كُلُّ أُمَّتِي يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ
यानी “मेरी उम्मत का एक-एक फ़र्द जन्नत में जाएगा।” (हदीस)
इस जुमले ने मुसलमानों में इतनी शोहरत पाई है कि यक़ीन के दर्जे को हासिल कर लिया है और मुसलमानों को अमल से फ़ारिग़ कर दिया है, बिलकुल उसी तरह जिस तरह बनी-इस्राईल के यहाँ इस बात ने यक़ीन का दर्जा हासिल कर लिया था कि “आग हमें नहीं छुएगी, सिवाय इसके कि कुछ दिन।” हालाँकि अल्लाह ने उनकी इस ग़लतफ़हमी को ये कहते हुए दूर कर दिया कि “क्या तुमने अल्लाह से कोई अहद ले लिया है, जिसकी वो ख़िलाफ़वर्ज़ी नहीं कर सकता?” (2:80)
अफ़सोस होता है कि क़ुरआन ने बनी-इस्राईल की जिस ग़लतफ़हमी को दूर किया था उसी ग़लतफ़हमी में आज ये उम्मत पड़ गई। जिस उम्मत को ताकीद की गई थी कि तुम उनके नक़्शे-क़दम पर हरगिज़ न चलना वरना तुम भी उसी तरह गुमराह हो जाओगे, वो उम्मत आज गुमराही की उन्हीं अँधेरियों में टामकटुइयाँ खा रही है।
सवाल ये पैदा होता है कि ये गुमराही उम्मत में दाख़िल किस तरह हो गई?
जब हम इसकी वुजूहात पर ग़ौर करते हैं तो मालूम होता है कि हमारे मुबल्लेग़ीन और (ग़लत क़िस्म के) आलिमों ने जानबूझकर या अनजाने में हदीसों को आधा-अधूरा पेश किया और वो बातें अवाम में इतनी मशहूर हो गईं कि वही मुकम्मल सच बन गईं। इसका जीता-जागता सुबूत है हदीस का वो टुकड़ा जिसे हमने ऊपर नक़ल किया है। ज़ाहिर है कि अगर इससे आगे की बात लोगों के सामने नहीं लाई जाएगी तो यही बात राइज हो जाएगी और चूँकि इसमें कुछ मशक़्क़त भी नहीं है, तो इसे यक़ीन का दर्जा हासिल हो ही जाना था। लेकिन ये ग़लतफ़हमी महज़ हदीस को मुकम्मल पढ़ने से दूर हो जाती है। पूरी हदीस इस तरह है :
عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ، قَالَ : كُلُّ أُمَّتِي يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ إِلَّا مَنْ أَبَى ، قَالُوا : يَا رَسُولَ اللَّهِ ، وَمَنْ يَأْبَى ؟ ، قَالَ : مَنْ أَطَاعَنِي دَخَلَ الْجَنَّةَ ، وَمَنْ عَصَانِي فَقَدْ أَبَى
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया : सारी उम्मत जन्नत में जाएगी, सिवाय उनके जिन्होंने इनकार किया। (सहाबा ने) कहा : या रसूलुल्लाह (सल्ल०) “इनकार कौन करेगा।” फ़रमाया : जो मेरी इताअत (फ़रमाँबरदारी) करेगा वो जन्नत में दाख़िल होगा। और जो मेरी नाफ़रमानी करेगा उसने इनकार किया। (यानी ऐसा शख़्स जन्नत में हरगिज़ दाख़िल नहीं होगा।) (हदीस बुख़ारी 7280)
यहाँ पर ये बात भी वाज़ेह रहनी चाहिये कि रसूल की इताअत और इत्तिबा ही दरअसल अल्लाह की इताअत है। क़ुरआन में है “जिसने रसूल (सल्ल०) की इताअत की तो यक़ीनन उसी ने अल्लाह की इताअत की….।” (4 : 80) बल्कि क़ुरआन तो यहाँ तक कहता है कि रसूल को भेजा ही इसलिये जाता है कि उसकी इताअत व फ़रमाँबरदारी की जाए। (4:64) फिर ये कि “जो अल्लाह और उसके रसूल की फ़रमाँबरदारी करेगा उसे अल्लाह ऐसे जन्नतों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बहती होंगी और उनमें वो हमेशा रहेगा। (4:13)
लिहाज़ा हदीस को पूरा पढ़ने से मालूम हुआ कि जन्नत में उम्मत का वही शख़्स जाएगा जो अल्लाह के रसूल (सल्ल०) की कामिल इताअत और फ़रमाँबरदारी करेगा। महज़ मुसलमान घराने में पैदा हो जाना या कलिमे का ज़बान से इक़रार कर लेना या अपनी मर्ज़ी से कुछ बातों को मान लेना और कुछ को छोड़ देना इस बात की सनद हरगिज़ नहीं है कि वो जन्नत में चला जाएगा। यहाँ पर ये बात भी वाज़ेह रहनी चाहिये कि इस तरह कि जितनी भी हदीसें हैं जिनमें उम्मत को जन्नत की ज़मानत दी गई है उनमें कोई न कोई शर्त ज़रूर पाई जाती है। लिहाज़ा हम मुसलमानों को इस ग़लतफ़हमी से बाहर आना चाहिये कि हम मुसलमान घराने में पैदा हो गए हैं तो जन्नत में जाना हमारा हक़ है।