मस्जिद से बाज़ार तक
ज़ैद एक बहुत ही नेक, इबादत गुज़ार, और ज़िक्र व अज़कार का पाबंद इंसान था।
पाँच वक़्त की नमाज़ों के साथ-साथ तहज्जुद, इशराक़, अव्वाबीन जैसी नफ़्ल नमाज़ों की पाबन्दी उसके लिये ऐसे ही थी जैसे जिस्म के लिए रूह।
रमज़ान उसके लिये महज़ एक महीना नहीं, रहमतों से भरा एक रूहानी सफ़र होता था। साल के बाक़ी महीनों में भी वह नफ़्ली रोज़ों से अपने नफ़्स का तज़किया करता रहता। फ़र्ज़ इबादतों के अलावा शायद ही कोई ऐसी नफ़्ल इबादत हो जो ज़ैद ने न अपना रखी हो।
सुबह-शाम की तस्बीहात उसकी आदत का हिस्सा थीं, और उसकी ज़बान पर हर वक़्त “सुब्हान अल्लाह, अल्हम्दु लिल्लाह, अल्लाहु अकबर” का विर्द यूँ चलता जैसे दिल धड़क रहा हो।
ऐसा नहीं था कि ज़ैद दुनियादारी से अनजान कोई अनपढ़ शख़्स था। उसने एक नामचीन यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी-टेक किया था और एक मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छा-ख़ासा मुक़ाम हासिल किया था। मगर नमाज़, रोज़ा और दूसरी इबादतों में आने वाली मुश्किलों के चलते उसने फ़ैसला किया कि :
“रब की बन्दगी में दुनिया और नौकरी को रुकावट नहीं बनने देगा।”
इस सोच के साथ उसने नौकरी छोड़ दी और ख़ुद का कारोबार करना शुरू कर दिया।
मगर… कारोबार चल नहीं सका।
जो काम शुरू करता, बिगड़ जाता। जिस कारोबार में पैसा लगाता, डूब जाता।
एक दोस्त के साथ मिलकर काम शुरू किया, मगर वो भी बीच में ही साथ छोड़ गया।
कार पार्ट्स की दुकान खोली — मगर वह भी कुछ चल ही नहीं रही।
बच्चों की फ़ीस अदा न कर सका, तो स्कूल से निकाल दिए गए।
घर में मायूसी का डेरा था — बच्चों की आँखों में सवाल थे, बीवी की पेशानी पर शिकन, और ज़ैद…? ज़ैद अब भी मस्जिद की पहली सफ में खड़ा होकर यही समझ रहा था कि “रब के सबसे क़रीब वही है जो सबसे आगे सजदे में गिरता है।”
ऐसा नहीं था कि ज़ैद को हालात ने रुलाया नहीं था। वह बेचैन था — मगर उसकी बेचैनी उसे इबादतों में और ज़्यादा डुबो देती थी। उसे लगता — शायद अभी मेरी बंदगी में कुछ कमी है। जिस रोज़ मेरी इबादत मुकम्मल हो जाएगी, उसी दिन मेरी तक़दीर भी बदल जाएगी।
मगर… हालात थे कि हर दिन और बदतर होते चले जा रहे थे। यहाँ तक कि अपने ही रिश्तेदारों ने अब ताने देना शुरू कर दिया:
“ज़ैद तो अब इबादत में ही गुम है, घर-बार और बच्चों से जैसे कोई वास्ता ही नहीं।”
मगर सबसे गहरा वार तब हुआ जब एक शाम उसकी बीवी ने बहुत धीमी और काँपती हुई आवाज़ में कहा:
“ज़ैद… तुमने अल्लाह से तो रिश्ता जोड़ लिया, मगर हमारे हिस्से में क्या आया? देखो इन मासूम आँखों में उम्मीद की रौशनी दिन-ब-दिन बुझती जा रही है।
क्या हमारा रब सिर्फ़ सज्दे माँगता है, या यह भी देखता है कि बन्दा अपनी ज़िम्मेदारियों को कितना निभाता है?”
उसकी आवाज़ में इल्ज़ाम नहीं था — बस एक माँ की टूटी हुई हिम्मत और एक बीवी की सिसकती उम्मीद थी जो हर शाम रब से सिर्फ़ इतना पूछती थी:
“या अल्लाह… इस घर की क़िस्मत कब बदलेगी?”
उसी रात, इशा की नमाज़ के बाद ज़ैद घर लौटा। उसने मुसल्ला बिछाया, और एक बार फिर नमाज़ में खड़ा हो गया। मगर आज… उसका जिस्म थका हुआ था, और रूह टूटी हुई। वो ठीक से खड़ा भी न हो सका और सीधे सजदे में गिर पड़ा।
काफ़ी देर तक यूँ ही रोता रहा — मगर आज सजदे में सुकून नहीं था… एक बेचैनी थी…या शायद शिकवा…या शायद बस कुछ टूटे हुए दिल के कुछ सवाल।
उसने सजदे में ही पुकारा:
“ऐ मेरे मालिक! मैंने तो अपना दिन तेरे नाम किया, अपनी रातें तेरे हवाले कीं।… न आँखों को चैन दिया, न जिस्म को सुकून।
मैंने कभी नमाज़ नहीं छोड़ी, रोज़े नहीं तोड़े — फिर भी मेरी झोली ख़ाली, मेरी दुनिया उजड़ी हुई…
आख़िर क्यों?
क्या मेरी इबादतें तुझ तक नहीं पहुँचतीं?
क्या यही है मेरी इबादतों का सिला?”
क्या तू वाक़ई है भी?
अगर है — तो मेरी दुआ कब सुनेगा?
सजदे की हालत में उसकी आँखों से आँसुओं की बूँदें जानमाज़ पर टप-टप कर गिर रही थीं, सीने में दिल धक-धक कर काफ़ी तेज़ी से धड़क रहा था।
उसकी बीवी ने आकर उसे तसल्ली दी, पानी पिलाया, उसका सर उठाकर अपनी गोद में रखा और हलके-हलके सहलाने लगी।
इसी हालत में ज़ैद को नींद आ गई…और उसी नींद में, एक अजनबी ख़्वाब ने दस्तक दी।
उसने देखा कि वह एक सुनसान घाटी में खड़ा था। चारों तरफ़ घुप अँधेरा था, सिर्फ़ एक रौशनी थी जो उसके क़दमों तले चल रही थी, फिर एक रौबदार मगर दिल को छू लेनेवाली आवाज़ आई। ज़ैद उस आवाज़ को सुनता रहा —
“ऐ आदम की औलाद तू भी कितना ज़ालिम और जाहिल है! जिस काम का हुक्म दिया जाता है उस काम को करता नहीं है और जिसका हुक्म नहीं दिया जाता है उस काम में अपनी जान खपाता है!”
ज़ैद को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या है! वह हैरान था और समझने की कोशिश कर रहा था। उसने फिर से आवाज़ सुनी।
“ऐ आदम की औलाद! तुझपर पाँच वक़्त की नमाज़ फ़र्ज़ की गई थी और हुक्म दिया था कि जब तू इबादत से फ़ारिग़ हो जाए तो ज़मीन पर फैल जा और रिज़्क़ तलाश कर! मगर तूने क्या किया? तूने फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद भी मस्जिद का कोना पकड़ लिया।”
ज़ैद ने काँपती आवाज़ में पूछा,
“तो क्या मैं ग़लत इबादत कर रहा था?”
आवाज़ आई —
“इबादत कभी ग़लत नहीं होती, लेकिन जब वो इंसान को उसकी ज़िम्मेदारियों से ग़ाफ़िल कर दे, तो वो इबादत नहीं, रूहानी ख़ुदग़र्ज़ी बन जाती है।”
ज़ैद बहुत असमंजस में था, उसे तो अभी तक यही बताया गया था कि नमाज़ और रोज़ा ही असल इबादत है।
फिर से आवाज़ आई :
“क्या तुम्हें याद नहीं कि हमने तुम्हें ज़मीन में ख़लीफ़ा बनाया? यानी तुम्हें ज़मीन की ज़िम्मेदारी सौंपी थी — कि इस ज़मीन पर रहते हुए हमारी इबादत भी करो और अपने घरवालों और समाज की देखभाल करो, बेहतर से बेहतर इल्म और हुनर हासिल करो और उससे अपने समाज को फ़ायदा पहुँचाओ, और इस दुनिया को भी उतना ही सँवारो जितना कि इबादत में तुम अपनी रूह को सँवारते हो।”
अब ज़ैद को कुछ समझ में आता जा रहा था। उसके सीने में जो बेचैनी थी वह अब शान्त होती जा रही थी।
फिर से आवाज़ आई :
“ज़ैद! सज्दे में सिर रखना आसान है, मगर सज्दे के बाहर की दुनिया में अमानत और इंसाफ़ के साथ जीना ही असली इबादत है।”
ये कहते ही वो रौशनी जो ज़ैद के क़दमों के नीचे चल रही थी, धीरे-धीरे उसके दिल तक उतर गई — और फिर सब कुछ अँधेरे में समा गया।
अचानक ज़ैद की आँख खुली। उसका सर बीवी की गोद में रखा हुआ था।
वो उठकर बैठ गया। अब उसकी हालत बिलकुल ऐसी थी जैसे किसी ने पानी से बाहर की मछली को पानी में लाकर छोड़ दिया हो। उसे लगा कि जो मशक़्क़त उसने इबादत में की थी अगर इबादत के साथ उतनी ही मेहनत रोज़गार को बेहतर बनाने में की होती तो आज ये हालत न होती। उसकी आँखों से फिर आँसू जारी हो गए। मगर अब वो आँसू शिकायत के नहीं, फ़हम और फ़ैसले के आँसू थे। उसी वक़्त उसने अपने बच्चों को पास बुलाया,
उन्हें सीने से लगाया, और रुख़ बीवी की तरफ़ देखते हुए कहा —
आज मुझे अहसास हो गया कि अल्लाह को सिर्फ़ हमारा सजदा नहीं चाहिये, बल्कि वह देखना यह चाहता है कि हम अपने मामलात में उसको कितना याद रखते हैं, अपने कारोबार में उसकी तरफ़ रुख़ करते हैं या नहीं। मैं बहुत बड़ी ग़लती कर रहा था, मगर अब वो ग़लतियाँ नहीं होंगी। अब इबादत करूँगा जो अल्लाह को मतलूब है। न कि वो इबादत जो हमें समझा दी गई है।
अगले दिन सूरज निकला तो ज़ैद भी निकल पड़ा — पहले मस्जिद गया और नमाज़ के बाद दुकान खोली और अब उसका रोज़ का यही मअमूल बन गया। उसने उसी मेहनत और उसी नियत से काम शुरू किया, मगर अब उसका हर लेन-देन भी एक इबादत था।
वह दुकान के ग्राहकों से मुस्कुरा कर बात करता, हर माल की क़ीमत में ईमानदारी रखता और जब वक़्त होता तो नमाज़ भी उसी सलीक़े से अदा करता।
अब वह जान चुका था कि इबादत वही है, जो इंसान को इंसान बना दे। जो सजदे से उठा कर उसे मख़लूक़ की सेवा में लगा दे।