इन्सान आज भी है ग़ुलामी के सर-निगूँ
ये और बात है कि हल्क़े बदल गए।।
इन्सानों से कटकर स्पेस में रहने का नाम आज़ादी नहीं है,
आज़ादी नाम है इन्सानों को अपने दरम्यान स्पेस देने का।
अपनी मर्ज़ी से कहीं भी, कुछ भी करते चले जाने का नाम आज़ादी नहीं है,
आज़ादी नाम है दूसरों की मर्ज़ी और उनके जज़्बात के एहतिराम करने का।
दूसरों की सत्ता से नजात हासिल करके अपनी सत्ता क़ायम करने का नाम आज़ादी नहीं है
आज़ादी नाम है इन्सानों की ग़ुलामी से नजात हासिल करके अद्ल व इन्साफ़ पर मबनी निज़ाम क़ायम करने का।
अपनी ख़ुद की खींची हुई लकीरों में महबूस होकर, अकड़ी हुई गर्दनों के साथ जश्न मनाने का नाम आज़ादी नहीं है,
आज़ादी नाम है तबक़ाती कशमकश, इलाक़ाई तास्सुब और मज़हबी मनाफ़रत की दीवारों को तोड़कर फ़िक्रो-नज़र की दुरुस्तगी के साथ आजिज़ाना ज़िन्दगी गुज़ारने का।
आज़ादिये-अफ़कार है उनकी तबाही।
रखते नहीं जो फ़िक्रो-तदब्बुर का सलीक़ा।।
हो फ़िक्र अगर ख़ाम तो आज़ादिये-अफ़कार
इन्सान को हैवान बनाने का तरीक़ा।।