किसी भी शख़्स को कोई काम इसलिए सिखाया जाता है कि वह उसे महारत (Perfection) के साथ कर सके।
बच्चे को साइकल चलानी इसलिए सिखाई जाती है कि वो उसे महारत (Perfection) के साथ चला सके।
किसी शख़्स को गाड़ी चलाना इसलिए सिखाया जाता है कि वो Perfection के साथ गाड़ी चला सके।
एक डॉक्टर को सर्जरी करना इसलिए सिखाया जाता है कि वो परफ़ेक्शन के साथ सर्जरी कर सके।
एक फ़ौजी को हथियार चलाना इसलिए सिखाया जाता है कि वह ज़रूरत पड़ने पर परफ़ेक्शन के साथ हथियार चला सके।
इन सब कामों को महारत के साथ सीख लेने के बाद अगर कोई शख़्स ज़रूरत पड़ने पर इन कामों को सही से अंजाम न दे तो समझा जाएगा कि इन कामों में महारत हासिल करने के लिये लगाया गया वक़्त, पैसा और सलाहियत सब बरबाद हो गई।
क़ुरआन और हदीस की रूह के मुताबिक़ रमज़ान वो महीना है जिसमें-
मुसलमानों को अल्लाह की फ़रमाँबरदारी सिखाई जाती है और नाफ़रमानी से बचना सिखाया जाता है
ग़रीबों से हमदर्दी और उनसे दिलजोई सिखाई जाती है।
आपस में मुहब्बत और मिलनसारी सिखाई जाती है।
सिखाया जाता है कि झगड़ा न करो और न आपस में गालम-गलोच।
सिखाया जाता है कि न झूट बोलो, न झूट पर अमल करो और न झूट पर गवाह बनो।
सिखाया जाता है कि मुश्किल हालात में सब्र से काम लेना है और हक़ पर जमे रहना है।
अब अगर कोई शख़्स ये सारी बातें सीख जाए और इन पर महारत (Perfection) हासिल कर ले लेकिन इन पर अमल न करे तो समझो कि उसका वो सीखना बेकार है। उसने वक़्त, मेहनत और सलाहियतें जो इस काम में खपाई थीं सब की सब बर्बाद हो गईं।
इसका मतलब ये है कि रमज़ान तो अस्ल में सीखने और परफ़ेक्शन हासिल करने का महीना है और बाक़ी के ग्यारह महीने वो मैदान है जहाँ हमें उसी महारत और परफ़ेक्शन के साथ उन बातों को करके दिखाना है जो कुछ हमने सीखा है। इसीलिए प्यारे नबी (सल्ल०) ने “फ़रमाया बहुत से रोज़ेदार ऐसे हैं जिन्हें रोज़े में भूख और प्यास के अलावा कुछ हासिल नहीं होता।” (हदीस बुख़ारी) यक़ीन जानिए ये वही लोग हैं जो सीख तो लेते हैं लेकिन मैदाने-अमल में फुस हो जाते हैं।
“जिस किसी ने (रोज़े की हालत में) झूट बोलना और झूट पर
अमल करना न छोड़ा वो जान ले कि अल्लाह को इस बात की
कोई ज़रूरत न थी कि वो बस खाना-पीना छोड़ दे।” (हदीस:बुख़ारी)