Masjid sey Bazar tak

Masjid sey Bazar tak

मस्जिद से बाज़ार तक ज़ैद एक बहुत ही नेक, इबादत गुज़ार, और ज़िक्र व अज़कार का पाबंद इंसान था। पाँच वक़्त की नमाज़ों के साथ-साथ तहज्जुद, इशराक़, अव्वाबीन जैसी नफ़्ल नमाज़ों की पाबन्दी उसके लिये ऐसे ही थी जैसे जिस्म के लिए रूह। रमज़ान उसके लिये महज़ एक महीना नहीं, रहमतों से भरा एक रूहानी सफ़र होता था। साल के बाक़ी महीनों में भी वह नफ़्ली रोज़ों से अपने नफ़्स का तज़किया करता रहता। फ़र्ज़ इबादतों के अलावा शायद ही कोई ऐसी नफ़्ल इबादत हो जो ज़ैद ने न अपना रखी हो। सुबह-शाम की तस्बीहात उसकी आदत का हिस्सा थीं, और उसकी ज़बान पर हर वक़्त “सुब्हान अल्लाह, अल्हम्दु लिल्लाह, अल्लाहु अकबर” का विर्द यूँ चलता जैसे दिल धड़क रहा हो। ऐसा नहीं था कि ज़ैद दुनियादारी से अनजान कोई अनपढ़ शख़्स था। उसने एक नामचीन यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी-टेक किया था और एक मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छा-ख़ासा मुक़ाम हासिल किया था। मगर नमाज़, रोज़ा और दूसरी इबादतों में आने वाली मुश्किलों के चलते उसने फ़ैसला किया कि : “रब की बन्दगी में दुनिया और नौकरी को रुकावट नहीं बनने देगा।” इस सोच के साथ उसने नौकरी छोड़ दी और ख़ुद का कारोबार करना शुरू कर दिया। मगर… कारोबार चल नहीं सका। जो काम शुरू करता, बिगड़ जाता। जिस कारोबार में पैसा लगाता, डूब जाता। एक दोस्त के साथ मिलकर काम शुरू किया, मगर वो भी बीच में ही साथ छोड़ गया। कार पार्ट्स की दुकान खोली — मगर वह भी कुछ चल ही नहीं रही। बच्चों की फ़ीस अदा न कर सका, तो स्कूल से निकाल दिए गए। घर में मायूसी का डेरा था — बच्चों की आँखों में सवाल थे, बीवी की पेशानी पर शिकन, और ज़ैद…? ज़ैद अब भी मस्जिद की पहली सफ में खड़ा होकर यही समझ रहा था कि “रब के सबसे क़रीब वही है जो सबसे आगे सजदे में गिरता है।” ऐसा नहीं था कि ज़ैद को हालात ने रुलाया नहीं था। वह बेचैन था — मगर उसकी बेचैनी उसे इबादतों में और ज़्यादा डुबो देती थी। उसे लगता — शायद अभी मेरी बंदगी में कुछ कमी है। जिस रोज़ मेरी इबादत मुकम्मल हो जाएगी, उसी दिन मेरी तक़दीर भी बदल जाएगी। मगर… हालात थे कि हर दिन और बदतर होते चले जा रहे थे। यहाँ तक कि अपने ही रिश्तेदारों ने अब ताने देना शुरू कर दिया: “ज़ैद तो अब इबादत में ही गुम है, घर-बार और बच्चों से जैसे कोई वास्ता ही नहीं।” मगर सबसे गहरा वार तब हुआ जब एक शाम उसकी बीवी ने बहुत धीमी और काँपती हुई आवाज़ में कहा: “ज़ैद… तुमने अल्लाह से तो रिश्ता जोड़ लिया, मगर हमारे हिस्से में क्या आया? देखो इन मासूम आँखों में उम्मीद की रौशनी दिन-ब-दिन बुझती जा रही है। क्या हमारा रब सिर्फ़ सज्दे माँगता है, या यह भी देखता है कि बन्दा अपनी ज़िम्मेदारियों को कितना निभाता है?” उसकी आवाज़ में इल्ज़ाम नहीं था — बस एक माँ की टूटी हुई हिम्मत और एक बीवी की सिसकती उम्मीद थी जो हर शाम रब से सिर्फ़ इतना पूछती थी: “या अल्लाह… इस घर की क़िस्मत कब बदलेगी?” उसी रात, इशा की नमाज़ के बाद ज़ैद घर लौटा। उसने मुसल्ला बिछाया, और एक बार फिर नमाज़ में खड़ा हो गया। मगर आज… उसका जिस्म थका हुआ था, और रूह टूटी हुई। वो ठीक से खड़ा भी न हो सका और सीधे सजदे में गिर पड़ा। काफ़ी देर तक यूँ ही रोता रहा — मगर आज सजदे में सुकून नहीं था… एक बेचैनी थी…या शायद शिकवा…या शायद बस कुछ टूटे हुए दिल के कुछ सवाल। उसने सजदे में ही पुकारा: “ऐ मेरे मालिक! मैंने तो अपना दिन तेरे नाम किया, अपनी रातें तेरे हवाले कीं।… न आँखों को चैन दिया, न जिस्म को सुकून। मैंने कभी नमाज़ नहीं छोड़ी, रोज़े नहीं तोड़े — फिर भी मेरी झोली ख़ाली, मेरी दुनिया उजड़ी हुई… आख़िर क्यों? क्या मेरी इबादतें तुझ तक नहीं पहुँचतीं? क्या यही है मेरी इबादतों का सिला?” क्या तू वाक़ई है भी? अगर है — तो मेरी दुआ कब सुनेगा? सजदे की हालत में उसकी आँखों से आँसुओं की बूँदें जानमाज़ पर टप-टप कर गिर रही थीं, सीने में दिल धक-धक कर काफ़ी तेज़ी से धड़क रहा था। उसकी बीवी ने आकर उसे तसल्ली दी, पानी पिलाया, उसका सर उठाकर अपनी गोद में रखा और हलके-हलके सहलाने लगी। इसी हालत में ज़ैद को नींद आ गई…और उसी नींद में, एक अजनबी ख़्वाब ने दस्तक दी। उसने देखा कि वह एक सुनसान घाटी में खड़ा था। चारों तरफ़ घुप अँधेरा था, सिर्फ़ एक रौशनी थी जो उसके क़दमों तले चल रही थी, फिर एक रौबदार मगर दिल को छू लेनेवाली आवाज़ आई। ज़ैद उस आवाज़ को सुनता रहा — “ऐ आदम की औलाद तू भी कितना ज़ालिम और जाहिल है! जिस काम का हुक्म दिया जाता है उस काम को करता नहीं है और जिसका हुक्म नहीं दिया जाता है उस काम में अपनी जान खपाता है!” ज़ैद को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या है! वह हैरान था और समझने की कोशिश कर रहा था। उसने फिर से आवाज़ सुनी। “ऐ आदम की औलाद! तुझपर पाँच वक़्त की नमाज़ फ़र्ज़ की गई थी और हुक्म दिया था कि जब तू इबादत से फ़ारिग़ हो जाए तो ज़मीन पर फैल जा और रिज़्क़ तलाश कर! मगर तूने क्या किया? तूने फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद भी मस्जिद का कोना पकड़ लिया।” ज़ैद ने काँपती आवाज़ में पूछा, “तो क्या मैं ग़लत इबादत कर रहा था?” आवाज़ आई — “इबादत कभी ग़लत नहीं होती, लेकिन जब वो इंसान को उसकी ज़िम्मेदारियों से ग़ाफ़िल कर दे, तो वो इबादत नहीं, रूहानी ख़ुदग़र्ज़ी बन जाती है।” ज़ैद बहुत असमंजस में था, उसे तो अभी तक यही बताया गया था कि नमाज़ और रोज़ा ही असल इबादत है। फिर से आवाज़ आई : “क्या तुम्हें याद नहीं कि हमने तुम्हें ज़मीन में ख़लीफ़ा बनाया? यानी तुम्हें ज़मीन की ज़िम्मेदारी सौंपी थी — कि इस ज़मीन पर रहते हुए हमारी इबादत भी करो और अपने घरवालों और समाज की देखभाल करो, बेहतर से बेहतर इल्म और हुनर हासिल करो और उससे अपने समाज को फ़ायदा पहुँचाओ, और इस दुनिया को भी उतना ही सँवारो जितना कि इबादत में तुम अपनी रूह को सँवारते हो।” अब ज़ैद को कुछ समझ में आता जा रहा था। उसके सीने में जो बेचैनी थी वह अब शान्त होती जा रही थी। फिर से आवाज़ आई : “ज़ैद! सज्दे में सिर रखना आसान है, मगर सज्दे के बाहर की दुनिया में अमानत और इंसाफ़ के साथ जीना ही असली इबादत है।” ये कहते ही वो रौशनी जो ज़ैद के क़दमों के नीचे चल रही थी, धीरे-धीरे उसके दिल तक उतर गई — और फिर सब कुछ अँधेरे में समा गया। अचानक ज़ैद की आँख खुली। उसका सर बीवी की गोद में रखा हुआ था। वो उठकर बैठ गया। अब उसकी हालत बिलकुल ऐसी थी जैसे किसी ने पानी से बाहर की मछली को पानी में लाकर छोड़ दिया हो। उसे लगा कि जो मशक़्क़त उसने इबादत में की थी अगर इबादत के साथ उतनी ही मेहनत रोज़गार को बेहतर बनाने में की होती तो आज ये हालत न होती। उसकी आँखों से फिर आँसू जारी हो गए। मगर अब वो आँसू शिकायत के नहीं, फ़हम और फ़ैसले के आँसू थे। उसी वक़्त उसने अपने बच्चों को पास बुलाया, उन्हें सीने से लगाया, और रुख़ बीवी की तरफ़ देखते हुए कहा — आज मुझे अहसास हो गया कि अल्लाह को सिर्फ़ हमारा सजदा नहीं चाहिये, बल्कि वह देखना यह चाहता है कि हम अपने मामलात में उसको कितना याद रखते हैं, अपने कारोबार में उसकी तरफ़ रुख़ करते हैं या नहीं। मैं बहुत बड़ी ग़लती कर रहा था, मगर अब वो ग़लतियाँ नहीं होंगी। अब इबादत करूँगा जो अल्लाह को मतलूब है। न कि वो इबादत जो हमें समझा दी गई है। अगले दिन सूरज निकला तो ज़ैद भी निकल पड़ा — पहले मस्जिद गया और नमाज़ के बाद दुकान खोली और अब उसका रोज़ का यही मअमूल बन गया। उसने उसी मेहनत और उसी नियत से काम शुरू किया, मगर अब उसका हर लेन-देन भी एक इबादत था। वह दुकान के ग्राहकों से मुस्कुरा कर बात करता, हर माल की क़ीमत में ईमानदारी रखता और जब वक़्त होता तो नमाज़ भी उसी सलीक़े से अदा करता। अब वह जान चुका था कि इबादत वही है, जो इंसान को इंसान बना दे। जो सजदे से उठा कर उसे मख़लूक़ की सेवा में लगा दे।
Hindi
मस्जिद से बाज़ार तक ज़ैद एक बहुत ही नेक, इबादत गुज़ार, और ज़िक्र व अज़कार का पाबंद इंसान था। पाँच वक़्त की नमाज़ों के साथ-साथ तहज्जुद, इशराक़, अव्वाबीन जैसी नफ़्ल नमाज़ों की पाबन्दी उसके लिये ऐसे ही थी जैसे जिस्म के लिए रूह। रमज़ान उसके लिये महज़ एक महीना नहीं, रहमतों से भरा एक रूहानी सफ़र होता था। साल के बाक़ी महीनों में भी वह नफ़्ली रोज़ों से अपने नफ़्स का तज़किया करता रहता। फ़र्ज़ इबादतों के अलावा शायद ही कोई ऐसी नफ़्ल इबादत हो जो ज़ैद ने न अपना रखी हो। सुबह-शाम की तस्बीहात उसकी आदत का हिस्सा थीं, और उसकी ज़बान पर हर वक़्त “सुब्हान अल्लाह, अल्हम्दु लिल्लाह, अल्लाहु अकबर” का विर्द यूँ चलता जैसे दिल धड़क रहा हो। ऐसा नहीं था कि ज़ैद दुनियादारी से अनजान कोई अनपढ़ शख़्स था। उसने एक नामचीन यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी-टेक किया था और एक मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छा-ख़ासा मुक़ाम हासिल किया था। मगर नमाज़, रोज़ा और दूसरी इबादतों में आने वाली मुश्किलों के चलते उसने फ़ैसला किया कि : “रब की बन्दगी में दुनिया और नौकरी को रुकावट नहीं बनने देगा।” इस सोच के साथ उसने नौकरी छोड़ दी और ख़ुद का कारोबार करना शुरू कर दिया। मगर… कारोबार चल नहीं सका। जो काम शुरू करता, बिगड़ जाता। जिस कारोबार में पैसा लगाता, डूब जाता। एक दोस्त के साथ मिलकर काम शुरू किया, मगर वो भी बीच में ही साथ छोड़ गया। कार पार्ट्स की दुकान खोली — मगर वह भी कुछ चल ही नहीं रही। बच्चों की फ़ीस अदा न कर सका, तो स्कूल से निकाल दिए गए। घर में मायूसी का डेरा था — बच्चों की आँखों में सवाल थे, बीवी की पेशानी पर शिकन, और ज़ैद…? ज़ैद अब भी मस्जिद की पहली सफ में खड़ा होकर यही समझ रहा था कि “रब के सबसे क़रीब वही है जो सबसे आगे सजदे में गिरता है।” ऐसा नहीं था कि ज़ैद को हालात ने रुलाया नहीं था। वह बेचैन था — मगर उसकी बेचैनी उसे इबादतों में और ज़्यादा डुबो देती थी। उसे लगता — शायद अभी मेरी बंदगी में कुछ कमी है। जिस रोज़ मेरी इबादत मुकम्मल हो जाएगी, उसी दिन मेरी तक़दीर भी बदल जाएगी। मगर… हालात थे कि हर दिन और बदतर होते चले जा रहे थे। यहाँ तक कि अपने ही रिश्तेदारों ने अब ताने देना शुरू कर दिया: “ज़ैद तो अब इबादत में ही गुम है, घर-बार और बच्चों से जैसे कोई वास्ता ही नहीं।” मगर सबसे गहरा वार तब हुआ जब एक शाम उसकी बीवी ने बहुत धीमी और काँपती हुई आवाज़ में कहा: “ज़ैद… तुमने अल्लाह से तो रिश्ता जोड़ लिया, मगर हमारे हिस्से में क्या आया? देखो इन मासूम आँखों में उम्मीद की रौशनी दिन-ब-दिन बुझती जा रही है। क्या हमारा रब सिर्फ़ सज्दे माँगता है, या यह भी देखता है कि बन्दा अपनी ज़िम्मेदारियों को कितना निभाता है?” उसकी आवाज़ में इल्ज़ाम नहीं था — बस एक माँ की टूटी हुई हिम्मत और एक बीवी की सिसकती उम्मीद थी जो हर शाम रब से सिर्फ़ इतना पूछती थी: “या अल्लाह… इस घर की क़िस्मत कब बदलेगी?” उसी रात, इशा की नमाज़ के बाद ज़ैद घर लौटा। उसने मुसल्ला बिछाया, और एक बार फिर नमाज़ में खड़ा हो गया। मगर आज… उसका जिस्म थका हुआ था, और रूह टूटी हुई। वो ठीक से खड़ा भी न हो सका और सीधे सजदे में गिर पड़ा। काफ़ी देर तक यूँ ही रोता रहा — मगर आज सजदे में सुकून नहीं था… एक बेचैनी थी…या शायद शिकवा…या शायद बस कुछ टूटे हुए दिल के कुछ सवाल। उसने सजदे में ही पुकारा: “ऐ मेरे मालिक! मैंने तो अपना दिन तेरे नाम किया, अपनी रातें तेरे हवाले कीं।… न आँखों को चैन दिया, न जिस्म को सुकून। मैंने कभी नमाज़ नहीं छोड़ी, रोज़े नहीं तोड़े — फिर भी मेरी झोली ख़ाली, मेरी दुनिया उजड़ी हुई… आख़िर क्यों? क्या मेरी इबादतें तुझ तक नहीं पहुँचतीं? क्या यही है मेरी इबादतों का सिला?” क्या तू वाक़ई है भी? अगर है — तो मेरी दुआ कब सुनेगा? सजदे की हालत में उसकी आँखों से आँसुओं की बूँदें जानमाज़ पर टप-टप कर गिर रही थीं, सीने में दिल धक-धक कर काफ़ी तेज़ी से धड़क रहा था। उसकी बीवी ने आकर उसे तसल्ली दी, पानी पिलाया, उसका सर उठाकर अपनी गोद में रखा और हलके-हलके सहलाने लगी। इसी हालत में ज़ैद को नींद आ गई…और उसी नींद में, एक अजनबी ख़्वाब ने दस्तक दी। उसने देखा कि वह एक सुनसान घाटी में खड़ा था। चारों तरफ़ घुप अँधेरा था, सिर्फ़ एक रौशनी थी जो उसके क़दमों तले चल रही थी, फिर एक रौबदार मगर दिल को छू लेनेवाली आवाज़ आई। ज़ैद उस आवाज़ को सुनता रहा — “ऐ आदम की औलाद तू भी कितना ज़ालिम और जाहिल है! जिस काम का हुक्म दिया जाता है उस काम को करता नहीं है और जिसका हुक्म नहीं दिया जाता है उस काम में अपनी जान खपाता है!” ज़ैद को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या है! वह हैरान था और समझने की कोशिश कर रहा था। उसने फिर से आवाज़ सुनी। “ऐ आदम की औलाद! तुझपर पाँच वक़्त की नमाज़ फ़र्ज़ की गई थी और हुक्म दिया था कि जब तू इबादत से फ़ारिग़ हो जाए तो ज़मीन पर फैल जा और रिज़्क़ तलाश कर! मगर तूने क्या किया? तूने फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद भी मस्जिद का कोना पकड़ लिया।” ज़ैद ने काँपती आवाज़ में पूछा, “तो क्या मैं ग़लत इबादत कर रहा था?” आवाज़ आई — “इबादत कभी ग़लत नहीं होती, लेकिन जब वो इंसान को उसकी ज़िम्मेदारियों से ग़ाफ़िल कर दे, तो वो इबादत नहीं, रूहानी ख़ुदग़र्ज़ी बन जाती है।” ज़ैद बहुत असमंजस में था, उसे तो अभी तक यही बताया गया था कि नमाज़ और रोज़ा ही असल इबादत है। फिर से आवाज़ आई : “क्या तुम्हें याद नहीं कि हमने तुम्हें ज़मीन में ख़लीफ़ा बनाया? यानी तुम्हें ज़मीन की ज़िम्मेदारी सौंपी थी — कि इस ज़मीन पर रहते हुए हमारी इबादत भी करो और अपने घरवालों और समाज की देखभाल करो, बेहतर से बेहतर इल्म और हुनर हासिल करो और उससे अपने समाज को फ़ायदा पहुँचाओ, और इस दुनिया को भी उतना ही सँवारो जितना कि इबादत में तुम अपनी रूह को सँवारते हो।” अब ज़ैद को कुछ समझ में आता जा रहा था। उसके सीने में जो बेचैनी थी वह अब शान्त होती जा रही थी। फिर से आवाज़ आई : “ज़ैद! सज्दे में सिर रखना आसान है, मगर सज्दे के बाहर की दुनिया में अमानत और इंसाफ़ के साथ जीना ही असली इबादत है।” ये कहते ही वो रौशनी जो ज़ैद के क़दमों के नीचे चल रही थी, धीरे-धीरे उसके दिल तक उतर गई — और फिर सब कुछ अँधेरे में समा गया। अचानक ज़ैद की आँख खुली। उसका सर बीवी की गोद में रखा हुआ था। वो उठकर बैठ गया। अब उसकी हालत बिलकुल ऐसी थी जैसे किसी ने पानी से बाहर की मछली को पानी में लाकर छोड़ दिया हो। उसे लगा कि जो मशक़्क़त उसने इबादत में की थी अगर इबादत के साथ उतनी ही मेहनत रोज़गार को बेहतर बनाने में की होती तो आज ये हालत न होती। उसकी आँखों से फिर आँसू जारी हो गए। मगर अब वो आँसू शिकायत के नहीं, फ़हम और फ़ैसले के आँसू थे। उसी वक़्त उसने अपने बच्चों को पास बुलाया, उन्हें सीने से लगाया, और रुख़ बीवी की तरफ़ देखते हुए कहा — आज मुझे अहसास हो गया कि अल्लाह को सिर्फ़ हमारा सजदा नहीं चाहिये, बल्कि वह देखना यह चाहता है कि हम अपने मामलात में उसको कितना याद रखते हैं, अपने कारोबार में उसकी तरफ़ रुख़ करते हैं या नहीं। मैं बहुत बड़ी ग़लती कर रहा था, मगर अब वो ग़लतियाँ नहीं होंगी। अब इबादत करूँगा जो अल्लाह को मतलूब है। न कि वो इबादत जो हमें समझा दी गई है। अगले दिन सूरज निकला तो ज़ैद भी निकल पड़ा — पहले मस्जिद गया और नमाज़ के बाद दुकान खोली और अब उसका रोज़ का यही मअमूल बन गया। उसने उसी मेहनत और उसी नियत से काम शुरू किया, मगर अब उसका हर लेन-देन भी एक इबादत था। वह दुकान के ग्राहकों से मुस्कुरा कर बात करता, हर माल की क़ीमत में ईमानदारी रखता और जब वक़्त होता तो नमाज़ भी उसी सलीक़े से अदा करता। अब वह जान चुका था कि इबादत वही है, जो इंसान को इंसान बना दे। जो सजदे से उठा कर उसे मख़लूक़ की सेवा में लगा दे।

मस्जिद से बाज़ार तक

ज़ैद एक बहुत ही नेक, इबादत गुज़ार, और ज़िक्र व अज़कार का पाबंद इंसान था।
पाँच वक़्त की नमाज़ों के साथ-साथ तहज्जुद, इशराक़, अव्वाबीन जैसी नफ़्ल नमाज़ों की पाबन्दी उसके लिये ऐसे ही थी जैसे जिस्म के लिए रूह।
रमज़ान उसके लिये महज़ एक महीना नहीं, रहमतों से भरा एक रूहानी सफ़र होता था। साल के बाक़ी महीनों में भी वह नफ़्ली रोज़ों से अपने नफ़्स का तज़किया करता रहता। फ़र्ज़ इबादतों के अलावा शायद ही कोई ऐसी नफ़्ल इबादत हो जो ज़ैद ने न अपना रखी हो।
सुबह-शाम की तस्बीहात उसकी आदत का हिस्सा थीं, और उसकी ज़बान पर हर वक़्त “सुब्हान अल्लाह, अल्हम्दु लिल्लाह, अल्लाहु अकबर” का विर्द यूँ चलता जैसे दिल धड़क रहा हो।

ऐसा नहीं था कि ज़ैद दुनियादारी से अनजान कोई अनपढ़ शख़्स था। उसने एक नामचीन यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी-टेक किया था और एक मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छा-ख़ासा मुक़ाम हासिल किया था। मगर नमाज़, रोज़ा और दूसरी इबादतों में आने वाली मुश्किलों के चलते उसने फ़ैसला किया कि :
“रब की बन्दगी में दुनिया और नौकरी को रुकावट नहीं बनने देगा।”
इस सोच के साथ उसने नौकरी छोड़ दी और ख़ुद का कारोबार करना शुरू कर दिया।
मगर… कारोबार चल नहीं सका।
जो काम शुरू करता, बिगड़ जाता। जिस कारोबार में पैसा लगाता, डूब जाता।
एक दोस्त के साथ मिलकर काम शुरू किया, मगर वो भी बीच में ही साथ छोड़ गया।
कार पार्ट्स की दुकान खोली — मगर वह भी कुछ चल ही नहीं रही।

बच्चों की फ़ीस अदा न कर सका, तो स्कूल से निकाल दिए गए।
घर में मायूसी का डेरा था — बच्चों की आँखों में सवाल थे, बीवी की पेशानी पर शिकन, और ज़ैद…? ज़ैद अब भी मस्जिद की पहली सफ में खड़ा होकर यही समझ रहा था कि “रब के सबसे क़रीब वही है जो सबसे आगे सजदे में गिरता है।”

ऐसा नहीं था कि ज़ैद को हालात ने रुलाया नहीं था। वह बेचैन था — मगर उसकी बेचैनी उसे इबादतों में और ज़्यादा डुबो देती थी। उसे लगता — शायद अभी मेरी बंदगी में कुछ कमी है। जिस रोज़ मेरी इबादत मुकम्मल हो जाएगी, उसी दिन मेरी तक़दीर भी बदल जाएगी।
मगर… हालात थे कि हर दिन और बदतर होते चले जा रहे थे। यहाँ तक कि अपने ही रिश्तेदारों ने अब ताने देना शुरू कर दिया:
“ज़ैद तो अब इबादत में ही गुम है, घर-बार और बच्चों से जैसे कोई वास्ता ही नहीं।”
मगर सबसे गहरा वार तब हुआ जब एक शाम उसकी बीवी ने बहुत धीमी और काँपती हुई आवाज़ में कहा:
“ज़ैद… तुमने अल्लाह से तो रिश्ता जोड़ लिया, मगर हमारे हिस्से में क्या आया? देखो इन मासूम आँखों में उम्मीद की रौशनी दिन-ब-दिन बुझती जा रही है।
क्या हमारा रब सिर्फ़ सज्दे माँगता है, या यह भी देखता है कि बन्दा अपनी ज़िम्मेदारियों को कितना निभाता है?”
उसकी आवाज़ में इल्ज़ाम नहीं था — बस एक माँ की टूटी हुई हिम्मत और एक बीवी की सिसकती उम्मीद थी जो हर शाम रब से सिर्फ़ इतना पूछती थी:
“या अल्लाह… इस घर की क़िस्मत कब बदलेगी?”

उसी रात, इशा की नमाज़ के बाद ज़ैद घर लौटा। उसने मुसल्ला बिछाया, और एक बार फिर नमाज़ में खड़ा हो गया। मगर आज… उसका जिस्म थका हुआ था, और रूह टूटी हुई। वो ठीक से खड़ा भी न हो सका और सीधे सजदे में गिर पड़ा।
काफ़ी देर तक यूँ ही रोता रहा — मगर आज सजदे में सुकून नहीं था… एक बेचैनी थी…या शायद शिकवा…या शायद बस कुछ टूटे हुए दिल के कुछ सवाल।
उसने सजदे में ही पुकारा:
“ऐ मेरे मालिक! मैंने तो अपना दिन तेरे नाम किया, अपनी रातें तेरे हवाले कीं।… न आँखों को चैन दिया, न जिस्म को सुकून।
मैंने कभी नमाज़ नहीं छोड़ी, रोज़े नहीं तोड़े — फिर भी मेरी झोली ख़ाली, मेरी दुनिया उजड़ी हुई…
आख़िर क्यों?
क्या मेरी इबादतें तुझ तक नहीं पहुँचतीं?
क्या यही है मेरी इबादतों का सिला?”
क्या तू वाक़ई है भी?
अगर है — तो मेरी दुआ कब सुनेगा?
सजदे की हालत में उसकी आँखों से आँसुओं की बूँदें जानमाज़ पर टप-टप कर गिर रही थीं, सीने में दिल धक-धक कर काफ़ी तेज़ी से धड़क रहा था।
उसकी बीवी ने आकर उसे तसल्ली दी, पानी पिलाया, उसका सर उठाकर अपनी गोद में रखा और हलके-हलके सहलाने लगी।
इसी हालत में ज़ैद को नींद आ गई…और उसी नींद में, एक अजनबी ख़्वाब ने दस्तक दी।
उसने देखा कि वह एक सुनसान घाटी में खड़ा था। चारों तरफ़ घुप अँधेरा था, सिर्फ़ एक रौशनी थी जो उसके क़दमों तले चल रही थी, फिर एक रौबदार मगर दिल को छू लेनेवाली आवाज़ आई। ज़ैद उस आवाज़ को सुनता रहा —
“ऐ आदम की औलाद तू भी कितना ज़ालिम और जाहिल है! जिस काम का हुक्म दिया जाता है उस काम को करता नहीं है और जिसका हुक्म नहीं दिया जाता है उस काम में अपनी जान खपाता है!”
ज़ैद को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या है! वह हैरान था और समझने की कोशिश कर रहा था। उसने फिर से आवाज़ सुनी।
“ऐ आदम की औलाद! तुझपर पाँच वक़्त की नमाज़ फ़र्ज़ की गई थी और हुक्म दिया था कि जब तू इबादत से फ़ारिग़ हो जाए तो ज़मीन पर फैल जा और रिज़्क़ तलाश कर! मगर तूने क्या किया? तूने फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद भी मस्जिद का कोना पकड़ लिया।”

ज़ैद ने काँपती आवाज़ में पूछा,
“तो क्या मैं ग़लत इबादत कर रहा था?”
आवाज़ आई —
“इबादत कभी ग़लत नहीं होती, लेकिन जब वो इंसान को उसकी ज़िम्मेदारियों से ग़ाफ़िल कर दे, तो वो इबादत नहीं, रूहानी ख़ुदग़र्ज़ी बन जाती है।”
ज़ैद बहुत असमंजस में था, उसे तो अभी तक यही बताया गया था कि नमाज़ और रोज़ा ही असल इबादत है।
फिर से आवाज़ आई :
“क्या तुम्हें याद नहीं कि हमने तुम्हें ज़मीन में ख़लीफ़ा बनाया? यानी तुम्हें ज़मीन की ज़िम्मेदारी सौंपी थी — कि इस ज़मीन पर रहते हुए हमारी इबादत भी करो और अपने घरवालों और समाज की देखभाल करो, बेहतर से बेहतर इल्म और हुनर हासिल करो और उससे अपने समाज को फ़ायदा पहुँचाओ, और इस दुनिया को भी उतना ही सँवारो जितना कि इबादत में तुम अपनी रूह को सँवारते हो।”
अब ज़ैद को कुछ समझ में आता जा रहा था। उसके सीने में जो बेचैनी थी वह अब शान्त होती जा रही थी।
फिर से आवाज़ आई :
“ज़ैद! सज्दे में सिर रखना आसान है, मगर सज्दे के बाहर की दुनिया में अमानत और इंसाफ़ के साथ जीना ही असली इबादत है।”
ये कहते ही वो रौशनी जो ज़ैद के क़दमों के नीचे चल रही थी, धीरे-धीरे उसके दिल तक उतर गई — और फिर सब कुछ अँधेरे में समा गया।

अचानक ज़ैद की आँख खुली। उसका सर बीवी की गोद में रखा हुआ था।
वो उठकर बैठ गया। अब उसकी हालत बिलकुल ऐसी थी जैसे किसी ने पानी से बाहर की मछली को पानी में लाकर छोड़ दिया हो। उसे लगा कि जो मशक़्क़त उसने इबादत में की थी अगर इबादत के साथ उतनी ही मेहनत रोज़गार को बेहतर बनाने में की होती तो आज ये हालत न होती। उसकी आँखों से फिर आँसू जारी हो गए। मगर अब वो आँसू शिकायत के नहीं, फ़हम और फ़ैसले के आँसू थे। उसी वक़्त उसने अपने बच्चों को पास बुलाया,
उन्हें सीने से लगाया, और रुख़ बीवी की तरफ़ देखते हुए कहा —
आज मुझे अहसास हो गया कि अल्लाह को सिर्फ़ हमारा सजदा नहीं चाहिये, बल्कि वह देखना यह चाहता है कि हम अपने मामलात में उसको कितना याद रखते हैं, अपने कारोबार में उसकी तरफ़ रुख़ करते हैं या नहीं। मैं बहुत बड़ी ग़लती कर रहा था, मगर अब वो ग़लतियाँ नहीं होंगी। अब इबादत करूँगा जो अल्लाह को मतलूब है। न कि वो इबादत जो हमें समझा दी गई है।
अगले दिन सूरज निकला तो ज़ैद भी निकल पड़ा — पहले मस्जिद गया और नमाज़ के बाद दुकान खोली और अब उसका रोज़ का यही मअमूल बन गया। उसने उसी मेहनत और उसी नियत से काम शुरू किया, मगर अब उसका हर लेन-देन भी एक इबादत था।
वह दुकान के ग्राहकों से मुस्कुरा कर बात करता, हर माल की क़ीमत में ईमानदारी रखता और जब वक़्त होता तो नमाज़ भी उसी सलीक़े से अदा करता।
अब वह जान चुका था कि इबादत वही है, जो इंसान को इंसान बना दे। जो सजदे से उठा कर उसे मख़लूक़ की सेवा में लगा दे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

2 mins to read

हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

2 mins to read