अगर ज़मीन को हमवार करके खेत में सही-सालिम बीज न डाला जाए तो दो नतीजे बरामद होते हैं :
1) अगर ज़मीन बिलकुल बंजर है तो कोई पौधा उगेगा ही नहीं, सिवाय काँटेदार झाड़ियों के। फिर ज़मीन जितनी पथरीली होगी ये काँटेदार झाड़ियाँ भी उतनी ही सख़्त और मज़बूत होंगी।
2) अगर ज़मीन ज़रख़ेज़ और उपजाऊ है तो ज़मीन में खरपतवार (Unwanted Plants) उग आएँगे, जिनसे जानवरों को वक़्ती तौर पर भले ही कुछ चारा मिल जाए लेकिन बाक़ायदा ऐसी कोई फ़सल नहीं उगाई जा सकती जिससे इन्सानों को कोई पाएदार फ़ायदा पहुँचाया जा सकता हो।
इसी तरह इन्सान का ज़ेहन और दिमाग़ है कि अगर इसमें ‘फ़िक्रे-सालेह’ का बीज न बोया जाए तो दो नतीजे बरामद होंगे :
1) अगर दिल की ज़मीन बिलकुल बंजर और पत्थर है तो ख़ैर का कोई पौधा उगता ही नहीं है, सिवाय काँटेदार झाड़ियों (बुराइयों) के। फिर ये दिल की ज़मीन जितनी पत्थर होगी बुराइयाँ भी उतनी ही सख़्त और पुख़्ता होती चली जाती हैं। दिमाग़ शैतानी वसवसात की आमाजगाह (शरणस्थली) बन जाता है, जो फ़िक्र को पूरी तरह टेढ़ा करके दिल को अन्धा बना देते हैं। फिर इन दिलों पर अल्लाह की तरफ़ से ऐसी मोहर लगती है कि इनसे किसी भी क़िस्म के ख़ैर के कामों की उम्मीद ही नहीं की जा सकती।
2) अगर दिल की ज़मीन ज़रख़ेज़ और उपजाऊ भी हो तो इस दिल में खरपतवार (ग़ैर-ज़रूरी आमाल) की खेती उग आएगी, जिनसे वक़्ती क़िस्म के कुछ फ़ायदे भले ही उठा लिये जाएँ लेकिन कोई ठोस और पाएदार काम हरगिज़ नहीं लिया जा सकता।
लिहाज़ा ज़रूरी है कि दिल की ज़मीन पर दिमाग़ की खेती से कुछ सालेह क़िस्म की फ़सलें उगाई जाती रहें। इसके लिये ज़रूरी है कि दिल को ख़ुदा की याद से नर्म करके पहले उपजाऊ बनाया जाए फिर उसमें सालेहियत (ईमान) का बीज रोपा जाए और फिर उसे मुस्तक़िल तौर पर अख़लाक़ियात की खाद और इख़लास व लिल्लाहियत का पानी दिया जाता रहे। क़ुरआन की तपिश से हरारत और सुन्नते-मुतह्हरा से ठण्डक बहम पहुँचाई जाती रहे। फिर नमाज़ के ज़रिए इस पूरी फ़सल की निगरानी की जाती रहे।
इस बात पर भी मुस्तक़िल निगाह रखी जाती रहे कि एहतियात के बावजूद शैतानी वसवसे की शक्ल में अगर कोई खरपतवार (unwanted plant) उग आए तो उसे रोज़े की खुरपी से फ़ौरन उखाड़ फेंका जाए, अगर ज़रूरत पेश आए तो ज़कात की क़ैंची चलाकर पौधे की तराश-ख़राश भी कर दी जाए ताकि सालेहियत (ईमान) का वो बीज तनावर दरख़्त बन सके और उससे तमाम इन्सानों के लिये इन्सानियत की एक ऐसी लहलहाती (पायदार) खेती उगाई जा सके जिससे मुहब्बत के फूल, अम्नो-सलामती का साया और तरक़्क़ी व ख़ुशहाली के वो फल इन्सानी समाज को मुयस्सर हो सकें जो वक़्ती (दुनियावी) तौर पर ख़ुश-ज़ायक़ा भी हों और हमेशगी (आख़िरत) के तौर पर लज़्ज़त-आमेज़ भी।