नदी किनारे एक गाँव था। इस गाँव में कोई स्कूल नहीं था। गाँव के लोग अगर अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते तो गाँव से 10 किलो मीटर दूर एक क़स्बे में या किसी नामचीन शहर में भेजते थे।
एक बार एक ऐसे शख़्स को उस गाँव का मुखिया बनाया गया जो बहुत ही बा-वक़ार भी था और पुर-अज़्म भी, बा-हौसला भी था और बहादुर भी, होशियार भी था और मेहनती भी, लोगों का ग़मगुसार भी था और फ़ैयाज़ भी, ख़ुद भी काम करने का हौसला रखता था और लोगों से काम लेने का हुनर भी जानता था, दूसरों को उनके हक़ से ज़्यादा देना और अपना हक़ माफ़ कर देना उसकी आदत थी, लोगों से अज्र की उम्मीद रखे बिना उनके काम आना मानो उसकी ड्यूटी थी। माफ़ी और दरगुज़र से काम लेना उसकी सबसे बड़ी ताक़त थी। पूरे वक़ार के साथ रहता था, जब बाहर निकलता तो हाथ में छड़ी होती, सर पर पगड़ी, अक्सर धोती और कुर्ता पहनता था, वक़्त की पाबन्दी के लिये हाथ में घड़ी बाँधना कभी नहीं भूलता था।
उसने अपनी ज़िन्दगी को बा-मक़सद गुज़ारा। उसकी ज़िन्दगी का मक़सद ये था कि गाँव में अम्न व सलामती क़ायम हो और सभी लोग ख़ुशहाल हों। इसके लिये गाँव में तालीम का एक ऐसा इदारा क़ायम किया जाए जिसमें उस गाँव के ही बच्चे नहीं बल्कि आस-पास के सभी गाँवों के बच्चे तालीम हासिल करें और तालीम का कोई शोबा ऐसा न हो जिसके लिये उन्हें कहीं बाहर जाना पड़े। ज़ाहिर है जब लोग तालीमयाफ़्ता होंगे तो उन्हें ज़िन्दगी का शुऊर होगा, वो बा-अख़लाक़ और बा-किरदार होंगे, जहाँ भी जाएँगे वो अपनी अलग पहचान रखते होंगे।
मुखिया ने इस तालीमी इदारे का बीड़ा उठा लिया। दर-दर की ख़ाक छानी, लोगों की बड़ी मुख़ालिफ़तों का सामना करना पड़ा, गाँव के जो लोग बड़े बने हुए थे वो मुखिया के दुश्मन हो गए, वो नहीं चाहते थे कि गाँव के लोग बा-शुऊर हों, वो तो चाहते थे कि लोग बस उनकी ग़ुलामी करते रहें। जब बहुत ज़्यादा तंग किया तो अपने मिशन को पूरा करने के लिये पड़ौस के दूसरे गाँव को अपनी सरगर्मियों का मरकज़ बना लिया लेकिन अपने मिशन से पीछे नहीं हटा। अपने ही गाँव के लोग उस पड़ौस के गाँव में भी चढ़ आए, बिल-आख़िर जमकर मुक़ाबला करना पड़ा और उन्हीं बड़े लोगों से लड़ना भी पड़ा, जो उनके अपने ही लोग थे, रिश्तेदार और सगे-सम्बन्धी थे।
बहर हाल! तमाम सरगर्मियों, मेहनत और जिद्दोजुहद के बाद वो इदारा क़ायम हुआ जहाँ से नौजवान नस्ल बा-शुऊर और बा-किरदार होकर निकलती और ज़िन्दगी के मुख़्तलिफ़ मैदानों में इन्सानियत की ख़िदमत करती थी। पूरे इलाक़े में जब अम्न और सलामती क़ायम हो गई तो ख़ुशहाली का दौर शुरू हो गया। जिस गाँव में उसके सैंकड़ों दुश्मन हुआ करते थे अब उसी गाँव में हज़ारों चाहनेवाले मौजूद थे और इन चाहनेवालों की तादाद बढ़ती ही जा रही थी।
फिर उसूल के मुताबिक़ मुखिया का दुनिया से रुख़सत होने का वक़्त आ गया। उसने अपने तमाम चाहनेवालों से वादा लिया कि वो उसके मिशन को आगे बढ़ाएँगे, उसने बताया कि उसका वुजूद उसके मिशन से वाबस्ता है, लिहाज़ा जो उसके मिशन से मुहब्बत करेगा वही हक़ीक़त में उससे मुहब्बत करनेवाला होगा। और फिर वो हरदिल-अज़ीज़ शख़्सियत इस दुनिया से रुख़सत हो गई।
उसके चाहनेवालों ने पूरा ज़ोर लगाकर उस मिशन को और आगे बढ़ाया, ख़ूब तरक़्क़ी दी। लेकिन वक़्त के साथ-साथ मिशन से मुहब्बत में कमी आती चली गई, मुहब्बत रह गई तो सिर्फ़ शख़्सियत से! लोग जब मुखिया का नाम लेते तो हिड़की बाँधकर रोते, उन पर कोई तनक़ीद करता तो बर्दाश्त न करते, आप से बाहर हो जाते लेकिन मिशन कहीं गुम होकर रह गया। इदारे का ढाँचा तो बाक़ी रहा लेकिन उससे बा-शुऊर और बा-किरदार नौजवान निकलने बहुत ही कम हो गए। जो निकलते भी तो वो अपने ही लोगों जे ज़रिए ज़िन्दगी के मैदानों में बाज़ी हार जाते हैं।
अब उस गाँव में इदारे से वाबस्ता लोग मुखिया जी के जैसा धोती-कुर्ता पहनना मुखिया जी से अक़ीदत समझते हैं लेकिन जिस धोती-कुर्ते को पहनकर मुखिया जी मक़सद की जिद्दोजुहद के लिये निकला करते थे न अब वो मिशन है न वो जिद्दोजुहद।
आज मुखिया जी के चाहनेवाले छड़ी लेकर निकलने को मुखिया जी से मुहब्बत का नाम देते हैं, हालाँकि मुखिया ने तो अपनी छड़ी से सैंकड़ों भेड़ियों और लकड़-बग्घों की ख़बर ली थी लेकिन इनकी छड़ी से आज गली का कुत्ता भी टस से मस नहीं होता है।
जिस घड़ी का इस्तेमाल करके मुखिया जी वक़्त के पाबन्द हुआ करते थे आज उनके चाहनेवाले उसी तरह घड़ी बाँधकर निकलने को मुहब्बत का नाम देते हैं लेकिन वक़्त की पाबन्दी उनके ख़याल में दूर-दूर तक नहीं होती है।
जो पगड़ी मुखिया जी बाँधा करते थे आज उनके नाम लेवा उस पगड़ी को ताज समझकर पहनते हैं मगर पगड़ी के नीचे जो सर है उसमें दिमाग़ कुन्द होकर रह गया है; उसमें मुहब्बत की जगह नफ़रतें हैं, इत्तिहाद की जगह गरोहबंदियाँ और तिफ़र्क़े-बाज़ियाँ हैं, एक-दूसरे को नीचे दिखाने की चालबाज़ियाँ गर्दिश करती हैं। न वो इज़्ज़त और वक़ार है न वो अदब व एहतिराम, मानो वो पगड़ी पुकार-पुकारकर कह रही है कि ख़ुदा रा और रुस्वा न कराओ।
अब फ़ैसला आपको करना है कि
– मुखिया जी के मिशन से मुहब्बत ज़्यादा अहम् है या महज़ शख़्सियत से?
– मुखिया जी के मक़सद से लगाव रखनेवाला उनसे मुहब्बत का असल दावेदार है या धोती-कुर्ता पहनकर, सर पर पगड़ी और हाथ में घड़ी बाँधकर छड़ी घुमाते हुए मुहब्बत का रॉब गाँठनेवाला मुखिया जी से मुहब्बत का असल दावेदार है?
ये बात ज़रूर ज़ेहन में रखियेगा कि शख़्सियत से मुहब्बत कभी मिशन से क़रीब नहीं करती, हाँ मिशन से मुहब्बत शख़्सियत से क़रीब ज़रूर करती है।
नोट : क्या आपको इस किरदार में दुनिया के अज़ीम तरीन शख़्सियत की झलक दिखाई देती है? अगर हाँ, तो क्या हमें उन से मोहब्बत के हक़ीक़ी तक़ाज़ों को पूरा नहीं करना चाहिए, जबकि ये काम हमारी दुनिया और आख़िरत की कामयाबी का वाहिद तरीक़ा भी हो?