Rasulullah (sl) ki Dawate-Haq

Rasulullah (sl) ki Dawate-Haq

रसूलुल्लाह (सल्ल०) की दावते-हक़

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रसूलुल्लाह (सल्ल०) की दावते-हक़ ने इन्सानी दुनिया में वो अज़ीमुश्शान तब्दीली पैदा की जिसने दुनियाए-इन्सानियत की तारीख़ बदल कर रख दी,

जिसने मुर्दा दिलों के अन्दर ज़िन्दगी की नई रूह फूँक दी और फिर दुनिया ने वो मंज़र देखा कि

क़ातिल जो थे वो रहम-दिल बन गए;

ज़ालिम जो थे वो आदिल बन गए;

बुत-परस्त जो थे उन्होंने ख़ुद अपने हाथों से बुत तोड़ डाले;

शराब के रसिया जो थे उन्होंने अपने हाथों से शराब के मटके फोड़ डाले;

औरत को जानवर समझने वाले जो थे अब उसकी इज़्ज़त और तकरीम के अलम्बरदार बन गए,

राहज़न जो थे वो मुहाफ़िज़ बन गए,

नफ़रत और अदावतों के आतिशफ़शाँ (Volcano) सर्द हो गए और मुहब्बत व उख़ूवत की फ़सले-बहार आ गई।

यानी

जो न थे ख़ुद राह पर औरों के हादी बन गए

क्या नज़र थी जिसने मुर्दों को मसीहा कर दिया

The call of truth brought forth by the Messenger of Allah ﷺ ignited a magnificent transformation in the human world—
a revolution so profound that it altered the course of human history.

It breathed a new spirit into lifeless hearts, and then the world witnessed miracles unfold:

The murderers became merciful;
The highway robbers became protectors of the people;
The oppressors turned into champions of justice;
Those who once worshipped idols shattered them with their own hands;
The addicts of wine smashed their own wine jars to pieces;
Those who treated women worse than beasts became their defenders and bearers of dignity;

Volcanoes of hatred and enmity cooled down,
And a springtime of love and brotherhood bloomed across the land.

Indeed—
Those who were once lost themselves became guides for others.
What a gaze that turned even the dead into healers of hearts.

رسول اللہ ﷺ کی دعوتِ حق نے انسانی دنیا میں ایک عظیم الشان انقلاب برپا کیا، جس نے تاریخِ انسانیت کا رُخ بدل کر رکھ دیا۔

یہ وہ دعوت تھی جس نے مُردہ دلوں میں نئی روح پھونک دی، اور پھر دنیا نے وہ مناظر دیکھے کہ:

قاتل جو تھے وہ رحم دل بن گئے؛
راہزن جو تھے وہ راہ کے محافظ بن گئے؛
ظالم جو تھے وہ عدل و انصاف کے پیکر بن گئے؛
بُت پرست جو تھے، اُنہوں نے اپنے ہی ہاتھوں سے بُت توڑ ڈالے؛
شراب کے رسیا جو تھے انہوں نے اپنے ہی ہاتھوں سے مٹکے چکنا چور کر ڈالے؛
جو عورت کو جانور سے بدتر سمجھتے تھے، وہ اب اُس کی عزت و تکریم کے عَلَم بردار بن گئے؛

نفرت اور عداوت کے آتش فشاں سرد ہو گئے، اور محبت و اُخوّت کی بہار آ گئی۔

یعنی:

جو خود راہ پر نہ تھے، وہ دوسروں کے رہنما بن گئے،
کیا نگاہ تھی کہ مُردوں کو بھی مسیحا بنا دیا۔

 

Hindi

रसूलुल्लाह (सल्ल०) की दावते-हक़

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रसूलुल्लाह (सल्ल०) की दावते-हक़ ने इन्सानी दुनिया में वो अज़ीमुश्शान तब्दीली पैदा की जिसने दुनियाए-इन्सानियत की तारीख़ बदल कर रख दी,

जिसने मुर्दा दिलों के अन्दर ज़िन्दगी की नई रूह फूँक दी और फिर दुनिया ने वो मंज़र देखा कि

क़ातिल जो थे वो रहम-दिल बन गए;

ज़ालिम जो थे वो आदिल बन गए;

बुत-परस्त जो थे उन्होंने ख़ुद अपने हाथों से बुत तोड़ डाले;

शराब के रसिया जो थे उन्होंने अपने हाथों से शराब के मटके फोड़ डाले;

औरत को जानवर समझने वाले जो थे अब उसकी इज़्ज़त और तकरीम के अलम्बरदार बन गए,

राहज़न जो थे वो मुहाफ़िज़ बन गए,

नफ़रत और अदावतों के आतिशफ़शाँ (Volcano) सर्द हो गए और मुहब्बत व उख़ूवत की फ़सले-बहार आ गई।

यानी

जो न थे ख़ुद राह पर औरों के हादी बन गए

क्या नज़र थी जिसने मुर्दों को मसीहा कर दिया

The call of truth brought forth by the Messenger of Allah ﷺ ignited a magnificent transformation in the human world—
a revolution so profound that it altered the course of human history.

It breathed a new spirit into lifeless hearts, and then the world witnessed miracles unfold:

The murderers became merciful;
The highway robbers became protectors of the people;
The oppressors turned into champions of justice;
Those who once worshipped idols shattered them with their own hands;
The addicts of wine smashed their own wine jars to pieces;
Those who treated women worse than beasts became their defenders and bearers of dignity;

Volcanoes of hatred and enmity cooled down,
And a springtime of love and brotherhood bloomed across the land.

Indeed—
Those who were once lost themselves became guides for others.
What a gaze that turned even the dead into healers of hearts.

رسول اللہ ﷺ کی دعوتِ حق نے انسانی دنیا میں ایک عظیم الشان انقلاب برپا کیا، جس نے تاریخِ انسانیت کا رُخ بدل کر رکھ دیا۔

یہ وہ دعوت تھی جس نے مُردہ دلوں میں نئی روح پھونک دی، اور پھر دنیا نے وہ مناظر دیکھے کہ:

قاتل جو تھے وہ رحم دل بن گئے؛
راہزن جو تھے وہ راہ کے محافظ بن گئے؛
ظالم جو تھے وہ عدل و انصاف کے پیکر بن گئے؛
بُت پرست جو تھے، اُنہوں نے اپنے ہی ہاتھوں سے بُت توڑ ڈالے؛
شراب کے رسیا جو تھے انہوں نے اپنے ہی ہاتھوں سے مٹکے چکنا چور کر ڈالے؛
جو عورت کو جانور سے بدتر سمجھتے تھے، وہ اب اُس کی عزت و تکریم کے عَلَم بردار بن گئے؛

نفرت اور عداوت کے آتش فشاں سرد ہو گئے، اور محبت و اُخوّت کی بہار آ گئی۔

یعنی:

جو خود راہ پر نہ تھے، وہ دوسروں کے رہنما بن گئے،
کیا نگاہ تھی کہ مُردوں کو بھی مسیحا بنا دیا۔

 

रसूलुल्लाह (सल्ल०) की दावते-हक़

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रसूलुल्लाह (सल्ल०) की दावते-हक़ ने इन्सानी दुनिया में वो अज़ीमुश्शान तब्दीली पैदा की जिसने दुनियाए-इन्सानियत की तारीख़ बदल कर रख दी,

जिसने मुर्दा दिलों के अन्दर ज़िन्दगी की नई रूह फूँक दी और फिर दुनिया ने वो मंज़र देखा कि

क़ातिल जो थे वो रहम-दिल बन गए;

ज़ालिम जो थे वो आदिल बन गए;

बुत-परस्त जो थे उन्होंने ख़ुद अपने हाथों से बुत तोड़ डाले;

शराब के रसिया जो थे उन्होंने अपने हाथों से शराब के मटके फोड़ डाले;

औरत को जानवर समझने वाले जो थे अब उसकी इज़्ज़त और तकरीम के अलम्बरदार बन गए,

राहज़न जो थे वो मुहाफ़िज़ बन गए,

नफ़रत और अदावतों के आतिशफ़शाँ (Volcano) सर्द हो गए और मुहब्बत व उख़ूवत की फ़सले-बहार आ गई।

यानी

जो न थे ख़ुद राह पर औरों के हादी बन गए

क्या नज़र थी जिसने मुर्दों को मसीहा कर दिया

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

2 mins to read

हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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