क़ुरआन में जहाँ रोज़े का मक़सद तक़वा हासिल करना बताया है वहीँ इस माह में जो हिदायत-नाम (क़ुरआन) नाज़िल किया गया उसकी हिकमत बताते हुए फ़रमाया ताकि तुम (अपने रब का) शुक्र अदा करो। (सूरा 2 : 185)
शुक्र वो ख़ूबी है जिसे इख़्तियार करने से इन्सान कभी अल्लाह की नेमतों से महरूम नहीं हो सकता, क्योंकि अल्लाह का फ़रमान है कि “अगर शुक्रगुज़ार बनोगे तो मैं तुमको और ज़्यादा नवाज़ूँगा और अगर कुफ़्र करोगे (छिपाओगे) तो मेरी सज़ा बहुत सख़्त है।” (14:7)
शुक्र वो अमल है जिसे करते रहने से इन्सान ख़ुदा के अज़ाब से महफ़ूज़ रह सकता है, क्योंकि क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है कि “आख़िर अल्लाह को क्या पड़ी है कि तुम्हें ख़ाहमख़ाह अज़ाब में मुब्तिला करे, अगर तुम शुक्रगुज़ार बन्दे बने रहो और ईमान की रविश पर चलो। (4:47)
शुक्र वो भलाई है जिसे इख़्तियार करने से इन्सान ख़ुद अपना ही भला करता है, क्योंकि अल्लाह क़ुरआन में फ़रमाता है कि “जो कोई शुक्र करे उसका शुक्र (एहसानमंदी) उसके अपने ही लिए फ़ायदेमंद है।” (31:12)
अब ये बन्दे का ख़ुद का काम है कि वो अपना फ़ायदा चाहता है या नुक़सान में ही पड़े रहना चाहता है, क्योंकि अल्लाह ने इन्सान को आज़ादी भी दी और रास्ता भी दिखा दिया, क़ुरआन में है कि “हमने उसे रास्ता दिखाया, अब वो चाहे तो शुक्र करने वाला बने या कुफ़्र करे।” (76:3)
अगर कोई शख़्स ख़ुदा की नेमतों को पहचान ले और उन नेमतों का शुक्रगुज़ार होना चाहे तो दरअसल यही ईमान है और अल्लाह अपने बन्दों के लिये इसे पसन्द करता है। (क़ुरआन 39:7) अगर उसकी नेमतों से मुँह फेर ले और उनका इनकार कर दे तो यही अमल कुफ़्र है।
यूँ तो हम अल्लाह की नेमतों से हर वक़्त इतने घिरे हुए हैं कि अगर उनको गिनना चाहें तो गिन नहीं सकते। (क़ुरआन 16:18) उन नेमतों पर हम हर वक़्त भी उसका शुक्र अदा करें तो कम है लेकिन रमज़ान वो महीना है जिसमें दो ऐसी ख़ास नेमतें अल्लाह ने हमें अता की हैं कि जिनकी वजह से रमज़ान सरासर शुक्र का महीना बन जाता है। उन दो नेमतों में से पहली तो है क़ुरआन, जो
हमारे लिये हिदायत का सरचश्मा है,
हमें अँधेरों से निकालकर रौशनी में ले आता है,
गुमराही से आगाही की तरफ़ हमारी रहनुमाई करता है और
हमारी ज़िन्दगी को एक ऐसी शाहराह पर ले जाता है जो दुनिया की सरसब्ज़ व शादाब और पुर-सुकून वादियों से होकर गुज़रती है और हमें उस मंज़िल (जन्नत) पर लेजाकर रोकती है जहाँ हमेशा-हमेश की ख़ुशियाँ और मसर्रतें, राहत व सुकून हमारी मुन्तज़िर हैं।
लिहाज़ा सरासर शुक्र के इस माहे-मुबारक में इस अज़ीम किताब (क़ुरआन) के अता किये जाने पर हम ख़ुदा का जितना शुक्र अदा कर सकें कम है।दूसरी नेमत इस माह के रोज़े हैं। रोज़ा हमारे लिये वो अज़ीम नेमत है जो
हमें अल्लाह से क़रीब कर देता है,
हमें अपने ही जैसे बन्दों से क़रीब कर देता है,
नेमतों की क़द्रदानी के आला-मक़ाम पर ले आता है, और
हमें नेमतों के शुक्र के जज़्बे से भर देता है।अगर अल्लाह के हुक्म को सामने रखकर इन्सान खाने-पीने की बेश-बहा नेमतों से और जिंसी तस्कीन की बेश-क़ीमत लज़्ज़त से अपने आपको महरूम कर लेता है तो ये महरूमी इन्सान के अन्दर उन नेमतों की क़द्र करने का एहसास पैदा करती है, अगर इन्सान इस अज़ीम मक़सद को सामने रखकर जानबूझकर अपने-आपको अल्लाह की नेमतों से महरूम न रखे तो कभी इन नेमतों की सच्ची क़द्र के मक़ाम को पहुँच ही नहीं सकता।
लिहाज़ा अगर हम अल्लाह की नेमतों से महरूम नहीं रहना चाहते और चाहते हैं कि हमारे छोटे-छोटे कामों की भी अल्लाह क़द्र कर ले और उन्हें क़बूल कर ले तो हमें चाहिये कि इस माहे-मुबारक में अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करें।
अब सवाल पैदा होता है कि शुक्र किसे कहते हैं और हम बेहतर तरीक़े से शुक्र किस तरह अदा कर सकते हैं?
शुक्र के असली मानी होते हैं ‘भर जाना’और ‘इज़हार करना’ या ‘नुमायाँ करना’ हदीस में है कि जिस शख़्स को कोई नेमत दी गई और उसने उसका ज़िक्र (यानी उसे ज़ाहिर) किया तो उसने नेमत का शुक्र अदा किया और अगर उसने उसे छिपाया तो उसने उसकी नाशुक्री की।(सिलसिला : 402)
मालूम हुआ कि शुक्र के असल मानी नेमत के तस्लीम करने या एहसानमंदी के हैं और एहसान करनेवाले (मोहसिन) के मुक़ाबले में एहसानमंदी का सही रवैया 3 बातों से ज़ाहिर होता है-1) आदमी दिल से एहसान को तस्लीम करे, 2) ज़बान से उसका इक़रार करे और 3) अमल से एहसानमंदी का सुबूत दे। यानी जो नेमत दी गई है उसका सही इस्तेमाल करे। इन्हीं तीन चीज़ों के मजमूए का नाम शुक्र है। फिर इस शुक्र का तक़ाज़ा भी तीन बातों से ज़ाहिर होता है- 1) एहसान की निस्बत असल मोहसिन ही की तरफ़ की जाए इसमें किसी दूसरे को शरीक न करे। 2) आदमी का दिल अपने मुहसिन के लिए मुहब्बत और वफ़ादारी के जज़्बे से भरा हो। 3) अपने मुहसिन का फ़रमाँबरदार हो और उसकी दी हुई नेमतों को उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ इस्तेमाल न करे। याद रखें सिर्फ़ ज़बान से शुक्र का लफ़्ज़ अदा करने से शुक्र अदा नहीं होता बल्कि असल शुक्र यही है कि नेमतों का सही इस्तेमाल किया जाए।
अल्लाह से दुआ है कि हमें अल्लाह और उसके बन्दों का उसी तरह शुक्र अदा करने की तौफ़ीक़ दे जिस तरह कि उसका हक़ है।