जब तक इन्सान इन्सान की ग़ुलामी करता रहेगा, र्इश्वर के बजाए अपने ही जैसे मनुष्य के बनाए हुए क़ानून को माना जाता रहेगा, तब तक न तो किसी जगह शान्ति की स्थापना ही सम्भव है और न ही किसी जगह इंसान को सुख प्राप्त हो सकता है। इसी तरह रक्तपात होता रहेगा, इसी तरह अत्याचार और अन्याय होता रहेगा। लूटखसोट का बाज़ार इसी तरह गर्म रहेगा और इसी तरह आदमी का ख़ून आदमी चूसता रहेगा। इसी तरह नारी का अपमान होता रहेगा, नैतिकता और सदाचार तबाह होते रहेंगे, सेहत और तन्दुरुस्ती नष्ट होती रहेगी। अर्थात वे सारी शक्तियाँ जो र्इश्वर ने मनुष्य को दी थीं, मनुष्य के लाभ के बजाए इसके विनाश और बरबादी में ख़र्च होती रहेंगी।
यह स्थायी नरक जो इसी संसार में मनुष्य ने अपने लिए स्यवं अपने हाथों बना ली है, उसका कारण इसके सिवा और कुछ नहीं है कि उसने मानव-समाज रूपी उस मशीन को चलाने की कोशिश की, जिसके कल-पुर्ज़ों से वह परिचित ही नहीं । वास्तव में इस मशीन को जिसने बनाया है, वही इसके रहस्यों को जानता है, वही इसकी प्रकृति से परिचित है, उसी को भली-भाँति मालूम है कि यह किस प्रकार ठीक चल सकती है।
यदि मनुष्य अपनी बेवक़ूफ़ी छोड़ दे और अपनी अज्ञानता स्वीकार करके उस नियम का पालन करने लगे जो स्वयं इस मशीन के बनानेवाले ने निश्चित किया है, तब तो जो कुछ बिगड़ा है वह फिर बन सकता है, चारों और जो अशान्ति और अत्याचार व्याप्त है इसको शान्ति में परिवर्तित किया जा सकता है। नहीं तो इन संकटों और समस्याओं का कोर्इ हल निश्चित रूप से असम्भव है।
So, let us obey The Lord to establish peace on earth.