क़ुरआन-मजीद और इंजीले-मुक़द्दस की कॉमन तालीमात का ख़ुलासा
(आओ ऐसी बात पर मुत्तफ़िक़ हो जाएँ जो हमारे और तुम्हारे दरम्यान कॉमन हैं)
अल्लाह ने इंसान को पैदा किया और उसे अक़्ल व शुऊर से नवाज़ा। इंसान को बहुत-से मामलों में आज़ादी और इख़्तियार अता किया ताकि अल्लाह ये देख सके कि अपनी मर्ज़ी और आज़ादी के बावजूद इंसान उसकी बन्दगी को क़बूल करता है या नहीं। यह अल्लाह की इंसान पर अज़ीम मेहरबानी है कि उसने सिर्फ़ इख़्तियार की आज़ादी देकर इंसान को छोड़ नहीं दिया, बल्कि उसकी रहनुमाई के लिये नबी और रसूल भी भेजे। इन नबियों का मक़सद इंसान तक अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाना और अपनी ज़िन्दगी के ज़रिये उस पर अमल करके दिखाना था।
यह सिलसिला जिसे नुबूवत और रिसालत कहा जाता है, इंसानियत के लिये रहनुमाई और रहमत का ज़रिआ रहा है। तमाम आसमानी मज़ाहिब इस बात पर यक़ीन रखते हैं कि अल्लाह ने इंसान को सीधा रास्ता दिखाने के लिये नबी भेजे। यहूदी, ईसाई और मुसलमान इन नबियों के पैग़ाम को मानने वालों में शामिल हैं। मगर फ़र्क यह है कि यहूदियों का सिलसिला-ए-नुबूवत हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर, ईसाइयों का हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर और मुसलमानों का हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर खत्म होता है। इन तमाम अंबिया की ख़ास बात ये थी कि ये अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं कहते और करते थे, वही कहते थे जो उन पर वह्य किया जाता था और उसी के मुताबिक़ अमल करते थे जो उनके ऊपर नाज़िल किया जाता था। इंजील में है कि:
“मैं ख़ुद से कुछ नहीं कर सकता। मैं जैसा सुनता हूँ, वैसा फ़ैसला करता हूँ, और मेरा फ़ैसला इंसाफ़ पर मबनी है, क्योंकि मैं अपनी मर्ज़ी नहीं बल्कि अपने भेजने वाले की मर्ज़ी पूरी करता हूँ।” (योहन्ना 5:30)
क़ुरआन मजीद में भी मुहम्मद (सल्ल०) के हवाले से कहा गया है कि ये नबी अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं कहता सिवाय उसके जो कुछ इन पर वह्य किया जाता है। (क़ुरआन सूरा नज्म : 3, 4)
क़ुरआन मजीद जो तालीम मुसलमानों को देता है वो ये है कि नबियों के मक़ाम और मर्तबे में कोई फ़र्क़ न किया जाए, (2 : 285) सिवाय इसके कि अल्लाह ही ने किसी नबी को किसी ऐतिबार से फ़ज़ीलत अता की हो। (2 : 253) इस ऐतिबार से हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की फ़ज़ीलत ये है कि आप (सल्ल०) सिलसिलए-नुबूवत की आख़िरी कड़ी हैं। मुसलमानों को इस बात पर एक दर्जा बढ़त हासिल है कि उनका ईमान हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ-साथ हज़रत मूसा और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर भी है। यह इत्तेफ़ाक़ का एक ऐसा अनमोल पहलू है जो मुसलमानों और अहले-किताब के बीच बेहतर ताल्लुक़ात का ज़रिआ बन सकता है।
क़ुरआन और इंजील का कॉमन पैग़ाम
क़ुरआन मजीद हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाज़िल हुई आख़िरी किताब है। ये न सिर्फ़ पिछली आसमानी किताबों की तस्दीक़ करती है बल्कि उनके पैग़ाम का ख़ुलासा भी पेश करती है। ये अहले-किताब को बार-बार दावत देती है कि वे उन कॉमन बातों पर मुत्तफ़िक़ होकर साथ में आएँ जो सभी आसमानी किताबों में मौजूद हैं। क़ुरआन मजीद में फरमाया गया:
“आओ हम और तुम उन बातों पर इत्तेफ़ाक़ कर लें जो हमारे और तुम्हारे दरम्यान समान हैं। यानी हम सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करें और किसी को उसका शरीक न ठहराएँ।” (सूरा आले-इमरान 3:64)
इंजील (जो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल हुई) और क़ुरआन मजीद के मुताले से कई ऐसी बातें सामने आती हैं जो दोनों में कॉमन हैं। इनमें से कुछ सबसे अहम तालीमात का ज़िक्र क्रिसमस के मौक़े की मुनासिबत से यहाँ किया जा रहा है, ताकि मुसलामानों और ईसाई भाइयों के दरम्यान मुवाफ़िक़त की राहें हमवार हो सकें।
1. तौहीद: एक ख़ुदा का तसव्वुर
यूँ तो तौहीद तमाम आसमानी मज़ाहिब की बुनियाद है। लेकिन इस्लाम और ईसाइयत इस मामले में नुमायाँ हैसियत रखते हैं। इंजील का मुताला करने से मालूम होता है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने हमेशा अल्लाह की वहदानियत (एकेश्वरवाद) का दर्स दिया। इंजील में फ़रमाया गया:
“सुनो, ऐ इस्राईल! ख़ुदावन्द हमारा ख़ुदा एक ही ख़ुदावन्द है।” (मरक़ुस 12:29)
एक और जगह कहा गया कि:
“और सब का एक ही परमेश्वर और पिता है, जो सब के ऊपरऔर सब के मध्य में, और सब में है।” (इफ़िसियों 4:6)
एक और जगह कहा गया कि :
“और पृथ्वी पर किसी को अपना पिता न कहना, क्योंकि तुम्हारा एक ही पिता है, जो स्वर्ग में है।” (मत्ती : 23: 9)
एक और जगह कहा गया कि :
“क्या हम सभों का एक ही पिता नहीं? क्या एक ही परमेश्वर ने हमको उत्पन्न नहीं किया? हम क्यों एक दूसरे का विश्वासघात करके अपने पूर्वजों की वाचा को तोड़ देते हैं?” (मलाकी 2 : 10)
क़ुरआन मजीद में भी हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के हवाले से तौहीद का पैग़ाम इस तरह बयान किया गया है कि :
“बेशक अल्लाह मेरा रब और तुम्हारा रब है, सो तुम उसकी इबादत करो। यही सीधा रास्ता है।” (सूरा मरयम 19:36)
लिहाज़ा मुसलमानों और ईसाइयों को चाहिये कि वे ख़ुदा के एक होने पर मुत्तफ़िक़ होकर दुनिया में काम करें ताकि इन्सानों पर एक ख़ुदा को मानने के जो असरात पड़ने चाहियें वो नुमायाँ तौर पर नज़र आने लगें और लोग एक ख़ुदा के रंग में रंग कर उसकी इस दुनिया को बेहतरीन और ख़ुशनुमा बनाने में अपना रोल अदा कर सकें।
2. अल्लाह की इबादत और इताअत
दूसरी बात जो हमें क़ुरआन और इंजीले-मुक़द्दस में कॉमन नज़र आती है वो है एक अल्लाह की इबादत और इताअत। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपनी ज़िन्दगी में अल्लाह की इबादत को अहमियत दी और दूसरों को भी इसी की तल्क़ीन की। इंजील में है कि:
“तुम शैतान की इबादत न करो बल्कि ख़ुदावन्द अपने ख़ुदा की इबादत करो और सिर्फ़ उसी की ख़िदमत (इताअत) करो।” (मती 4:10)
ये तालीम वाज़ेह करती है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की इबादत के सिवा किसी और इबादत को ममनू और हराम क़रार दिया।
सूरा आले-इमरान (3:52) में बिलकुल साफ़ तौर पर लिखा है,
“और मसीह ने कहा, ऐ इस्राईल के बेटो! मेरे रब और अपने रब अल्लाह की इबादत करो, क्योंकि जो शिर्क करेगा अल्लाह ने उस पर जन्नत हराम कर दी है और उसका ठिकाना जहन्नम है और ज़ालिमों का कोई मददगार न होगा।”
क़ुरआन मजीद में एक और जगह फ़रमाया गया:
“और उन्हें इसके सिवा कोई हुक्म नहीं दिया गया कि वह इख़लास के साथ अल्लाह की इबादत करें।” (सूरा अल-बैय्यिना 98:5)
लिहाज़ा मुसलमानों और ईसाई हज़रात को इन तालीमात पर ग़ौर करना चाहिये कि वे एक अल्लाह के अलावा न किसी की इबादत करें और न इताअत।
3. एक अल्लाह की हाकिमियत का तसव्वुर
आसमानी मज़ाहिब का एक ख़ास पैग़ाम ये भी है कि उनमें अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह की हाकमियत का तसव्वुर पेश किया गया है। इंजील में है कि :
“सो तुम इस तरह दुआ किया करो कि ‘ऐ हमारे ख़ुदा, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पाक माना जाए। तेरी हाकमियत आए; तेरी मर्ज़ी जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे ज़मीन पर भी हो।'” (मत्ती : 6 : 9, 10)
क़ुरआन मजीद में इस तसव्वुर को इस तरह पेश किया गया है कि हुक्म सिर्फ़ अल्लाह ही का है। वही सबसे बेहतर हाकिम है। क़ुरआन मजीद में ये तसव्वुर इतना आम और वाज़ेह है की शायद ही कोई पेज ऐसा हो जिसमें ख़ुदा की बड़ाई और उसकी ख़ुदाई को तस्लीम करने और अल्लाह की ज़मीन पर उसको क़ायम करने का ज़िक्र न मिलता हो।
लिहाज़ा मुसलमानों और ईसाइयों को मिलकर इस बात की कोशिश करनी चाहिये कि अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह का हुक्म लागू हो ताकि समाज में अम्न व सलामती क़ायम हो सके।
4. आख़िरत का तसव्वुर और जवाबदेही
तमाम आसमानी मज़ाहिब की एक और ख़ास बात जो सभी में कॉमन नज़र आती है वो है आख़िरत में अल्लाह के सामने अपनी ज़िन्दगी के बारे में जवाबदेही का तसव्वुर। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने इंसानों को अल्लाह के आगे जवाबदेही का एहसास दिलाया। इंजील में फरमाया गया:
“इस (क़ियामत के दिन) से हैरत में मत पड़ो, क्योंकि वह वक़्त आएगा कि जितने क़ब्रों में हैं, उसकी पुकार को सुनकर निकलेंगे। (और उस दिन) जिन्होंने भलाई की है वे नई ज़िन्दगी जीने के लिये जी उठेंगे (यानी अपने नेक आमाल की जज़ा के लिये ज़िन्दा हो उठेंगे) और जिन्होंने बुराई की है वे सज़ा पाने के लिये जी उठेंगे।” (योहन्ना 5:28, 29)
इंजीले-मुक़द्दस की इन दोनों आयतों को पढ़कर ऐसा महसूस होता है कि क़ुरआन मजीद में जो जगह-जगह क़ियामत का नक़्शा खींचा गया है (देखें सूरा ज़िलज़ाल) वही नक़्शा यहाँ भी खींचा गया है। इस बात को क़ुरआन में इस तरह भी बयान किया गया है कि :
“जो कोई नेक काम करेगा, चाहे वह मर्द हो या औरत, और वह (अल्लाह और आख़िरत पर) ईमान रखता होगा, तो उसे जन्नत में दाख़िल किया जाएगा। और उनकी ज़रा भी हक़-तलफ़ी न की जाएगी।” (सूरा निसा 4:124) “जिसने ज़र्रा बराबर नेकी की होगी वो भी उसको दिखा दी जाएगी, और जिसने ज़र्रा बराबर बुराई की होगी वो भी उसको दिखा दी जाएगी। (सूरा ज़िलज़ाल : 7, ![]()
मुसलमानों और ईसाई भाइयों से इस बात की भरपूर तवक़्क़ो की जा सकती है कि उनकी ज़िन्दगी के मामलात इस तरह हों कि उनके ज़ेहनों में आख़िरत में अल्लाह के सामने जवाबदेही का यक़ीन मज़बूत रहे।
5. इंसानी बराबरी और भाईचारा
हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने इंसानों के दरम्यान मसावात (बराबरी) और महब्बत का पैग़ाम दिया। उन्होंने फ़रमाया:
“तुम अपने पड़ोसी से वैसी ही महब्बत करो जैसी तुम अपने आप से करते हो।” (मत्ती 22:39)
इस सिलसिले में क़ुरआन मजीद की तालीमात भी हमारी रहनुमाई करती हैं और मुसलमानों को इस बात के लिये उभरती हैं कि वो इन्सानों की भलाई और ख़ैरख़ाही के मामले में आगे आएँ। क़ुरआन में अल्लाह ने फ़रमाया:
“ऐ नबी, हमने जो तुमको भेजा है तो असल में दुनियावालों के हक़ में रहमत बनाकर भेजा है।”
क़ुरआन ने मुसलमानों को हुक्म दिया कि तुम वो बेहतरीन गरोह हो जिसे दुनियाए-इन्सानियत की भलाई के लिये बरपा किया गया है, तुम्हारा काम ये है कि तुम लोगों को भलाइयों की तरफ़ बुलाओ और बुराइयों से रोको। (सूरा-3 : 110)
आख़िरी बात
क्रिसमस के मौक़े पर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की तालीमात को याद करना और उनकी रौशनी में तौहीद, इंसानी बराबरी, इख़लास और आख़िरत के तसव्वुर को आम करना न सिर्फ़ हमारी ज़िम्मेदारी है बल्कि यह हमारे और ईसाई भाइयों के दरम्यान इत्तेफ़ाक़ का ज़रिआ भी बन सकता है।
क़ुरआन-मजीद और इंजील-मुक़द्दस दोनों की तालीमात हमें नफ़रत, तफ़रक़े और ग़लतफहमियों को दूर करके महब्बत, भाईचारे और इत्तेफ़ाक़ की राह पर चलने का पैग़ाम देती हैं। यह हमारे ऊपर है कि हम इन तालीमात को कैसे अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बनाते हैं और दुनिया को अमन और महब्बत का गहवारा बनाते हैं।