मुसलमानों में इत्तिहाद की जितनी कोशिशें की गई हैं इन्तिशार उतना ही बढ़ा है और इस तरह की कोशिशें मुस्तक़बिल में इस इन्तिशार को और बढ़ाएँगी।
करने का असल और उसूली काम ये है कि सबसे पहले हम ये देखें कि कौन-सी बात क़ुरआन और उसकी फ़िक्र से ज़्यादा क़रीब है? और इस बुनियाद पर जिस बात को भी हम हक़ तस्लीम करें उस पर अमल करते रहें और अपने आस-पास लोगों की ज़ेहन-साज़ी की कोशिशें करते रहें।
दूसरों की मुख़ालिफ़त करने और उन पर कटाक्ष करने के बजाय अपने-आपको इन्सानियत के लिये मुफ़ीद और कारामद बनाने की फ़िक्र करें।
इख़्तिलाफ़ी मामलों में आपस में दस्तो-गरेबाँ होने के बजाय अपने मौक़िफ़ (पक्ष) पर रहते हुए ख़ुशगवारी के साथ आगे बढ़ने की हिम्मत और हौसला अपने अन्दर पैदा करें।
अगर हमने ये काम मुख़लिसाना तौर पर अंजाम दिये तो यक़ीन जानिये आपसी इत्तिफ़ाक़ और इत्तिहाद फ़ितरी तौर पर ख़ुद-ब-ख़ुद पैदा होता चला जाएगा।
मगर ये बड़ा ही पित्ता-मारी और हौसले का काम है, इस काम को अंजाम देने के लिये ख़ूने-जिगर को जलाना पड़ता है और अपनी अना को क़ुर्बान करके अपनी हस्ती को मिटाना पड़ता है।