
‘ईमान’ की सादा सी डेफ़िनिशन तो ये है कि “ग़ैबी हक़ीक़तों के बारे में नबियों ने जो ख़बर दी है उनको ज़बान से इक़रार करना और दिल से उनकी तस्दीक़ करना ईमान कहलाता है।”
इन ग़ैबी हक़ीक़तों को तीन हिस्सों में तक़सीम किया गया है : पहली हक़ीक़त ये कि कायनात को बनाने और चलानेवाला एक ख़ुदा है, वही ख़ुदा हमारा माबूद है और हाकिम भी। इसे ईमान-बिल्लाह कहते हैं। दूसरी हक़ीक़त ये है कि मरने के बाद हमेशा की ज़िन्दगी है। उस ज़िन्दगी की कामयाबी और नाकामी इस बात पर डिपेंड होगी कि इस दुनिया में हमने ख़ुदा की फ़रमाँबरदारी में ज़िन्दगी गुज़ारी या नाफ़रमानी में। इसे ईमान बिल-आख़िरत कहते हैं। तीसरी हक़ीक़त ये है कि इन्सान की हिदायत व रहनुमाई के लिये अल्लाह ने नबी भेजे, जिन्होंने अल्लाह की मर्ज़ी और एहकामात को न सिर्फ़ इन्सानों तक पहुँचाया बल्कि उनपर अमल भी करके दिखाया। इसलिये उनकी ज़िन्दगी नमूना है। इसे ईमान बिर-रिसालत कहते हैं।
इन तीनों ईमानियात के तीन-तीन दायरे हैं:
(1) ईमान-बिल्लाह (i) पहला और बुनियादी दायरा ये है कि कोई शख़्स ये तस्लीम करे कि इस कायनात का बनाने और चलानेवाला एक अल्लाह है। उसका कोई शरीक नहीं है। ये दायरा जितना अहम और बुनियादी है उतना ही मुख़्तसर भी है। (ii) दूसरा दायरा ये कि कोई शख़्स ये माने कि अल्लाह हमारा माबूद भी है। हमें उसकी ताज़ीम करनी चाहिये और ताज़ीम का सही तरीक़ा ये है कि सर सिर्फ़ उसी के सामने झुके। ये पहले दायरे से बड़ा है जिसमें पहला दायरा एक अहम हिस्से (Integral Part) की हैसियत से शामिल है। (iii) तीसरा दायरा ये कि वो हमारा हाकिम भी है। ज़िन्दगी के तमाम मामलों में उसी का हुक्म माना जाए, चाहे वो मामलात निजि ज़िन्दगी से मुताल्लिक़ हों या ख़ानदानी, समाजी और सियासी ज़िन्दगी से मुताल्लिक़। ये दायरा पहले दोनों दायरों से इस तरह बड़ा है कि पहले दोनों दायरे Integral Part की हैसियत से इसमें समाए हुए हैं।
(2) ईमान बिल-आख़िरत (i) इस ईमान का पहला दायरा ये है कि इन्सान इस बात को तस्लीम करे कि मरने के बाद हमेशा की ज़िन्दगी है। मरने के बाद इस दुनियावी ज़िन्दगी का हिसाब होगा। ये दायरा भी जितना अहम है उतना ही मुख़्तसर भी है। (ii) दूसरा दायरा ये कि इन्सान मरने के बाद की ज़िन्दगी को न सिर्फ़ तस्लीम करे बल्कि उसको कामयाब बनाने के लिये वो अल्लाह को राज़ी करे यानी नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात वग़ैरा के तमाम अरकान सही-सही अदा करे किसी क़िस्म की कोताही न करे। (iii) तीसरा दायरा ये कि ज़िन्दगी के तमाम मामलात आख़िरत में जवाबदेही से मुतास्सिर हों। हर अमल से पहले ये बात सामने रखे कि अगर मैंने ये काम किया तो क्या मैं इसको अल्लाह के सामने जस्टिफ़ाई कर पाउँगा? बिस्तर पर लेटने के बाद पूरे दिन का जायज़ा लेकर देखे कि कौन-से आमाल थे जिनका आख़िरत में जवाब दे पाना मुश्किल हो जाएगा। अगर कोई ऐसा अमल है तो उसको फिर न करने का अहद करे।
(3) ईमान बिर-रिसालत (i) इस ईमान का पहला दायरा ये है कि इन्सान इस बात को तस्लीम करे कि अल्लाह बन्दों की रहनुमाई के लिये नबी, रसूल या दूत (Messenger) भेजता है, सबसे आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) हैं, जिनपर अपने ख़ास फ़रिश्ते के ज़रिए आख़िरी हिदायतनामा क़ुरआन नाज़िल किया। (ii) दूसरा दायरा ये कि रसूल की ताज़ीम करे। इसका तरीक़ा ये है कि रसूल से इश्क़ और मुहब्बत करे, जो किताब उन्होंने पेश की है उसकी ताज़ीम करे। उन्होंने ख़ुदा की ताज़ीम के जो तरीक़े सिखाए हैं उनको फ़ॉलो करे। इस ईमान का दायरा पहलेवाले दायरे से इस अन्दाज़ में बड़ा है कि पहला दायरा इसके अन्दर समाया हुआ है। (iii) तीसरा दायरा ये है कि हमारी हिदायत व रहनुमाई के लिये अल्लाह ने जो रसूल भेजा है उनकी और उनके ज़रिए पेश की गई किताब की न सिर्फ़ ताज़ीम और मुहब्बत की जाए बल्कि ज़िन्दगी के हर मामले में उनको आइडियल मानकर उनकी इस तरह इत्तिबा और पैरवी की जाए कि ज़िन्दगी का कोई एक क़दम भी उनके नक़्शे-क़दम से हटकर न पड़े। ईमान का ये दायरा पहले दोनों दायरों से इस अन्दाज़ में बड़ा है कि वो दोनों दायरे इस बड़े दायरे में समाए हुए हैं।
ऊपर के Analysis से मालूम होता है कि ईमानियात के तीन दायरों में पहला दायरा अक़ीदे का है जो कि असल, जड़ और बुनियाद है। दुनिया के तमाम ही मुसलमान इस दायरे में दाख़िल हैं इसी लिहाज़ से वो मोमिन और मुस्लिम हैं। दूसरा पूजा-परस्तिश और मुहब्बत के दावे का दायरा है, जो कि पहले दायरे का तक़ाज़ा है। मुसलमानों की एक बड़ी तादाद दूसरे दायरे में या तो दाख़िल ही नहीं है, अगर है तो सतही तौर। तीसरा दायरा अमल का दायरा है और पहले दोनों दायरों का तक़ाज़ा है जो पूरी ज़िन्दगी पर लागू होता है। जब कहा जाता है कि ईमान में दाख़िल हो जाओ तो उससे मुराद इन तीनों दायरों में एक साथ दाख़िल होना है। अगर कोई ग़लतफ़हमी की वजह से महज़ पहले या दूसरे दायरे में दाख़िल होकर ठहर जाता है तो क़ुरआन कहता है कि ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, ईमान लाओ अल्लाह पर और उसके रसूल पर और उस किताब पर जो अल्लाह ने अपने रसूल पर उतारी है….।” (4 : 136)
मुसलमानों की एक बहुत बड़ी तादाद इस दायरे को इस तरह नज़र-अन्दाज़ किये हुए है मानो ये कोई दायरा है ही नहीं, मानो ईमान दो ही दायरों में सिमट कर रह गया है। बल्कि तीसरे दायरे यानी अमल के दायरे को नज़र-अन्दाज़ करने के लिये ही पहले और दूसरे दायरे पर इतना ज़ोर दिया जाता है कि जिससे तीसरे दायरे की कमी को पूरा कर लिया जाए या यूँ कहा जाए कि सतही क़िस्म के अक़ीदे और मनमानी इबादत के ज़रिए हम अमल की कोताही को छिपाने की नाकाम कोशिश करते हैं। यही वजह है कि ईमान के वो असरात यानी ‘आमाले-सालेहा’ न हमारी ज़िन्दगियों में नज़र आते हैं और न मुस्लिम समाज में।
अगर दीने-इस्लाम की इमारत की बुनियाद ईमान के तीनों दायरों पर फैली हुई हो तो आमाले-सालेहा और हुस्ने-अख़लाक़ का वो नमूना मोमिन की ज़िन्दगी और मुस्लिम समाज में देखने को मिलेगा जिस पर कोई भी इंसान अपना दिल नक़द हार बैठेगा सिवाय उस शख़्स के जो हठधर्म हो और ज़ुल्म से उसका दिल सियाह हो चुका हो। फिर ऐसे ही लोगों के इलाज के लिये अल्लाह ने फ़रमाया
“और हमने लोहा उतारा जिसमें बड़ा ज़ोर है और लोगों के लिए बहुत-से फ़ायदे भी।” (57:25)
