रसूलुल्लाह की अज़मत कुछ इस वजह से नहीं है कि आप (सल्ल०) ने किसी बालाई ताक़त के बल पर कुछ ख़ास क़िस्म के मोजिज़े कर दिखाए हों बल्कि आप (सल्ल०) की अज़मत अस्ल में इस बुनियाद पर है कि आप (सल्ल०) ने अल्लाह की मदद से अल्लाह के बन्दों के दिलों को यकसर बदल कर रख दिया था। आप (सल्ल०) ने उनके दिलों से ख़ुद उनकी या उन ही के जैसे दूसरे बन्दों की बड़ाई को निकाल कर एक अल्लाह की बड़ाई क़ायम कर दी थी, जिससे उस समाज में एक आम इन्सान से लेकर हुक्मराँ तबक़े तक के दिलों में अपने कामों और कारनामों के लिये ख़ुदा के सामने जवाब देही का यक़ीन कुछ इस तरह पुख़्ता हो गया कि उस समाज से करप्शन का ख़ात्मा हो गया और समाज में अम्नो-सलामती बहाल हो गई। इस जवाबदेही के यक़ीन के पैदा हो जाने से राहज़न जो थे वो रास्तों के मुहाफ़िज़ बन गए, लुटेरे और ग़ासिब जो थे वो दाता बन गए, फ़सादी जो थे वो अम्नो-सलामती के अलम्बरदार बन गए, ज़ालिम और जाबिर जो थे वो आदिल बन गए।
इन्सानों के दिलों से होते हुए पूरे समाज में आने वाली तब्दीली ही मुहम्मद (सल्ल०) की अज़मत का बुलन्द तरीन पहलू है।
आप (सल्ल०) की अज़मत पे लाखों सलाम।