प्यारी बहनो! हमारे समाज में महिलाओं के साथ जो अत्याचार हो रहा है, उनका जो sexual harassment (यौन शोषण) हो रहा है इसका गम्भीरता के साथ नोटिस लिया जाना चाहिये और कोई सोलुशन ज़रूर तलाश करना चाहिये। इसके लिये हमें किसी भी प्रकार के पक्षपात से मुक्त होकर विचार करना पड़ेगा। अपनी सुरक्षा के लिये अगर mentality (मानसिकता) को बदलना पड़े तो उससे भी पीछे नहीं हटना चाहिये, क्योंकि अधिकतर चीज़ें मानसिकता के चलते ही ख़राब या सही होती हैं।
प्यारी बहनो! आप इस बात से तो 100% सहमत होंगी कि यदि किसी रास्ते में भेड़िये और ख़तरनाक क़िस्म के कुत्ते घूमते फिर रहे हों तो कोई भी समझदार व्यक्ति उस समय तक उस रास्ते को जाना पसन्द नहीं करेगा जब तक उस रास्ते से वो कुत्ते और भेड़िये दफ़ा नहीं हो जाते।
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार इसलिये होता है कि समाज में तुच्छ मानसिकता के लोग पाए जाते हैं, ये वो दरिन्दे हैं जो अपनी इच्छाओं और वासनाओं की पूर्ती के लिये अवसर मिलते ही जानवरों से भी अधिक नीचे गिर जाते हैं, अन्यथा उनकी वासनात्मक निगाहों और गन्दी सोच को तो आपको हर रोज़ बरदाश्त करना ही पड़ता है।
मेरी बहनो! यदि आपको सम्मान के साथ समाज में रहना है, जो कि आपका मौलिक अधिकार है (और ये अधिकार किसी संविधान, किसी धर्म या किसी विचारधारा ने एहसान के तौर पर आपको नहीं दिया है, बल्कि पैदा करनेवाले ने जन्म से ही आपको ये अधिकार दिया है), तो इसके लिये ज़रूरी है कि इन कुत्ते और भेड़िये क़िस्म के इन्सानों की मानसिकता को बदलने का अभियान चलाया जाए। (जिसकी शुरूआत आप ही से हो सकती है) लेकिन आपसे एक विनती यह भी आपसे है कि जब तक इस कलुषित मानसिकता वाले लोगों से समाज पाक नहीं हो जाता तब तक कम से कम आपको सावधानी बरतनी चाहिये।
हम ये मानते हैं कि नारी का इसमें कोई दोष नहीं है, सारा दोष उस तुच्छ मानसिकता का है, जो पुरुष के भेजे में घुसी हुई है, लेकिन यदि इस तुच्छ मानसिकता के चलते किसी महिला के साथ अभद्र व्यवहार होता है, उसका चीर हरण होता है, तो हो गई न उसकी तो मिटटी ख़राब!
ये बात तो दुनिया जानती है कि छुरी ख़रबूज़े पर गिरे या ख़रबूज़ा छुरी पर, नुक़सान तो हर हाल में ख़रबूज़े का ही होना है, और जब नुक़सान हो जाता है तो सिवाए शोर मचाने के कोई कुछ कर नहीं पाता, चाहे वो मीडिया हो या पुलिस, रिश्ते और नातेदार हों या अदालतें।
इसलिये प्यारी बहनो! हमारे करने के दो ही काम हैं: एक यह कि नौजवानों (पुरुष और महिला दोनों) की मानसिकता को बदलने की कोशिश करें। (यानी पुरुषों के मन-मस्तिष्क में महिलाओं के प्रति सम्मान पैदा करें और महिलाओं को उनका गौरव याद दिलाएँ और उन्हें गौरवतापूर्ण ढंग से जीवन जीना सिखाएँ।) जब आप माँ के रूप में होती हैं तो ये काम बहुत आसानी के साथ कर सकती हैं। आप बहन के रूप में रहते हुए भी इस मानसिकता को बदलने का काम अच्छी तरह कर सकती हैं और पत्नी के रूप में भी। फिर भी अगर इस विकृत मानसिकता का इलाज न हो तो सख़्त से सख़्त सज़ा का प्रावधान किया जाए और इसमें किसी प्रकार की नरमी न बरती जाए। चाहे इस तुच्छ मानसिकता का शिकार व्यक्ति आपका बेटा, भाई और पति ही क्यों न हो।
बहनो! दूसरा काम ये है कि जब तक इस तुच्छ मानसिकता का अन्त न हो जाए तब तक आपको अतिसावधानी बरतनी चाहिये। ऐसी ड्रेस पहनकर समाज में घूमती न फिरें कि किसी भेड़िये को अपनी तुच्छ मानसिकता को सन्तुष्ट करने का अवसर मिल जाए, क्योंकि शायद आपको इस बात का अन्दाज़ा नहीं है कि इस तरह की ड्रेस पहनकर निकलने से भले ही विकृत और बीमार मानसिकता के व्यक्ति को निकृष्टतम सीमा तक (अत्यन्त गहरी खाई में) गिरने का अवसर न मिल रहा हो परन्तु उसे अपनी वासनात्मक मानसिकता को तृप्त करने का अवसर ज़रूर मिल जा रहा है। अब बस इतनी सी कमी रह जाती है कि कब वो अवसर मिलता है कि वो वासना को भी तृप्त कर ले। (जिसके विचार से भी दिल दहल जाता है)
याद रखिये बहनो! किसी एक नारी का अपमान पूरी नारी जाती का अपमान है और नारी जाती का अपमान पूरी मानव जाती का अपमान है। इसलिये ऐसे हालात में सावधानी बरतना ज़्यादा ज़रूरी है। बहुत ही पुरानी और सही कहावत है कि:
Prevention is better than cure. या Option an ounce of prevention is better than a pound of cure.
अब तनिक विचार कीजिये कि फ़िल्मों और इन्टरनेट के द्वारा जो कुछ दिखाया जा रहा है क्या उससे उस तुच्छ मानसिकता को बदला जा सकता है। पोर्नोग्राफ़ी का जो इतना बड़ा धन्धा चल रहा है क्या उससे इस तुच्छ मानसिकता को बदला जा सकता है?
नहीं हरगिज़ नहीं, बल्कि इन सब चीज़ों से तो उस मानसिकता को और बल मिलता है।
मेरी बहनो! हिजाब का यह अर्थ बिलकुल नहीं है कि एक औरत को काले कपड़े में लपेटकर घर के कोने में क़ैद कर दिया जाए। हिजाब का सीधा सा अर्थ है कि तुच्छ मानसिकता वाले भेड़ियों की वासना भरी निगाहों से अपने आपको बचाने का उपाय किया जाए और इससे अधिक अच्छा उपाय और क्या हो सकता है कि हम शालीनता अपनाते हुए शालीन ड्रेस इस्तेमाल करें।
तो एक बार फिर में अपनी सभी बहनों और बेटियों से विनती करूँगा कि please be careful. शालीन रहिये, शालीनतापूर्ण ड्रेस पहनिये, तथाकथित modernity के जाल में फँस कर नग्न और अर्द्ध-नग्न होकर फिरनेवाली हज़ारों साल पुरानी सभ्यता को मत दोहराइये। वैलेंटाइन डे या फ़्रेंडशिप डे या इसी तरह के किसी भी अमानवीय तथाकथित डे के नाम पर अपने जीवन में अन्धकार लाने से बचिये। वास्तव में आप समाज का गौरव हैं, अपनी गरिमा को बनाए रखने का एक ही तरीक़ा है कि अपनी किसी भी क़ीमत पर अपनी अस्मिता की रक्षा करें। शुक्रिया
आपका शुभचिन्तक भाई
मुहम्मद अली शाह शुऐब
महिला हित में जारी