अगर हम ये मानते हैं कि समाज से अख़लाक़ का दिवालिया निकल गया है,
अगर हम ये मानते हैं कि मुल्क ज़ुल्म, जब्र व इस्तिब्दाद (अत्याचार और अनाचार) की राह पर गामज़न (चल निकला) है,
अगर हम ये मानते हैं कि इंसानों की शख़्सी आज़ादी को ख़तरा लाहिक़ हो गया है,
अगर हम ये मानते हैं कि इंसानों के दरमियान फ़र्क़ व तफ़ावुत (भेदभाव) की खाई बढ़ती जा रही है और कमज़ोरों पर ज़ुल्म बढ़ता जा रहा है,
अगर हम ये मानते हैं कि ज़ालिम के हौसले बढ़ते जा रहे हैं और मज़लूम की दादरसी नहीं हो रही है (यानी एक बेक़सूर को सैंकड़ों की भीड़ के सामने पीट पीट कर हलाक कर दिया जाता है लेकिन कोई ज़बान तक नहीं खोलता है) …..
तो ये भी लाज़िमन मानना होगा कि इसके लिये हमें एक नई नस्ल तैयार करने की ज़रूरत है,
एक ऐसी नस्ल जो आज़ाद फ़िज़ा में साँस लेना जानती हो,
एक ऐसी नस्ल जो दिन-रात के किसी भी हिस्से में किसी भी क़िस्म की क़ुर्बानी के लिए तैयार हो,
जो हक़ को हक़ और बातिल को बातिल कहने का हौसला रखती हो,
एक ऐसी नस्ल जो अख़लाक़ का पैकर और दूसरों के लिए जीने की तमन्ना अपने दिल में रखती हो।
हमारे नज़दीक वो नस्ल वही हो सकती है जो क़ुरआन के क़ालिब (साँचे) में ढली हुई यानी इस्लाम की चलती-फिरती तस्वीर हो.
मिल्लत के बिगड़े हुए हालात को सुधार से बदलने के लिए;
इस उम्मत की डूबती हुई नाव को भँवर से निकालने के लिए;
समाज में पसरे हुए डर और ख़ौफ़ को अम्न व सलामती में तब्दील करने के लिए ऐसी नस्ल का नुज़ूल आसमान से फ़ौक़ुल फ़ितरी (परा प्राकृतिक) तौर पर होने वाला नहीं है और न ये ही मुमकिन है कि किसी और दुनिया में ऐसी कोई नस्ल तैयार करके यहाँ इम्पोर्ट कर दी जाए. बल्कि इसी ज़मीन पर और इन्हीं मुश्किल हालात में एक ऐसी नस्ल तैयार करनी होगी जो पूरे अज़्म और इस्तिक़लाल के साथ लोगों को मायूसी के घटाटोप अँधेरों से निकालकर उनके दिलों में उम्मीद का चिराग़ जलाए, इंसानियत के लिए ईसार व क़ुर्बानी और दीन की ख़ातिर जाँनिसारी व फ़िद्वियत में सबके लिए नमूना हो.
हमें अफ़सोस है कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़ वावेला तो ख़ूब है, ज़ालिम के ख़िलाफ़ नफ़रतों के बीज तो ख़ूब बोए जा रहे हैं, ज़ुल्म के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी और एहतिजाज तो ख़ूब है (और एक हद तक शायद इसकी ज़रूरत भी हो) लेकिन ज़ुल्म के ख़िलाफ़ अख़लाक़ के पैकर में ढली हुई कोई नस्ल तैयार करने का जॉगुसल और सब्र आज़मा काम करने का हौसला कोई नहीं कर रहा है।
इस तरह की नस्ल की तामीरे-नौ का नुक़्ताए-आग़ाज़ यह है कि नौजवानों के दिलों में गहरा ईमानी शुऊर बेदार कर दिया जाए. उनके अख़लाक़ और किरदार को क़ुरआन के साँचे में ढाल दिया जाए, ताकि उनके अन्दर इंक़िलाब की राह में हायल पहाड़ों और चट्टानों का सीना चीरने और मुश्किलात का ख़न्दापेशानी से मुक़ाबला करने का सलीक़ा पैदा हो जाए.
यक़ीन जानिये ये काम जज़्बात में आकर महज़ नारे बाज़ी करने और ज़ालिम को कोसते रहने से हरगिज़ होनेवाला नहीं है। ये तरीक़ा हमेशा से उन लोगों की पहचान रहा है जो ख़ुदा और उसके अहकामात की सिरे से ज़रूरत ही महसूस नहीं करते बल्कि ख़ुदा को (नाउज़ुबिल्लाह) फ़साद की जड़ समझते रहे हैं और सारे मसाएल अपने ज़ोरे-बाज़ू से करने पर ईमान रखते हैं। उनका तरीक़ा ज़ालिम से नफ़रत करके उसे ज़ुल्म से रोकना है, जबकि इस्लाम का तरीक़ा ये है कि ज़ालिम भी मुहब्बत और हमदर्दी का उतना ही हक़दार है जितना कि मज़लूम (कि उसे ज़ुल्म करने से रोक दिया जाए)। (हदीस)
तो आइए दोस्तो, नफ़रत के इस माहौल में इस्लामी उख़ूवत व मुहब्बत के नग़मे गाएँ। ज़ालिमों को ज़ुल्म से बाज़ रखने के लिए अल्लाह से दुआ करें, ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द ज़रूर करें लेकिन ज़ालिमों के क़रीब जाकर उनके दिल को नर्माने का अपने अन्दर हौसला भी पैदा करें। यानी नफ़रत को मुहब्बत के हथियार से दफ़ा करने की पुरज़ोर कोशिश करें और क़ुरआन के इस नुस्ख़े को एक बार ज़रूर आज़मा कर देखें कि-
“नेकी और बदी बराबर नहीं हैं, तुम बदी को उस नेकी से दफ़ा करो जो बेहतरीन हो। तुम देखोगे कि तुम्हारे साथ जिसकी अदावत (दुश्मनी) पड़ी हुई थी वो जिगरी दोस्त बन गया है। ये सिफ़त नसीब नहीं होती मगर सिर्फ़ उन लोगों को जो सब्र करते हैं, और ये मक़ाम हासिल नहीं होता मगर उन लोगों को जो बड़े नसीबे वाले हैं। और अगर (इस काम को करते हुए यानी बुराई का बदला बेहतरीन भलाई से देने और दुश्मन के साथ दुश्मनी के बजाए मुहब्बत का रवैया अपनाते हुए) शैतान की तरफ़ से कोई उकसाहट महसूस करो तो अल्लाह की पनाह माँग लो।” (क्योंकि शैतान कभी नहीं चाहता कि मआशरे के अन्दर अम्न क़ायम हो यानी इस्लाम का बोलबाला हो)
(41:34-36)
Md Shuaib