क्या गुरु भगवान होता है?

क्या गुरु भगवान होता है?

भारतीय धर्म ग्रन्थों में गुरु की बड़ी महिमा बयान की गई है। हमें बताया जाता है कि गुरु ही भगवान है, बल्कि गुरु का मर्तबा और उसकी श्रेणी भगवान से भी बढ़कर है।

अगर हम संस्कृति की बात करें तो हमें कोई अधिकार नहीं पहुँचता कि हम किसी की संस्कृति पर कोई टीका-टिप्पणी करें। यदि गुरु को भगवान मानना किसी की संस्कृति का भाग है तो उसका सम्मान अपनी जगह परन्तु इस बात पर विचार अवश्य ही किया जाना चाहिये कि तार्किक एवं साहित्यिक दृष्टि से क्या वास्तव में ऐसा है? आइये इस पर विचार करते हैं।

हमें बताया जाता है कि

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

अर्थात गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही महेश्वर हैं। गुरु ही परमब्रह्मा है। इस साक्षात परम ब्रह्म को नमन है (हम उसी को शीश नवाते हैं) अर्थ यह कि गुरु ही सर्वश्रेष्ठ हैं। जिन्होंने हमें इन सब के बारे में बताया। गुरु की महिमा अनंत है।

यदि हम गुरु शब्द के अर्थ को समझें तो हमें मालूम होगा कि गुरु उस हस्ती को कहते हैं जो अन्धकार को दूर कर देता है।

अब मनुष्य के जीवन से अन्धकार को कोई और दूर नहीं कर सकता सिवाय उसके कि जिसने अन्धकार और प्रकाश को जन्म दिया है, अर्थात ईश्वर।

अब यदि यहाँ पर गुरु से तात्पर्य ईश्वर है तो कहा जाएगा कि वह गुरु एक ही है चाहे तुम उसे ब्रह्मा कहो चाहे विष्णु और चाहे महेश। उस गुरु को अलग-अलग नामों से भले तुम पुकार लो परन्तु वह है एक ही। इस बात की पुष्टि इस बात से भी होती है कि

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: सुपर्णोगुरूत्मान्।

एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:। ऋग्वेद 1/164/46

चाहे तुम उसे बहुत-से नामों से पुकारो परन्तु वह एक ही है।

ईश्वर ही को ‘गुरु’ कहा गया है यह बात इससे भी सिद्ध होती है कि:

सात समुद्र की मसि करूं लेखन सब बन राय। पृथ्वी को कागज करूं गुरु गुण लिखा न जाए।

यहाँ जिस गुरु के गुणों को लिखे जाने की बात हो रही है वह कोई और नहीं हम सबका ईश विधाता अल्लाह ही है। क़ुरआन में है कि

“ऐ नबी! कहो कि अगर समन्दर मेरे रब की बातें लिखने के लिये रौशनाई बन जाए तो वह ख़त्म हो जाए, मगर मेरे रब की बातें ख़त्म न हों, बल्कि अगर उतनी ही रौशनाई हम और ले आएँ तो वे भी काफ़ी न हो।“ (18: 109)

कहा गया है कि

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

अर्थात उस महान गुरु को अभिवादन, जो पूरे ब्रम्हांड में व्याप्त है, सभी जीवित और मृत्य (मृत) में| यहाँ उस ईश्वर को नमन करने की बात कही गई है जिसके बारे में कहा गया कि

शरीरं चैव वाचं च बुद्धिन्द्रिय मनांसि च ।

नियम्य प्राञ्जलिः तिष्ठेत् वीक्षमाणो गुरोर्मुखम् ॥

उस गुरु अर्थात ईश्वर के सामने शरीर (body), वाणी (voice), बुद्धि (wisdom), इंद्रिय (sense) और मन (Mind) को संयम में रखकर, झुकना चाहिये हाथ जोड़कर नमन करना चाहिये।

एक और जगह कहा गया है कि वह ईश्वर वह है

अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥

जिसने ज्ञानरूपी प्रकाश से, अज्ञानरुप अंधकार से अंधे हुए लोगों की आँखें खोली, अतः उस गुरु को नमस्कार।

गुरु का एक दूसरा अर्थ होता है कि जो मनुष्य को सत्य का रास्ता बताकर उसे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले आए। निश्चय ही यह काम ईश्दूतों और पैग़म्बरों का है। इस सम्बन्ध में शास्त्रों में जो कुछ कहा गया है उसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि

धर्मज्ञो धर्मकर्ता च सदा धर्मपरायणः।

तत्त्वेभ्यः सर्वशास्त्रार्थादेशको गुरुरुच्यते॥

अर्थात धर्म को जानने वाले, धर्म के अनुसार आचरण करने वाले, धर्मपरायण, और (ईश्वर द्वारा अवतरित) शास्त्रों के अनुसार आदेश करने वाले गुरु कहे जाते हैं।

एक और जगह कहा गया कि

प्रेरकः सूचकश्वैव वाचको दर्शकस्तथा।

शिक्षको बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः॥

अर्थात प्रेरणा देने वाले, सूचना देने वाले, सत्य बताने वाले, मार्गदर्शन करने वाले, शिक्षा देनेवाले, और बोध कराने वाले –ये सब गुरु हैं।

एक और जगह कहा गया कि

निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते।

गुणाति तत्त्वं हितमिच्छुरंगिनाम् शिवार्थिनां यः स गुरु र्निगद्यते॥

अर्थात जो दूसरों को गलत रास्ते पर जाने से रोकते हैं, स्वयं निष्पाप रास्ते पर चलते हैं, और हमेशा हित और कल्याण की कामना करते हैं, उन्हें गुरु कहते हैं।

अब चूँकि शिक्षक और अध्यापकगण भी नस्लों को ज्ञान का प्रकाश पहुँचाने का काम करते हैं इसलिये उन्हें भी प्रतीक रूप से गुरु ही कह देते हैं। हालाँकि गुरु या तो स्वयं ईश्वर है या ईश्वर ने जिनको अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा है वो गुरु हैं। प्रोफ़ेट मुहम्मद (सल्ल०) ने भी कहा था कि मुझे आसानी पैदा करने वाला मुअल्लिम अर्थात गुरु बनाकर भेजा गया है। (मुस्लिम : 3249)

विडम्बना यह है कि हम हर साल शिक्षक दिवस पर गुरु की महिमा इस प्रकार बयान की जाती है कि शिक्षक और गुरु में अन्तर ही नहीं कर पाते। हमारे शिक्षकगण यह अन्तर करना ही नहीं सिखाते कि शिक्षक गुरु नहीं होता अर्थात न तो शिक्षक ख़ुदा होता है और न ही ख़ुदा का प्रतिनिधि। बल्कि शिक्षक तो वह होता है जो हमें पैसे के बदले शिक्षा देता है। जो हमें शब्दों का उच्चारण सिखा देता है, कुछ फ़ॉर्मूला सीखा देता है और अन्त में जाकर अनुसन्धान के कुछ तरीक़े सीखा देता है।

कबीर दास जी के एक दोहे की हमारे शिक्षक बहुत ही ग़लत व्याख्या करते हैं।

गुरु गोविन्द दोउ खड़े का के लागो पायँ।

बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।

इस दोहे को पढ़कर गुरु अर्थात शिक्षक के मर्तबे को गोविन्द से भी ऊँचा उठा देते हैं। हालांकि कबीर दास के इस दोहे का मतलब वह नहीं है। कबीर दास जी कहना यह चाहते हैं कि जब शिष्य असमंजस में पड़ गया कि किसके सामने झुकूँ? गुरु के सामने अथवा गोविन्द के सामने। तो गुरु ने शिष्य को इशारा कर दिया कि असमंजस में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। मेरा ये स्थान नहीं है कि मुझे नमन किया जाए, या मेरे सामने झुका जाए। बल्कि यह स्थान तो केवल गोविन्द का ही है। तब शिष्य को तसल्ली हुई और गुरु से कहा कि ‘बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय अर्थात गुरु जी आपका बहुत धन्यवाद कि आपने मुझे बता दिया कि झुकना केवल गोविन्द के सामने ही है।‘

एक ग़लती हम यह भी कर रहे हैं कि कुछ सन्तों को गुरु की उपाधि दे देते हैं, जबकि सन्त आप उसे कह सकते हैं जो गुरु की शिक्षा के अनुसार दूसरे लोगों की तुलना में कुछ अधिक जीवन व्यतीत करता हो।

नोट : संस्कृत सभी श्लोक और उनके अर्थ इंटरनेट से लिये गए हैं।

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भारतीय धर्म ग्रन्थों में गुरु की बड़ी महिमा बयान की गई है। हमें बताया जाता है कि गुरु ही भगवान है, बल्कि गुरु का मर्तबा और उसकी श्रेणी भगवान से भी बढ़कर है।

अगर हम संस्कृति की बात करें तो हमें कोई अधिकार नहीं पहुँचता कि हम किसी की संस्कृति पर कोई टीका-टिप्पणी करें। यदि गुरु को भगवान मानना किसी की संस्कृति का भाग है तो उसका सम्मान अपनी जगह परन्तु इस बात पर विचार अवश्य ही किया जाना चाहिये कि तार्किक एवं साहित्यिक दृष्टि से क्या वास्तव में ऐसा है? आइये इस पर विचार करते हैं।

हमें बताया जाता है कि

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

अर्थात गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही महेश्वर हैं। गुरु ही परमब्रह्मा है। इस साक्षात परम ब्रह्म को नमन है (हम उसी को शीश नवाते हैं) अर्थ यह कि गुरु ही सर्वश्रेष्ठ हैं। जिन्होंने हमें इन सब के बारे में बताया। गुरु की महिमा अनंत है।

यदि हम गुरु शब्द के अर्थ को समझें तो हमें मालूम होगा कि गुरु उस हस्ती को कहते हैं जो अन्धकार को दूर कर देता है।

अब मनुष्य के जीवन से अन्धकार को कोई और दूर नहीं कर सकता सिवाय उसके कि जिसने अन्धकार और प्रकाश को जन्म दिया है, अर्थात ईश्वर।

अब यदि यहाँ पर गुरु से तात्पर्य ईश्वर है तो कहा जाएगा कि वह गुरु एक ही है चाहे तुम उसे ब्रह्मा कहो चाहे विष्णु और चाहे महेश। उस गुरु को अलग-अलग नामों से भले तुम पुकार लो परन्तु वह है एक ही। इस बात की पुष्टि इस बात से भी होती है कि

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: सुपर्णोगुरूत्मान्।

एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:। ऋग्वेद 1/164/46

चाहे तुम उसे बहुत-से नामों से पुकारो परन्तु वह एक ही है।

ईश्वर ही को ‘गुरु’ कहा गया है यह बात इससे भी सिद्ध होती है कि:

सात समुद्र की मसि करूं लेखन सब बन राय। पृथ्वी को कागज करूं गुरु गुण लिखा न जाए।

यहाँ जिस गुरु के गुणों को लिखे जाने की बात हो रही है वह कोई और नहीं हम सबका ईश विधाता अल्लाह ही है। क़ुरआन में है कि

“ऐ नबी! कहो कि अगर समन्दर मेरे रब की बातें लिखने के लिये रौशनाई बन जाए तो वह ख़त्म हो जाए, मगर मेरे रब की बातें ख़त्म न हों, बल्कि अगर उतनी ही रौशनाई हम और ले आएँ तो वे भी काफ़ी न हो।“ (18: 109)

कहा गया है कि

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

अर्थात उस महान गुरु को अभिवादन, जो पूरे ब्रम्हांड में व्याप्त है, सभी जीवित और मृत्य (मृत) में| यहाँ उस ईश्वर को नमन करने की बात कही गई है जिसके बारे में कहा गया कि

शरीरं चैव वाचं च बुद्धिन्द्रिय मनांसि च ।

नियम्य प्राञ्जलिः तिष्ठेत् वीक्षमाणो गुरोर्मुखम् ॥

उस गुरु अर्थात ईश्वर के सामने शरीर (body), वाणी (voice), बुद्धि (wisdom), इंद्रिय (sense) और मन (Mind) को संयम में रखकर, झुकना चाहिये हाथ जोड़कर नमन करना चाहिये।

एक और जगह कहा गया है कि वह ईश्वर वह है

अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥

जिसने ज्ञानरूपी प्रकाश से, अज्ञानरुप अंधकार से अंधे हुए लोगों की आँखें खोली, अतः उस गुरु को नमस्कार।

गुरु का एक दूसरा अर्थ होता है कि जो मनुष्य को सत्य का रास्ता बताकर उसे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले आए। निश्चय ही यह काम ईश्दूतों और पैग़म्बरों का है। इस सम्बन्ध में शास्त्रों में जो कुछ कहा गया है उसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि

धर्मज्ञो धर्मकर्ता च सदा धर्मपरायणः।

तत्त्वेभ्यः सर्वशास्त्रार्थादेशको गुरुरुच्यते॥

अर्थात धर्म को जानने वाले, धर्म के अनुसार आचरण करने वाले, धर्मपरायण, और (ईश्वर द्वारा अवतरित) शास्त्रों के अनुसार आदेश करने वाले गुरु कहे जाते हैं।

एक और जगह कहा गया कि

प्रेरकः सूचकश्वैव वाचको दर्शकस्तथा।

शिक्षको बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः॥

अर्थात प्रेरणा देने वाले, सूचना देने वाले, सत्य बताने वाले, मार्गदर्शन करने वाले, शिक्षा देनेवाले, और बोध कराने वाले –ये सब गुरु हैं।

एक और जगह कहा गया कि

निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते।

गुणाति तत्त्वं हितमिच्छुरंगिनाम् शिवार्थिनां यः स गुरु र्निगद्यते॥

अर्थात जो दूसरों को गलत रास्ते पर जाने से रोकते हैं, स्वयं निष्पाप रास्ते पर चलते हैं, और हमेशा हित और कल्याण की कामना करते हैं, उन्हें गुरु कहते हैं।

अब चूँकि शिक्षक और अध्यापकगण भी नस्लों को ज्ञान का प्रकाश पहुँचाने का काम करते हैं इसलिये उन्हें भी प्रतीक रूप से गुरु ही कह देते हैं। हालाँकि गुरु या तो स्वयं ईश्वर है या ईश्वर ने जिनको अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा है वो गुरु हैं। प्रोफ़ेट मुहम्मद (सल्ल०) ने भी कहा था कि मुझे आसानी पैदा करने वाला मुअल्लिम अर्थात गुरु बनाकर भेजा गया है। (मुस्लिम : 3249)

विडम्बना यह है कि हम हर साल शिक्षक दिवस पर गुरु की महिमा इस प्रकार बयान की जाती है कि शिक्षक और गुरु में अन्तर ही नहीं कर पाते। हमारे शिक्षकगण यह अन्तर करना ही नहीं सिखाते कि शिक्षक गुरु नहीं होता अर्थात न तो शिक्षक ख़ुदा होता है और न ही ख़ुदा का प्रतिनिधि। बल्कि शिक्षक तो वह होता है जो हमें पैसे के बदले शिक्षा देता है। जो हमें शब्दों का उच्चारण सिखा देता है, कुछ फ़ॉर्मूला सीखा देता है और अन्त में जाकर अनुसन्धान के कुछ तरीक़े सीखा देता है।

कबीर दास जी के एक दोहे की हमारे शिक्षक बहुत ही ग़लत व्याख्या करते हैं।

गुरु गोविन्द दोउ खड़े का के लागो पायँ।

बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।

इस दोहे को पढ़कर गुरु अर्थात शिक्षक के मर्तबे को गोविन्द से भी ऊँचा उठा देते हैं। हालांकि कबीर दास के इस दोहे का मतलब वह नहीं है। कबीर दास जी कहना यह चाहते हैं कि जब शिष्य असमंजस में पड़ गया कि किसके सामने झुकूँ? गुरु के सामने अथवा गोविन्द के सामने। तो गुरु ने शिष्य को इशारा कर दिया कि असमंजस में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। मेरा ये स्थान नहीं है कि मुझे नमन किया जाए, या मेरे सामने झुका जाए। बल्कि यह स्थान तो केवल गोविन्द का ही है। तब शिष्य को तसल्ली हुई और गुरु से कहा कि ‘बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय अर्थात गुरु जी आपका बहुत धन्यवाद कि आपने मुझे बता दिया कि झुकना केवल गोविन्द के सामने ही है।‘

एक ग़लती हम यह भी कर रहे हैं कि कुछ सन्तों को गुरु की उपाधि दे देते हैं, जबकि सन्त आप उसे कह सकते हैं जो गुरु की शिक्षा के अनुसार दूसरे लोगों की तुलना में कुछ अधिक जीवन व्यतीत करता हो।

नोट : संस्कृत सभी श्लोक और उनके अर्थ इंटरनेट से लिये गए हैं।

भारतीय धर्म ग्रन्थों में गुरु की बड़ी महिमा बयान की गई है। हमें बताया जाता है कि गुरु ही भगवान है, बल्कि गुरु का मर्तबा और उसकी श्रेणी भगवान से भी बढ़कर है।

अगर हम संस्कृति की बात करें तो हमें कोई अधिकार नहीं पहुँचता कि हम किसी की संस्कृति पर कोई टीका-टिप्पणी करें। यदि गुरु को भगवान मानना किसी की संस्कृति का भाग है तो उसका सम्मान अपनी जगह परन्तु इस बात पर विचार अवश्य ही किया जाना चाहिये कि तार्किक एवं साहित्यिक दृष्टि से क्या वास्तव में ऐसा है? आइये इस पर विचार करते हैं।

हमें बताया जाता है कि

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

अर्थात गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही महेश्वर हैं। गुरु ही परमब्रह्मा है। इस साक्षात परम ब्रह्म को नमन है (हम उसी को शीश नवाते हैं) अर्थ यह कि गुरु ही सर्वश्रेष्ठ हैं। जिन्होंने हमें इन सब के बारे में बताया। गुरु की महिमा अनंत है।

यदि हम गुरु शब्द के अर्थ को समझें तो हमें मालूम होगा कि गुरु उस हस्ती को कहते हैं जो अन्धकार को दूर कर देता है।

अब मनुष्य के जीवन से अन्धकार को कोई और दूर नहीं कर सकता सिवाय उसके कि जिसने अन्धकार और प्रकाश को जन्म दिया है, अर्थात ईश्वर।

अब यदि यहाँ पर गुरु से तात्पर्य ईश्वर है तो कहा जाएगा कि वह गुरु एक ही है चाहे तुम उसे ब्रह्मा कहो चाहे विष्णु और चाहे महेश। उस गुरु को अलग-अलग नामों से भले तुम पुकार लो परन्तु वह है एक ही। इस बात की पुष्टि इस बात से भी होती है कि

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: सुपर्णोगुरूत्मान्।

एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:। ऋग्वेद 1/164/46

चाहे तुम उसे बहुत-से नामों से पुकारो परन्तु वह एक ही है।

ईश्वर ही को ‘गुरु’ कहा गया है यह बात इससे भी सिद्ध होती है कि:

सात समुद्र की मसि करूं लेखन सब बन राय। पृथ्वी को कागज करूं गुरु गुण लिखा न जाए।

यहाँ जिस गुरु के गुणों को लिखे जाने की बात हो रही है वह कोई और नहीं हम सबका ईश विधाता अल्लाह ही है। क़ुरआन में है कि

“ऐ नबी! कहो कि अगर समन्दर मेरे रब की बातें लिखने के लिये रौशनाई बन जाए तो वह ख़त्म हो जाए, मगर मेरे रब की बातें ख़त्म न हों, बल्कि अगर उतनी ही रौशनाई हम और ले आएँ तो वे भी काफ़ी न हो।“ (18: 109)

कहा गया है कि

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

अर्थात उस महान गुरु को अभिवादन, जो पूरे ब्रम्हांड में व्याप्त है, सभी जीवित और मृत्य (मृत) में| यहाँ उस ईश्वर को नमन करने की बात कही गई है जिसके बारे में कहा गया कि

शरीरं चैव वाचं च बुद्धिन्द्रिय मनांसि च ।

नियम्य प्राञ्जलिः तिष्ठेत् वीक्षमाणो गुरोर्मुखम् ॥

उस गुरु अर्थात ईश्वर के सामने शरीर (body), वाणी (voice), बुद्धि (wisdom), इंद्रिय (sense) और मन (Mind) को संयम में रखकर, झुकना चाहिये हाथ जोड़कर नमन करना चाहिये।

एक और जगह कहा गया है कि वह ईश्वर वह है

अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥

जिसने ज्ञानरूपी प्रकाश से, अज्ञानरुप अंधकार से अंधे हुए लोगों की आँखें खोली, अतः उस गुरु को नमस्कार।

गुरु का एक दूसरा अर्थ होता है कि जो मनुष्य को सत्य का रास्ता बताकर उसे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले आए। निश्चय ही यह काम ईश्दूतों और पैग़म्बरों का है। इस सम्बन्ध में शास्त्रों में जो कुछ कहा गया है उसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि

धर्मज्ञो धर्मकर्ता च सदा धर्मपरायणः।

तत्त्वेभ्यः सर्वशास्त्रार्थादेशको गुरुरुच्यते॥

अर्थात धर्म को जानने वाले, धर्म के अनुसार आचरण करने वाले, धर्मपरायण, और (ईश्वर द्वारा अवतरित) शास्त्रों के अनुसार आदेश करने वाले गुरु कहे जाते हैं।

एक और जगह कहा गया कि

प्रेरकः सूचकश्वैव वाचको दर्शकस्तथा।

शिक्षको बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः॥

अर्थात प्रेरणा देने वाले, सूचना देने वाले, सत्य बताने वाले, मार्गदर्शन करने वाले, शिक्षा देनेवाले, और बोध कराने वाले –ये सब गुरु हैं।

एक और जगह कहा गया कि

निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते।

गुणाति तत्त्वं हितमिच्छुरंगिनाम् शिवार्थिनां यः स गुरु र्निगद्यते॥

अर्थात जो दूसरों को गलत रास्ते पर जाने से रोकते हैं, स्वयं निष्पाप रास्ते पर चलते हैं, और हमेशा हित और कल्याण की कामना करते हैं, उन्हें गुरु कहते हैं।

अब चूँकि शिक्षक और अध्यापकगण भी नस्लों को ज्ञान का प्रकाश पहुँचाने का काम करते हैं इसलिये उन्हें भी प्रतीक रूप से गुरु ही कह देते हैं। हालाँकि गुरु या तो स्वयं ईश्वर है या ईश्वर ने जिनको अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा है वो गुरु हैं। प्रोफ़ेट मुहम्मद (सल्ल०) ने भी कहा था कि मुझे आसानी पैदा करने वाला मुअल्लिम अर्थात गुरु बनाकर भेजा गया है। (मुस्लिम : 3249)

विडम्बना यह है कि हम हर साल शिक्षक दिवस पर गुरु की महिमा इस प्रकार बयान की जाती है कि शिक्षक और गुरु में अन्तर ही नहीं कर पाते। हमारे शिक्षकगण यह अन्तर करना ही नहीं सिखाते कि शिक्षक गुरु नहीं होता अर्थात न तो शिक्षक ख़ुदा होता है और न ही ख़ुदा का प्रतिनिधि। बल्कि शिक्षक तो वह होता है जो हमें पैसे के बदले शिक्षा देता है। जो हमें शब्दों का उच्चारण सिखा देता है, कुछ फ़ॉर्मूला सीखा देता है और अन्त में जाकर अनुसन्धान के कुछ तरीक़े सीखा देता है।

कबीर दास जी के एक दोहे की हमारे शिक्षक बहुत ही ग़लत व्याख्या करते हैं।

गुरु गोविन्द दोउ खड़े का के लागो पायँ।

बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।

इस दोहे को पढ़कर गुरु अर्थात शिक्षक के मर्तबे को गोविन्द से भी ऊँचा उठा देते हैं। हालांकि कबीर दास के इस दोहे का मतलब वह नहीं है। कबीर दास जी कहना यह चाहते हैं कि जब शिष्य असमंजस में पड़ गया कि किसके सामने झुकूँ? गुरु के सामने अथवा गोविन्द के सामने। तो गुरु ने शिष्य को इशारा कर दिया कि असमंजस में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। मेरा ये स्थान नहीं है कि मुझे नमन किया जाए, या मेरे सामने झुका जाए। बल्कि यह स्थान तो केवल गोविन्द का ही है। तब शिष्य को तसल्ली हुई और गुरु से कहा कि ‘बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय अर्थात गुरु जी आपका बहुत धन्यवाद कि आपने मुझे बता दिया कि झुकना केवल गोविन्द के सामने ही है।‘

एक ग़लती हम यह भी कर रहे हैं कि कुछ सन्तों को गुरु की उपाधि दे देते हैं, जबकि सन्त आप उसे कह सकते हैं जो गुरु की शिक्षा के अनुसार दूसरे लोगों की तुलना में कुछ अधिक जीवन व्यतीत करता हो।

नोट : संस्कृत सभी श्लोक और उनके अर्थ इंटरनेट से लिये गए हैं।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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