एक साहब जुमे के ख़ुत्बे में फ़रमा रहे थे, बल्कि दावा कर रहे थे कि
“मुसलमानों की जितनी तादाद जुमे में आती है अगर उतनी तादाद फ़ज्र की नमाज़ में आने लगे तो मुसलमानों को ग़लबा नसीब हो जाएगा।”
इस पर एक साहब ने तब्सिरा करते हुए कहा कि “ये एक सतही क़िस्म की जज़्बाती बात है। हक़ीक़त ये है कि मुसलमानों की जितनी तादाद फ़ज्र की नमाज़ में शरीक होती है अगर उसकी आधी तादाद भी नमाज़ का मक़सद समझ ले और नमाज़ को अदा करने के साथ-साथ उसके तक़ाज़ों को भी पूरा करने की फ़िक्र कर ले तो ख़ुद मुसलमानों के अन्दर वो बड़ी तब्दीली आ जाएगी कि फिर उन्हें उरूज पर पहुँचने से दुनिया की कोई ताक़त रोक नहीं सकती।
इसके बरख़िलाफ़ अगर इसी तरह की बे-मक़सद, बे-जान और रस्मी नमाज़ें पढ़ी जाती रहीं तो जुमे की नमाज़ में शामिल होने वाली भीड़ तो क्या, मुसलमानों की सद-फ़ी-सद तादाद भी नमाज़ में शरीक होने लगे तो सूईं की नोक की बराबर भी तब्दीली आनेवाली नहीं है। और जब तक अन्दर तब्दीली नहीं आएगी तब तक किसी उरूज और तरक़्क़ी का ख़्वाब देखना भी किसी बेवक़ूफ़ी से कम नहीं है।”
इस तब्सिरे को सुनने के बाद मेरा ज़ेहन अल्लामा इक़बाल के उस शेर की तरफ़ चला गया
तेरा इमाम बे-हुज़ूर, तेरी नमाज़ बे-सुरूर
ऐसी नमाज़ से गुज़र, ऐसे इमाम से गुज़र
इस तब्सिरे पर आपका क्या तब्सिरा है?
क्या वाक़ई नमाज़ की ताक़त उसके ज़ाहिर में है या उसके मक़सद और तक़ाज़ों को पूरा करने में है?
क्या वाक़ई मक़सद और तक़ाज़ों से बेगाना नमाज़ें हमारी इनफ़िरादी और इज्तिमाई ज़िन्दगी में कुछ भी तब्दीली ला पाएगी?