बिलाल साहब की बीनाई बहुत कमज़ोर थी। चीज़ों को सही शक्ल में देखने और किताबें वग़ैरा पढ़ने के लिये उनके पास एक ऐनक थी।
एक दिन उन्हें बहुत ही क़ीमती किताब हाथ लगी। अब वो उसे पढ़ना चाहते थे, उसे पढ़ने के लिये उन्हें उस ऐनक की ज़रूरत थी। काफ़ी देर से परेशान थे, कभी इस दराज़ में देखते, कभी उस दराज़ में; कभी इस अलमारी में देखते कभी उस अलमारी में; कभी इस मेज़ पर देखते हैं कभी उस मेज़ पर; कभी तकिये के नीचे देखते कभी वाश-बेसिन पर। चश्मा न मिल पाने की वजह से ग़ुस्से और झुँझलाहट के आसार चेहरे पर नुमाया थे। कभी इस पर चिल्लाते, कभी उसपर। कभी बीवी साहिबा को डाँटते हैं तो कभी नौकर पर पिल पड़ते।
जब काफ़ी देर हो गई तो हिम्मत करके छोटी बच्ची ने पूछ ही लिया “अब्बू आख़िर आप परेशान क्यों हैं?”
बिलाल साहब कुछ नहीं बोले बस बड़बड़ाए जा रहे थे : “इस घर में कोई चीज़ भी ठीक से नहीं रखी जाती है, सब इधर-उधर रखी रहती हैं। अब देखो मेरा चश्मा नहीं मिल रहा है पता नहीं किसने उसे मुझसे दूर कर दिया है। इस घर में मेरे साथ साज़िश हो रही है। सब मुझे परेशान करने पर तुले रहते हैं।”
बच्ची को जब ये मालूम हुआ कि अब्बू को ऐनक की तलाश है तो उसने अब्बू को इशारा करते हुए कहा : “अब्बू आपके ख़िलाफ़ कोई साज़िश नहीं कर रहा है आपने ख़ुद ही अपनी ऐनक उठाकर अपने सर पर रख ली है।”
अब जाके मुझे समझ आया कि इन्तिहाई कमज़ोर बीनाई की वजह से हमें अपनी किताबे-ज़िन्दगी पढ़ने के लिये अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने जो ऐनक क़ुरआन की शक्ल में हमें अता की थी उस ऐनक को हमने उठाकर (एहतिराम में) अपने सर पर रख लिया है और नाबीनों की तरह इधर-उधर आड़े-तिरछे हाथ मारते फिर रहे हैं। किताबे ज़िन्दगी को पढ़ न पाने की वजह से ज़िन्दगी का कोई रास्ता साफ़ नज़र नहीं आ रहा है, जिसकी वजह से हम में का हर शख़्स ग़ुस्से और बेचैनी की कैफ़ियत में है। हर मुश्किल में हमें दूसरों की साज़िश नज़र आती है।
काश कोई इस उम्मत को बता दे कि किताबे-ज़िन्दगी को पढ़ने के लिये तुम्हें एक ऐनक की ज़रूरत है और वो ऐनक कहीं ओर नहीं बल्कि तुम्हारे अपने ही पास है, लिहाज़ा उसे अपने सर से उतारो और उसके असली मक़ाम पर रखो। जैसे ही तुम इस ऐनक को उसके सही मक़ाम पर रखोगे तुम्हें ज़िन्दगी की शाहराह साफ़ नज़र आने लगेगी और दुनिया की और दुनिया में हर चीज़ की हक़ीक़त वैसे ही नज़र आने लगेगी जैसे कि वो है।