इस्लामी क़ानून अपनी तबीअत और मिज़ाज (स्वभाव) में ज़मीन पर बनने वाले सभी क़ानूनों से बिलकुल मुख़्तलिफ़ (भिन्न) है।
इस्लामी क़ानून किसी एक तबक़े (वर्ग) के मफ़ाद (हित) में और किसी दूसरे तबक़े के ख़िलाफ़ नहीं है। बल्कि वह उस हस्ती की तरफ़ से नाज़िल (अवतरित) हुआ है जो ज़ात-ब्राद्रियों, रंग-नस्ल के भेदभाव और क़ौमों और तबक़ों के पक्षपात से बहुत ऊपर है। जो इंसानों का ख़ालिक़ (पैदा करनेवाला) ही नहीं निगराँ (संरक्षक) और पालनहार भी है। उसकी नज़र में तमाम इंसान बराबर हैं। अगर प्राथमिकता है भी तो केवल नेकी और तक़वा (ईशभय) की बुनियाद पर।
इसलिए अगर अपने समाज और इस धरती को अम्न और शान्ति का गहवारा देखना चाहते हो तो एक ही रास्ता है और वह यह कि इस्लाम की तालीमात (शिक्षाओं) को अपनाएँ और इस्लामी क़ानून को समाज में लागू करें।
याद रखें दोस्तो ! दुनिया अब अपने आख़िरी दौर (अंतिम चरण) में है (और इंसान की ज़िन्दगी का तो वैसे भी कोई भरोसा नहीं) और अब दुनिया के लोगों (बुद्धिजीवियों और दार्शनिकों) के पास अब कोई नज़रिया या सिद्धान्त आज़माने के लिए नहीं बचा है। अब केवल इस्लाम है जो इंसान को इस दुनिया में शान्ति और सलामती दे सकता है और मरने के बाद जहन्नम के अज़ाब (नरक की यातना) से नजात (मोक्ष) दिला सकता है।
So please be serious about Islam.