*हूर*
इस्लाम में “हूर” का तसव्वुर एक वसीअ और गहरा मअनी रखता है, जिसे अक्सर महज़ ज़ाहिरी हुस्न व जमाल के तनाज़ुर में पेश किया जाता है, हालाँकि इसका ताल्लुक़ सिर्फ़ जिस्मानी ख़ूबसूरती से नहीं, बल्कि रूहानी पाकीज़गी, ज़ेहनी तहारत और अख़लाक़ी बुलंदी से है। हमारे समाज में एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी पैदा की गई है कि “हूर” का ज़िक्र जन्नत की ख़ूबसूरत औरतों के बारे में किया गया है। हक़ीक़त में, क़ुरआन व हदीस और अरबी लुग़त में “हूर” का जो मअनी बयान किया गया है, वो इस सतही तशरीह से बहुत बुलंद है।
हूर लफ़्ज़ अरबी ज़बान के ‘ह व र’ से बना है। इस रूट (माद्दे) से क़ुरआन मजीद में जो अलफ़ाज़ इस्तेमाल हुए हैं वो चार मअना में इस्तेमाल हुए हैं।
एक है ‘यहूर’ इसका मतलब पलटना लिया गया है :
اِنَّہٗ ظَنَّ اَنۡ لَّنۡ یَّحُوۡرَ
उसने समझा था कि उसे कभी पलटना नहीं है। (84 : 14)
दूसरा लफ़्ज़ है ‘तहावुर’ और ‘युहाविर’ इसका मतलब बातचीत लिया गया है :
قَدۡ سَمِعَ اللّٰہُ قَوۡلَ الَّتِیۡ تُجَادِلُکَ فِیۡ زَوۡجِہَا وَ تَشۡتَکِیۡۤ اِلَی اللّٰہِ ٭ۖ وَ اللّٰہُ یَسۡمَعُ تَحَاوُرَکُمَا ؕ اِنَّ اللّٰہَ سَمِیۡعٌۢ بَصِیۡرٌ
अल्लाह ने सुन ली उस औरत की बात जो अपने शौहर के मामले में तुमसे तकरार कर रही है और अल्लाह से फ़रयाद किए जाती है। अल्लाह तुम दोनों की बातचीत सुन रहा है, वो सब कुछ सुनने और देखनेवाला है। (58 : 1)
قَالَ لَہٗ صَاحِبُہٗ وَ ہُوَ یُحَاوِرُہٗۤ اَکَفَرۡتَ بِالَّذِیۡ خَلَقَکَ مِنۡ تُرَابٍ ثُمَّ مِنۡ نُّطۡفَۃٍ ثُمَّ سَوّٰىکَ رَجُلًا
उसके पड़ोसी ने बातें करते हुए उससे कहा, “क्या तू कुफ़्र (नाशुक्री) करता है, उस ज़ात से जिसने तुझे मिट्टी से और फिर नुत्फ़े से पैदा किया और तुझे एक पूरा आदमी बना खड़ा किया? (18 : 37)
तीसरा है ‘हवारी’ ये लफ़्ज़ हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के साथियों के लिए इस्तेमाल हुआ है :
فَلَمَّاۤ اَحَسَّ عِیۡسٰی مِنۡہُمُ الۡکُفۡرَ قَالَ مَنۡ اَنۡصَارِیۡۤ اِلَی اللّٰہِ ؕ قَالَ الۡحَوَارِیُّوۡنَ نَحۡنُ اَنۡصَارُ اللّٰہِ ۚ اٰمَنَّا بِاللّٰہِ ۚ وَ اشۡہَدۡ بِاَنَّا مُسۡلِمُوۡنَ
जब ईसा ने महसूस किया कि बनी-इसराईल कुफ़्र और इनकार पर आमादा हैं तो उसने कहा, “कौन अल्लाह की राह में मेरा मददगार होता है?” हवारियों ने जवाब दिया, “हम अल्लाह के मददगार हैं, हम अल्लाह पर ईमान लाए, गवाह रहो कि हम मुस्लिम [अल्लाह के फ़रमाँबरदार] हैं। (3:52)
और चौथा है ‘हूर’ ये लफ़्ज़ जन्नती औरतों के लिए इस्तेमाल हुआ है (हालाँकि इसे औरतों और मर्दों दोनों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है):
وَ حُوۡرٌ عِیۡنٌ
“और ख़ूबसूरत आँखों वालियाँ” (56 : 22)
مُتَّکِئِیۡنَ عَلٰی سُرُرٍ مَّصۡفُوۡفَۃٍ ۚ وَ زَوَّجۡنٰہُمۡ بِحُوۡرٍ عِیۡنٍ
“वो आमने-सामने बिछे हुए तख़्तों पर तकिये लगाए बैठे होंगे और हम उनका जोड़ा बना देंगे ख़ूबसूरत आँखों वालियों के साथ। (52 : 20)
کَذٰلِکَ ۟ وَ زَوَّجۡنٰہُمۡ بِحُوۡرٍ عِیۡنٍ
“और इस तरह हम उनका जोड़ा ख़ूबसूरत आँखोंवालियों के साथ बना देंगे। (44 : 54)
आइये अब इस लफ़्ज़ की तहक़ीक़ और तफ़्सीली मालूमात हासिल करते हैं।
अरबी ज़बान में “हूर” का मतलब “लौटना, घूमना, वापस होना, या एक हालत से दूसरी हालत में बदल जाना” है। इसी से लफ़्ज़ ‘महवर’ बना है, महवर उस धुरी को कहते हैं जिस पर कोई चीज़ घूमती है, चक्कर लगाती है। इसी से लफ़्ज़ ‘मुहावरा’ बना है, इसका मतलब होता है कि कोई ऐसी बात जिसे लोगों ने बार-बार के इस्तेमाल से किसी मुतय्यन माना के लिए ख़ास कर लिया हो। इसी से ‘तहावुर’ बातचीत के लिये इस्तेमाल किया जाता है। इसका मतलब बातचीत भी इसीलिये लिया गया है कि बातचीत बार बार पलटाई जाती है।
एक मतलब ये भी लिया गया है कि हूर का मतलब सफ़ेद होना भी है। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के साथियों को हवारी कहा गया है। इस सिलसिले में एक राय तो ये है कि वे चूँकि धोबी थे इसलिये उन्हें हवारी कहा गया है। (ग़ालिब गुमान ये है कि धोबी चूँकि कपड़ों को बार-बार पलटकर उसको साफ़ और सफ़ेद कर देता है इसीलिये उसे हवारी कहा जाने लगा)
दूसरी राय ये है कि उनकी अपनी पाकी और सफ़ाई की वजह से उन्हें हवारी कहा जाता है और इसी से ये बात भी समझी गई है की उनकी नीयत के इख़लास, किरदार की पाकीज़गी और फ़िक्र की सुथराई की वजह से उन्हें हवारी कहा गया है।
एक बात और समझने की है कि हूर लफ़्ज़ जमा (Plural) है, इसका वाहिद (Singular) ‘अहवर’ है जो कि मुज़क्कर और ‘हौरा’ भी है जो कि मुअन्नस है। यानी हूर लफ़्ज़ मुज़क्कर और मुअन्नस दोनों के लिए इस्तेमाल होता है। ‘अल-हौर’ का मतलब है आँख की सफ़ेदी का बहुत सफ़ेद और स्याही का बहुत स्याह होना और जिस्म की खाल का बहुत साफ़ होना। यानी ऐसे मर्द और औरतें जिनमें ये ख़ुसूसियात पाई जाएँ हूर कहलाएँगे।
साफ़ ज़ाहिर हो गया कि हूर का मतलब सिर्फ़ ख़ूबसूरती नहीं, बल्कि सफ़ाई, लताफ़त और इख़लास भी है। आँख की सफ़ेदी और सियाही का तवाज़ुन, नीयत की पाकीज़गी, किरदार की मज़बूती और ज़ेहनी व रूहानी तहारत सब इस लफ़्ज़ के मअनी में शामिल हैं। राग़िब असफ़हानी और इब्ने फ़ारिस जैसे माहिरीने-लुग़त के मुताबिक़, “हूर” न सिर्फ़ जिस्मानी तौर पर हसीन होने का तसव्वुर रखता है, बल्कि इसमें अ़क़्ल व फ़िक्र की सफ़ाई और किरदार की बुलंदी भी शामिल है। क़ुरआन में जन्नती मुआशरे की पाकीज़ा सिफ़ात को बयान करने के लिए “हूर” का इस्तेमाल हुआ है, जो एक ऐसे दोस्ताना माहौल की निशानदेही करता है जहाँ बाहमी ताल्लुक़ात किसी भी तरह की बदनीयती, धोका या फ़रेब से पाक होंगे।
“व-ज़व्वज्नाहुम बिहूरिन-ईन” (अत-तूर : 20) में “ज़ौज” का मतलब महज़ निकाह करना नहीं, बल्कि हम-नशीनी, पाकीज़ा रफ़ाक़त और बेहतरीन सोहबत है। जन्नत में अल्लाह के नेक बंदों को ऐसी हम-नशीनी और दोस्ती नसीब होगी जो हर तरह की गन्दगियों और दुनियावी कमज़ोरियों से पाक होगी। जिस तरह दुनिया में एक अच्छा दोस्त, एक सच्चा साथी और एक मुख़लिस हमसफ़र ज़ेहनी सुकून का बाइस होता है, उसी तरह जन्नत में “हूर” का तसव्वुर सिर्फ़ एक साथी के तौर पर नहीं, बल्कि रूहानी और ज़ेहनी हमआहंगी के इज़हार के लिए भी आया है।
ये बात भी क़ाबिले-ग़ौर है कि पूरे क़ुरआन और सही तरीन हदीसों में “72 हूरों” का कहीं कोई ज़िक्र नहीं मिलता। ये तसव्वुर इस्लामी तालीमात की सही समझ से हटकर एक अफ़्साना बन गया है, जिसका इस्तेमाल ख़ास तौर पर नौजवानों को गुमराह करने और उन्हें जिहाद के नाम पर ग़लत रास्तों पर ले जाने के लिए किया जाता है। जो लोग 72 हूरों का लालच देकर किसी भी क़िस्म के जिहाद की तरग़ीब देते हैं, वो सरासर एक तख़रीबी और क़ुरआन व हदीस की मनशा के बिल्कुल ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं। इस्लाम में जिहाद का असल मक़सद इंसाफ़, अद्ल, और अमन क़ायम करने की जिद्दोजुहद करना है, न कि जन्नत के नाम पर झूटी उम्मीदें देकर नौजवानों को अपने नापाक इरादों के लिए इस्तेमाल करना। ये एक सरासर घड़ा हुआ प्रोपेगेंडा है कि इस्लाम में “हूर” का ज़िक्र नौजवानों को जिहाद के लिए तैयार करने की ग़रज़ से किया गया है। जिहाद का हक़ीक़ी मक़सद तो ये है कि एक मोमिन ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा हो, मुआशरे में अम्न व सलामती को क़ायम करे और अद्ल व इंसाफ़ को बहाल करे।
इस्लामी तालीमात के मुताबिक़, जन्नत की नेमतें हर उस शख़्स के लिए हैं जो नेकी, इख़लास, सब्र और अद्ल के असूलों पर चलता है। क़ुरआन की रोशनी में, जन्नत का वादा उन लोगों के लिए है जो अल्लाह की रज़ा के लिए ज़िंदगी गुज़ारते हैं, न कि महज़ किसी जिस्मानी लालच के तहत। “हूर” का ज़िक्र दरअस्ल इस बात की अलामत है कि जन्नत में हर शख़्स को ऐसा माहौल मयस्सर होगा जहाँ जिस्मानी, रूहानी और ज़ेहनी सुकून अपने बेहतरीन दर्जे पर होगा। जहाँ मर्दों को उनकी बीवियाँ और औरतों को उनके शौहर हम-नशीन और हम-फ़िक्र मिलेंगे और आस-पास जो लोग होंगे वो भी हम-फ़िक्र और बेहतरीन किरदार के होंगे।
इस्लाम में जन्नत की बशारत दरअस्ल अल्लाह के क़ुर्ब, अमन व सुकून और एक मुकम्मल, बे-ऐब और पाकीज़ा ज़िंदगी के वअदे पर मबनी है। “हूर” का तसव्वुर इसी पाकीज़गी, हमआहंगी और ज़ेहनी व रूहानी सुकून व इत्मीनान की अलामत है। जन्नत का वो माहौल— जहाँ न कोई धोका होगा, न मकारी, न फ़रेब और न ही किसी क़िस्म की नापाकी— एक ऐसा माहौल होगा जहाँ हर ताल्लुक़ इख़लास, मोहब्बत और ख़ैर-ख़्वाही पर मबनी होगा। यही वो हक़ीक़त है जिसे समझने और अपनाने की ज़रूरत है ताकि इस्लाम के हक़ीक़ी पैग़ाम को उसकी असल रूह के मुताबिक़ आम किया जा सके।
इन्तिहाई अफ़सोस की बात है कि आज भी हमारी मस्जिदों के मेंबर से बहुत से वाइज़ तक़रीर करते हुए जन्नत में हूरों की ख़ूबसूरती को बहुत ही बेहूदा तरीक़े से बयान कर रहे होते हैं, और इसके लिए दलील ये पेश करते हैं कि इस तरह की बातें हदीसों में आई हैं और ये सब जन्नत की ख़ाहिश पैदा करने के लिये करते हैं ताकि लोग नेक अमल करने की तरफ़ मायल हों। हालाँकि इस क़िस्म की सभी हदीसें इन्तिहाई कमज़ोर और मन-घड़न्त हैं। नेकी की तरफ़ मायल करने के लिये अल-हम्दुलिल्लाह क़ुरआन काफ़ी है।