सोच बदलेंगे तो
अक़ीदा बदलेगा।
अक़ीदा बदलेगा तो
मिज़ाज बदलेगा।
किरदार बदलेगा।
किरदार बदलेगा तो
समाज में वो इन्क़िलाब बरपा होगा जिसकी जड़ें इन्तिहाई मज़बूत और जिसके असरात बहुत दूर-रस होंगे।
इसलिए अगर समाज में कोई मुसबत तब्दीली लानी है तो सोच को बदलें यानी ख़ुद भी समझें और लोगों को भी बताएँ कि ये कायनात बे ख़ुदा नहीं है और जिस ख़ुदा ने इस इन्सान को बनाया है वो उससे एक रोज़ ज़िन्दगी का हिसाब भी लेने वाला है।
इस तरह हम ख़ुद अपने और फिर बाक़ी लोगों के दिलों में एक ख़ुदा की वहदानियत का नक़्श बिठाएँ। और ये मिज़ाज पैदा करें कि एक अल्लाह की बन्दगी और रसूल की पैरवी में ही दुनिया की ज़िन्दगी की ख़ुशगवारी और आख़िरत की ज़िन्दगी की असल कामयाबी है।
हमारी कोशिशों का मरकज़ और महवर ये हो कि सबसे पहले हमारे अन्दर और फिर तमाम इन्सानों के दिलों में हर अमल के लिये ख़ुदा के सामने जवाबदेही का ऐसा पुख़्ता यक़ीन पैदा हो जाए कि हम सब अख़लाक़ व किरदार को पाकीज़ा बनाने की अज़ीम व अंबियाई जिद्दोजुहुद के लिये खड़े हो जाएँ।
ये सतही और वक़्ती क़िस्म के नारे लगाकर क़ौमी मफ़ाद की ख़ातिर हर इशू पर दौड़ पड़ना और हर जगह भिड़ जाने की फ़िराक़ में रहना कोई बहादुरी का काम नहीं है और न ही इससे कुछ हासिल होने वाला है।