Hukmraani ka model

Hukmraani ka model

हुक्मरानी का मॉडल

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हज़रत उमर (रज़ि.) इस्लामी तारीख़ की अज़ीम शख़्सियत थे। उनको यह हरगिज़ गवारा न होता था कि खाने-पीने और रहन-सहन के मामले में आम लोगों पर किसी क़िस्म की बरतरी इख़्तियार करें।

एक बार जब उनके दौरे-ख़िलाफ़त में सूखा पड़ा तो उन्होंने क़सम खा ली कि जब तक लोगों पर ख़ुशहाली के दिन नहीं आ जाते वे घी इस्तेमाल नहीं करेंगे। पूरा साल इसी हाल में गुज़रा, यहाँ तक कि आपके अंदर कमज़ोरी के आसार नुमायाँ होने लगे और आपके चेहरे की ताज़गी जाती रही। लोगों ने इस हालत पर तरस खाकर सुझाव दिया कि आप अपने ज़रूरी ख़र्च के लिए कुछ रक़म बैतुलमाल (राजकोष) से ले लिया करें। मगर आपने इस सुझाव को नामंज़ूर कर दिया। आप फ़रमाया करते कि :

“जनता के हाल की मैं उस वक़्त तक क्या परवाह कर सकता हूँ जब तक मैं ख़ुद उस हालत से न गुज़रूँ जिस हालत में तमाम लोग गुज़र कर रहे हैं।”

हुक्मराँ के इस मॉडल को देखिए और आज के अपने इन हुक्मरानों की हालत को देखिए। यक़ीनन आपको ज़मीन आसमान से कई गुना ज़्यादा फ़र्क़ नज़र आएगा।

हुक्मरानी के इस मॉडल को क्या आप रिपीट नहीं करना चाहेंगे?

Hazrat Umar (may Allah be pleased with him) was one of the greatest figures in Islamic history. It was utterly unacceptable to him that he should enjoy any privilege over the common people in matters of food, drink, or lifestyle.

Once, during his caliphate, a severe famine struck the land. He solemnly swore that he would not consume ghee (clarified butter) until prosperity returned to the people. An entire year passed in this condition, to the point that signs of weakness began to appear in his body, and the freshness of his face began to fade. Witnessing this, people felt pity and suggested that he draw a modest allowance from the public treasury (Bayt al-Mal) for his essential needs. But he firmly rejected the proposal.

He would often say:

“How can I truly care for the condition of the people if I do not myself pass through the same hardship that they are enduring?”

Look at this leadership model—and then at the state of our rulers today. Undoubtedly, you will find a difference greater than the distance between the earth and the sky.

Would you not wish to see such a leadership model revived once again?

حضرت عمرؓ اسلامی تاریخ کی ایک عظیم المرتبت شخصیت تھے۔ انہیں ہرگز گوارا نہ تھا کہ کھانے پینے اور رہن سہن کے معاملے میں عام لوگوں پر کسی قسم کی برتری اختیار کریں۔

ایک مرتبہ آپؓ کے دورِ خلافت میں قحط پڑا تو آپؓ نے قسم کھالی کہ جب تک لوگوں پر خوشحالی کے دن واپس نہ آجائیں، وہ گھی استعمال نہیں کریں گے۔ پورا سال اسی حالت میں گزر گیا، یہاں تک کہ آپؓ کے اندر کمزوری کے آثار نمایاں ہونے لگے اور چہرے کی تازگی رخصت ہونے لگی۔ لوگوں نے آپؓ کی یہ حالت دیکھ کر رحم کھایا اور مشورہ دیا کہ آپ اپنے ضروری اخراجات کے لیے بیت المال سے کچھ رقم لے لیا کریں۔ لیکن آپؓ نے اس مشورے کو سختی سے رد کردیا۔

آپؓ فرمایا کرتے تھے:

“میں رعایا کے حال کی کیسے پرواہ کرسکتا ہوں جب تک کہ میں خود اُس حالت سے نہ گزروں جس سے تمام لوگ گزر رہے ہیں!”

حکمرانی کا یہ مثالی نمونہ دیکھیے، اور پھر آج کے اپنے حکمرانوں کی حالت پر نگاہ ڈالیے۔ یقیناً آپ کو زمین و آسمان سے بھی کہیں زیادہ فرق محسوس ہوگا۔

کیا آپ حکمرانی کے اس ماڈل کو دوبارہ زندہ نہیں کرنا چاہیں گے؟

Hindi

हुक्मरानी का मॉडल

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हज़रत उमर (रज़ि.) इस्लामी तारीख़ की अज़ीम शख़्सियत थे। उनको यह हरगिज़ गवारा न होता था कि खाने-पीने और रहन-सहन के मामले में आम लोगों पर किसी क़िस्म की बरतरी इख़्तियार करें।

एक बार जब उनके दौरे-ख़िलाफ़त में सूखा पड़ा तो उन्होंने क़सम खा ली कि जब तक लोगों पर ख़ुशहाली के दिन नहीं आ जाते वे घी इस्तेमाल नहीं करेंगे। पूरा साल इसी हाल में गुज़रा, यहाँ तक कि आपके अंदर कमज़ोरी के आसार नुमायाँ होने लगे और आपके चेहरे की ताज़गी जाती रही। लोगों ने इस हालत पर तरस खाकर सुझाव दिया कि आप अपने ज़रूरी ख़र्च के लिए कुछ रक़म बैतुलमाल (राजकोष) से ले लिया करें। मगर आपने इस सुझाव को नामंज़ूर कर दिया। आप फ़रमाया करते कि :

“जनता के हाल की मैं उस वक़्त तक क्या परवाह कर सकता हूँ जब तक मैं ख़ुद उस हालत से न गुज़रूँ जिस हालत में तमाम लोग गुज़र कर रहे हैं।”

हुक्मराँ के इस मॉडल को देखिए और आज के अपने इन हुक्मरानों की हालत को देखिए। यक़ीनन आपको ज़मीन आसमान से कई गुना ज़्यादा फ़र्क़ नज़र आएगा।

हुक्मरानी के इस मॉडल को क्या आप रिपीट नहीं करना चाहेंगे?

Hazrat Umar (may Allah be pleased with him) was one of the greatest figures in Islamic history. It was utterly unacceptable to him that he should enjoy any privilege over the common people in matters of food, drink, or lifestyle.

Once, during his caliphate, a severe famine struck the land. He solemnly swore that he would not consume ghee (clarified butter) until prosperity returned to the people. An entire year passed in this condition, to the point that signs of weakness began to appear in his body, and the freshness of his face began to fade. Witnessing this, people felt pity and suggested that he draw a modest allowance from the public treasury (Bayt al-Mal) for his essential needs. But he firmly rejected the proposal.

He would often say:

“How can I truly care for the condition of the people if I do not myself pass through the same hardship that they are enduring?”

Look at this leadership model—and then at the state of our rulers today. Undoubtedly, you will find a difference greater than the distance between the earth and the sky.

Would you not wish to see such a leadership model revived once again?

حضرت عمرؓ اسلامی تاریخ کی ایک عظیم المرتبت شخصیت تھے۔ انہیں ہرگز گوارا نہ تھا کہ کھانے پینے اور رہن سہن کے معاملے میں عام لوگوں پر کسی قسم کی برتری اختیار کریں۔

ایک مرتبہ آپؓ کے دورِ خلافت میں قحط پڑا تو آپؓ نے قسم کھالی کہ جب تک لوگوں پر خوشحالی کے دن واپس نہ آجائیں، وہ گھی استعمال نہیں کریں گے۔ پورا سال اسی حالت میں گزر گیا، یہاں تک کہ آپؓ کے اندر کمزوری کے آثار نمایاں ہونے لگے اور چہرے کی تازگی رخصت ہونے لگی۔ لوگوں نے آپؓ کی یہ حالت دیکھ کر رحم کھایا اور مشورہ دیا کہ آپ اپنے ضروری اخراجات کے لیے بیت المال سے کچھ رقم لے لیا کریں۔ لیکن آپؓ نے اس مشورے کو سختی سے رد کردیا۔

آپؓ فرمایا کرتے تھے:

“میں رعایا کے حال کی کیسے پرواہ کرسکتا ہوں جب تک کہ میں خود اُس حالت سے نہ گزروں جس سے تمام لوگ گزر رہے ہیں!”

حکمرانی کا یہ مثالی نمونہ دیکھیے، اور پھر آج کے اپنے حکمرانوں کی حالت پر نگاہ ڈالیے۔ یقیناً آپ کو زمین و آسمان سے بھی کہیں زیادہ فرق محسوس ہوگا۔

کیا آپ حکمرانی کے اس ماڈل کو دوبارہ زندہ نہیں کرنا چاہیں گے؟

हुक्मरानी का मॉडल

—   —   —

हज़रत उमर (रज़ि.) इस्लामी तारीख़ की अज़ीम शख़्सियत थे। उनको यह हरगिज़ गवारा न होता था कि खाने-पीने और रहन-सहन के मामले में आम लोगों पर किसी क़िस्म की बरतरी इख़्तियार करें।

एक बार जब उनके दौरे-ख़िलाफ़त में सूखा पड़ा तो उन्होंने क़सम खा ली कि जब तक लोगों पर ख़ुशहाली के दिन नहीं आ जाते वे घी इस्तेमाल नहीं करेंगे। पूरा साल इसी हाल में गुज़रा, यहाँ तक कि आपके अंदर कमज़ोरी के आसार नुमायाँ होने लगे और आपके चेहरे की ताज़गी जाती रही। लोगों ने इस हालत पर तरस खाकर सुझाव दिया कि आप अपने ज़रूरी ख़र्च के लिए कुछ रक़म बैतुलमाल (राजकोष) से ले लिया करें। मगर आपने इस सुझाव को नामंज़ूर कर दिया। आप फ़रमाया करते कि :

“जनता के हाल की मैं उस वक़्त तक क्या परवाह कर सकता हूँ जब तक मैं ख़ुद उस हालत से न गुज़रूँ जिस हालत में तमाम लोग गुज़र कर रहे हैं।”

हुक्मराँ के इस मॉडल को देखिए और आज के अपने इन हुक्मरानों की हालत को देखिए। यक़ीनन आपको ज़मीन आसमान से कई गुना ज़्यादा फ़र्क़ नज़र आएगा।

हुक्मरानी के इस मॉडल को क्या आप रिपीट नहीं करना चाहेंगे?

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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