मुसलमान क्या हैं और क्या होना चाहिये
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हक़ीक़त ये है कि मौजूदा हालात मुसलमानों की कुछ इस तरह की तस्वीर पेश कर रहे हैं कि हम
बेसिकली (बुनियादी तौर पर) इतने कमज़ोर हैं कि वक़्त से पहले ख़बरदार होते ही नहीं हैं, कोई ख़बरदार करे तब भी बेदार नहीं होते हैं। और जब मुसीबत सर पर आ पड़ती है फिर इस तरह घबराने लगते हैं जैसे किसी भीड़ में साँप छोड़ दिये गए हों।
इसके लिये सबसे अहम् हिफ़ाज़ती तदबीर ये है कि हम अपनी बुनियाद को मज़बूत करें ताकि हम-
-आईडियालॉजिकली (अक़ीदे के एतिबार से) इतने पुख़्ता हों कि मुआशरे के हर मसले का हल लोगों के सामने कॉन्फ़िडेंटली (यक़ीन के साथ) पेश कर सकें; और
-इंटेलेक्चुअली (ज़ेहनी तौर पर) इतने एडवांस हों कि हर आनेवाले ख़तरे से वक़्त रहते ख़बरदार हो सकें और लोगों को उससे अवेयर (बाख़बर) कर सकें; और
-प्रैक्टिकली (अमली तौर पर) इतने प्रैक्टिसिंग (बाअमल) हों कि हमारे अमल से लोग मुतास्सिर हो सकें।