मुसलमानों की बदतर सूरते-हाल के लिये जो बातें ज़िम्मेदार हैं उनमें से एक ये भी है कि मुस्लिम नौजवानों और उलमा व दानिशवरों के दरम्यान हम-आहंगी पैदा नहीं हो पा रही है। सबसे पहला और बहुत बड़ा मसला तो हमारे उलमा और दानिशवर हज़रात के साथ है और वो ये कि वो अपने इल्मी पिन्दार में गर्दनें अकड़ाए हुए नौजवानों से दूर हैं। वो नौजवानों के ज़ेहनों में उठनेवाले सवालों का जवाब देकर उन्हें मुत्मइन करने के बजाय उनके सवालों को सुनने तक गवारा नहीं करते। अगर सुन लें तो उस ज़बान में जवाब देते हैं जो ज़बान उनको समझ में ही नहीं आती। जवाब देने में दलायल की जो धार और लबो-लहजे में जो लचक नौजवानों को दरकार होती है उलमा उससे यकसर महरूम हैं। अपने इल्म को मौजूदा ज़माने की रफ़्तार से हम-आहंग न करने की वजह से जब कोई नौजवान सवाल करता है तो उसे अपडेटेड जवाब देकर मुत्मइन करने की बजाय उन्हें उलमा की तौहीन करने जैसे इल्ज़ामात लगाकर उन पर दीन से गुमराह हो जाने का फ़तवा सादिर फ़रमा दिया जाता है। जिसका नतीजा या तो ये निकलता है कि वो महज़ जुमा और ईदैन की नमाज़ें पढ़कर और चन्दे की रसीदें कटाकर एक बे-रूह मज़हबियत का बोझ ढोते रहते हैं या फिर वो वाक़ई दीन से दूर होकर किसी दहरियत का शिकार हो जाते हैं।
दूसरा मसला ख़ुद हमारे मुस्लिम नौजवानों के साथ भी है और वो ये कि वो अपने ज़ेहन में उठनेवाले सवालात को सलीक़े से रखने की जुरअत ही नहीं कर पाते। ज़ेहनों में उठनेवाले सवालों को वो अपने सीनों में दबाए फिरते रहते हैं, अगर किसी तरफ़ से पॉज़िटिव जवाब नहीं मिला या किसी फ़तवा का सामना करना पड़ गया तो ख़ुद से आगे बढ़कर क़ुरआन और बुनियादी लिट्रेचर को पढ़ने और अपने सवालों का जवाब तलाश करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं, नतीजा इस अमल का भी उन्हीं दो शक्लों में ज़ाहिर होता है जो ऊपर बयान किया गया। यानी बे-रूह मज़हबियत का बोझ ढोते फिरना या फिर इस्लाम के खि़लाफ़ ‘रद्दे-अमल’ में किसी दहरियत का शिकार हो जाना।
हमारे नज़दीक ये दोनों ही नतायज दीने-इस्लाम और ख़ुद मुसलमानों के लिये किसी तौर पर भी मुनासिब नहीं हैं।
अगर हम इस्लाम की तस्वीर को दुरुस्त करने के लिये मुख़लिस हैं और मुसलमानों की हालत को बहैसियत एक “बेहतरीन उम्मत” दुरुस्त करना चाहते हैं तो नौजवानों और अहले-इल्म के दरम्यान के इस गैप को दूर करना होगा। अगर ये गैप दूर होता नज़र न आए (जैसा कि हम महसूस भी कर रहे हैं कि ये काम बहुत मुश्किल, बल्कि तक़रीबन नामुमकिन सा मालूम होता है) तो फिर इस सिलसिले में मुस्लिम नौजवानों को ख़ुद ही आगे आना होगा।
मुस्लिम नौजवानों को आगे आकर बड़ी-बड़ी कॉन्फ़्रेंसों, सेमिनारों और इज्तिमाआत से ऊपर उठकर; ख़ुद मैदान में उतर कर, ख़ुद से क़ुरआन और सुन्नते-मुतह्हरा का मुताला करके अपने साथी नौजवानों के दरम्यान बैठकर उनके अक़ीदों को दुरुस्त करना होगा और उन्हें एक बेहतरीन क़िस्म का इन्सान बनने की तरफ़ मुतवज्जेह करना होगा। इस मामले में साहिबे-इल्म-व-दानिश से पुरख़ुलूस दरख़ास्त की जाए कि वो इस मामले में साथ दें और अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए आगे आएँ। अगर वो इस कारे-ख़ैर में हाथ बटाने की ज़ेहमत गवारा न करें तो फिर —ऐ मुस्लिम नौजवानो! तुम्हें ख़ुद ही ‘रहमत’ की इस मशाल को लेकर उठना होगा। ‘इल्मो-नूर की रहमत भरी इस मशाल’ के ज़रिए नई नस्ल को जगाने के लिये और उन्हें मुल्को-मिल्लत का बेहतरीन सरमाया बनाने के लिये जो ताक़त और सच्ची रहनुमाई चाहिये, यक़ीन मानिये उसके लिये आपको अल्लाह की किताब, क़ुरआन काफ़ी है।