में फ़साद फैला उन कामों की वजह से जो लोगों के हाथों ने किए…” (सूरह रोम: 41)।

यानी जब माहौलियाती आलूदगी (Environmental Crises) पैदा करे यानी पेड़ काटे, पानी गंदा करे, हवा में ज़हर घोले, ज़मीन को बंजर बनाए और जानवरों की नस्लें ख़त्म करे तो इससे ज़मीन में फ़साद बरपा होता है — और यह सीधे तौर पर अल्लाह की बनाई हुई दुनिया से बग़ावत है।

इसलिए नबी करीम ﷺ ने हमें बार-बार तालीम दी कि इस कायनात को सँवारो, इसे संजोकर रखो। आप (सल्ल०) ने फरमाया:
“अगर क़यामत क़रीब हो और तुम्हारे हाथ में पौधा हो, और तुम उसे लगा सकते हो तो उसे ज़रूर लगा दो।” (मुसनद अहमद: 12933)

आपने ये भी फरमाया: “कोई मुसलमान ऐसा दरख़्त लगाता है जिससे इंसान, परिन्दा या जानवर फायदा उठाएँ तो वह उसके लिए सदक़ा होता है” (बुख़ारी: 6012)।
एक हदीस में है कि हज़रत सलमान फ़ारसी ने अपने मालिक से अपनी ग़ुलामी की रिहाई के लिये 300 खजूर के पौधे लगाना तय कर लिया तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने वे तमाम पौधे अपने हाथों से लगाए। (देखें हदीस मुसनद अहमद : 24138)
एक और हदीस में रसूलुल्लाह (सल्ल) ने पेड़ लगाने को सदक़ए-जारिया क़रार दिया और फ़रमाया पेड़ लगानेवाले को उस वक़्त तक अजर मिलता रहेगा जब तक लोग उससे फ़ायदा उठाते रहेंगे। (हदीस मजमउल-ज़वाइद : 4739)
एक और हदीस में है कि जब कोई बन्दा कोई पेड़ लगाता है तो उसे उतना ही अज्र मिलता है जितना उसमें फल निकलता है। (मजमउल-ज़वाइद : 6266)

ख़ुद क़ुरआन में अल्लाह ने और हदीसों में रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़ुज़ूल-ख़र्ची से दूर रहने की तलक़ीन की ताकि अल्लाह की नेमतों का सही इस्तेमाल हो सके। चुनांचे वुज़ू करते वक़्त भी आपने पानी फ़ुज़ूल बहाने से मना किया, चाहे आदमी दरिया के किनारे ही क्यों न हो (इब्ने माजा: 425)। क़ुरआन ने भी साफ़ तौर पर फ़रमाया: “बेशक फ़ुज़ूलख़र्च लोग शैतान के भाई हैं” (सूरह बनी इस्राईल: 27)। यानी जब इंसान पानी, खाना, हवा, लकड़ी, ऊर्जा जैसी क़ुदरती नेमतों में फ़ुज़ूल-ख़र्ची करता या बरबाद करता है तो वो शैतानी अमल करता है, और यही माहौलियाती बोहरान की जड़ है।

साफ-सफ़ाई को आधा ईमान क़रार दिया (सहीह मुस्लिम: 223) ताकि खाने और पीने की चीज़ों को साफ़ सुथरा रखा जा सके जिससे माहौलियाती आलूदगी से पूरी तरह बचा जा सके।

हरियाली को क़ायम रखने, पेड़ लगाने और ज़मीन को महकाने की ताकीद की और इसे इबादत का हिस्सा क़रार दिया। ऊपर की एक हदीस से ये बात वाज़ेह हो गई कि अगर कोई शख़्स पेड़ लगाए और उससे कोई परिन्दा खाए तो ये भी एक सदक़ा है।

इसलिये हमारी ये ज़िम्मेदारी है कि इस बाग़ को बर्बाद करने की बजाय इसे सँवारेँ। इसमें पेड़ लगाएँ, पानी साफ़ रखें, ज़मीन को महकाएँ, जानवरों का हक़ अदा करें और खाने-पीने व दूसरी नेमतों को बरबाद न करें। यही अल्लाह की रज़ा का रास्ता है, और यही हमारी दुनिया और आख़िरत दोनों की ख़ूबसूरती का राज़ है।
तो आइये हम सब मिलकर माहौलियाती आलूदगी को दूर करें, अल्लाह के इस चमन को पेड़ों से महकाएँ ताकि ये दुनिया भी ख़ूबसूरत बनी रहे और हमारा रब भी हमसे राज़ी हो जाए ताकि इस बाग़ (दुनिया) से बेहतर बाग़ (जन्नत) के हम हक़दार क़रार पाएँ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

2 mins to read

हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

2 mins to read