उम्मत के लिये ये बात किसी अलमिये (दर्दनाक वाक़िए) से कम नहीं है कि जो मसलक फ़ुरुई (जुज़्वी और मामूली) मामलों में रहनुमाई के लिये वुजूद में आए थे वो मसलक आज दीन की हैसियत इख़्तियार कर गए हैं। ये नासूर हमारी उम्मत में इस हद तक सरायत कर गया है कि हमारी मसाजिद और मदारिस की पहचान मसलकों से होती है। (अगर ग़ौर किया जाए तो आपस में इन्तिशार और इख़्तिलाफ़ का ये कैंसर इस हद तक भी पाया जाता है कि हमारी मस्जिदों की पहचान जमाअतों और ब्रादरियों तक से भी होती है) हमारे गिर्द मसलकों और जमाअतों की दीवारें इतनी मोटी और मज़बूत हो चुकी हैं कि हमें किसी दूसरी जमाअत और मसलक में कोई ख़ूबी नज़र ही नहीं आती है। हम दीन की तबलीग़ और इशाअत की आड़ में अपने मसलक और अपनी जमाअतों की तबलीग़ और इशाअत कर रहे होते हैं।
क्या ही बेहतर होता कि अहादीस के रद्दो-क़बूल को बुनियाद बनाकर एक-दूसरे की टाँग खिंचाई करने के बजाय हम क़ुरआन को मैयार मानकर नेकी और तक़वा के कामों में एक-दूसरे का तआवुन करते और मुआशरे को ख़ुशहाल बनाने की कोशिश करते। एक-दूसरे के ख़िलाफ़ साज़िशें करने और गुनाह व ज़्यादती की बातें करने के बजाय नेकी और ख़ुदा-तरसी की बातें करते। क्योंकि क़ुरआन का हुक्म है कि
تَعَاوَنُوۡا عَلَی الۡبِرِّ وَ التَّقۡوٰی ۪ وَ لَا تَعَاوَنُوۡا عَلَی الۡاِثۡمِ وَ الۡعُدۡوَانِ ۪ وَ اتَّقُوا اللّٰہَ ؕ اِنَّ اللّٰہَ شَدِیۡدُ الۡعِقَابِ
जो काम नेकी और ख़ुदातरसी के हैं उनमें सबकी मदद करो और जो गुनाह और ज़्यादती के काम हैं उनमें किसी की मदद न करो। अल्लाह से डरो, उसकी सज़ा बहुत सख़्त है। (5:2)
یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡۤا اِذَا تَنَاجَیۡتُمۡ فَلَا تَتَنَاجَوۡا بِالۡاِثۡمِ وَ الۡعُدۡوَانِ وَ مَعۡصِیَتِ الرَّسُوۡلِ وَ تَنَاجَوۡا بِالۡبِرِّ وَ التَّقۡوٰی ؕ وَ اتَّقُوا اللّٰہَ الَّذِیۡۤ اِلَیۡہِ تُحۡشَرُوۡنَ
ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! जब तुम आपस में पोशीदा बात करो तो गुनाह और ज़्यादती और रसूल की नाफ़रमानी की बातें नहीं, बल्कि नेकी और तक़वा की बातें करो और उस ख़ुदा से डरते रहो जिसके दरबार में तुम्हें हश्र के दिन पेश होना है। (58:9)
क्या ही बेहतर होता कि हम सिर्फ़ अपने बुज़ुर्गों और अपने उलमा के एहतिराम के बजाय अपने नौजवानों को इन्सानों की तकरीम का दर्स देते क्योंकि क़ुरआन हमें तकरीमे-इन्सानियत का दर्स देता है और कहता है कि
وَ لَقَدۡ کَرَّمۡنَا بَنِیۡۤ اٰدَمَ
“हमने बनी-आदम को मुकर्रम बनाया है।” (17:70)
लिहाज़ा इज़्ज़त व तकरीम के लिये अपने मसलक का आलिम या बुज़ुर्ग होना ज़रूरी नहीं है बल्कि सिर्फ़ इतनी बात काफ़ी है कि वो कोई भी एक इन्सान है।
क्या ही बेहतर होता कि अपने-अपने मसलक की हदीसों को बुनियाद बना कर अक़ीदों के क़िले मज़बूत करने और मुआशरती ऐतिबार से पस्ती में धँसने के बजाय हम अपने नौजवानों में क़ुरआन मजीद पर ग़ौर और तदब्बुर का हौसला पैदा करते ताकि हमारे नौजवान एक बेहतरीन क़ुरआनी मुआशरा बनाने के साथ-साथ सितारों पर भी कमन्दें डाल रहे होते और समाज में अपना कॉन्ट्रिब्यूशन दे रहे होते। क्योंकि अल्लाह ने जगह-जगह क़ुरआन पर ग़ौर और तदब्बुर करने पर उभारा है, क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है :
اَفَلَا یَتَدَبَّرُوۡنَ الۡقُرۡاٰنَ اَمۡ عَلٰی قُلُوۡبٍ اَقۡفَالُہَا
क्या इन लोगों ने क़ुरआन पर ग़ौर नहीं किया, या दिलों पर उनके ताले लगे हुए हैं? (47:24)
اِنَّ فِیۡ خَلۡقِ السَّمٰوٰتِ وَ الۡاَرۡضِ وَ اخۡتِلَافِ الَّیۡلِ وَ النَّہَارِ لَاٰیٰتٍ لِّاُولِی الۡاَلۡبَابِ
ज़मीन और आसमानों की पैदाइश में और रात और दिन के बारी-बारी से आने में उन होश रखनेवाले लोगों के लिये बहुत सी निशानियाँ हैं (3:190)
क्या ही बेहतर होता कि क़ुरआन व सुन्नत का नाम लेकर अपने मसलकों और जमाअतों की हिफ़ाज़त के लिये खड़े होने के बजाय हम अपने नौजवानों के अन्दर ज़ालिमों और जाबिरों के सामने हक़ की गवाही देने और मुआशरे में अद्ल व इन्साफ़ और अम्न व सलामती क़ायम करने के लिये खड़े होने का हौसला पैदा करते। क्योंकि अल्लाह फ़रमाता है :
یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا کُوۡنُوۡا قَوّٰمِیۡنَ لِلّٰہِ شُہَدَآءَ بِالۡقِسۡطِ ۫ وَ لَا یَجۡرِمَنَّکُمۡ شَنَاٰنُ قَوۡمٍ عَلٰۤی اَلَّا تَعۡدِلُوۡا ؕ اِعۡدِلُوۡا ۟ ہُوَ اَقۡرَبُ لِلتَّقۡوٰی ۫ وَ اتَّقُوا اللّٰہَ ؕ اِنَّ اللّٰہَ خَبِیۡرٌۢ بِمَا تَعۡمَلُوۡنَ
ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, अल्लाह से डरो, अल्लाह के लिये सच्चाई पर क़ायम रहनेवाले और इनसाफ़ की गवाही देनेवाले बनो। किसी गरोह की दुश्मनी तुमको इतना मुश्तइल (बेक़ाबू) न कर दे कि इनसाफ़ से फिर जाओ। इनसाफ़ करो ये ख़ुदातरसी से ज़्यादा मेल रखता है। अल्लाह से डरकर काम करते रहो, जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उससे पूरी तरह बाख़बर है। (5:8)
क्या ही बेहतर होता कि हम क़ुरआन और हदीस से हवाले दे-देकर नौजवानों को अपने मसलक और जमाअत की पैरवी पर मज़बूत करने के बजाय और मसलकी बोझ लादने के बजाय उन्हें उन पाबन्दियों से नजात दिलाते जो इस्लाम ने उन पर लगाई ही नहीं हैं, महज़ दीन को मज़हब बनाकर अपनी दुकानें चलानेवालों ने उन पर थोप दी हैं। क्योंकि क़ुरआन कहता है
اَلَّذِیۡنَ یَتَّبِعُوۡنَ الرَّسُوۡلَ النَّبِیَّ الۡاُمِّیَّ الَّذِیۡ یَجِدُوۡنَہٗ مَکۡتُوۡبًا عِنۡدَہُمۡ فِی التَّوۡرٰىۃِ وَ الۡاِنۡجِیۡلِ ۫ یَاۡمُرُہُمۡ بِالۡمَعۡرُوۡفِ وَ یَنۡہٰہُمۡ عَنِ الۡمُنۡکَرِ وَ یُحِلُّ لَہُمُ الطَّیِّبٰتِ وَ یُحَرِّمُ عَلَیۡہِمُ الۡخَبٰٓئِثَ وَ یَضَعُ عَنۡہُمۡ اِصۡرَہُمۡ وَ الۡاَغۡلٰلَ الَّتِیۡ کَانَتۡ عَلَیۡہِمۡ ؕ فَالَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا بِہٖ وَ عَزَّرُوۡہُ وَ نَصَرُوۡہُ وَ اتَّبَعُوا النُّوۡرَ الَّذِیۡۤ اُنۡزِلَ مَعَہٗۤ ۙ اُولٰٓئِکَ ہُمُ الۡمُفۡلِحُوۡنَ
जो इस पैग़म्बर, उम्मी नबी की पैरवी इख़्तियार करे जिसका ज़िक्र उन्हें अपने यहाँ तौरात और इंजील में लिखा हुआ मिलता है। वो उन्हें नेकी का हुक्म देता है, बुराई से रोकता है, उनके लिये पाक चीज़ें हलाल और नापाक चीज़ें हराम करता है, और उनपर से वो बोझ उतारता है जो उनपर लदे हुए थे और उन बन्धनों को खोलता है जिनमें वो जकड़े हुए थे, इसलिये जो लोग उसपर ईमान ले आएँ और उसकी हिमायत और मदद करें और उस रौशनी की पैरवी करें जो उसके साथ उतारी गई है, वही कामयाब होनेवाले हैं। (7:157)
क्या ही बेहतर होता कि हम मुसलमान इख़्तिलाफ़ की बुनियाद पर आपस में एक-दूसरे के दरम्यान कमियाँ और ख़ामियाँ तलाश करके एक-दूसरे को नीचा दिखाने, ज़लील करने और दूसरे मसलक और जमाअत को ग़लत साबित करके अपनी फ़तह का जश्न मनाने के बजाय एक दूसरे के दरम्यान कॉमन बातों पर बैठकर बातें करने का हौसला पैदा करते।
यक़ीन जानिये इख़्तिलाफ़ की बुनियाद पर अगर मुख़ालिफ़त और दुश्मनियाँ करने के लिये हमारे पास 10 बातें होंगी तो 10 बातें वो भी होंगी जिन पर हम आपस में बैठकर बात कर सकते हैं, जिनपर हमारे दरम्यान कोई इख़्तिलाफ़ नहीं होगा। जिस क़ुरआन को हम पूरी दुनिया की हिदायत की किताब होने का दावा करते हैं उसी क़ुरआन में ये हिदायत मौजूद है कि
قُلۡ یٰۤاَہۡلَ الۡکِتٰبِ تَعَالَوۡا اِلٰی کَلِمَۃٍ سَوَآءٍۢ بَیۡنَنَا وَ بَیۡنَکُمۡ
“ऐ किताबवालो! आओ एक ऐसी बात की तरफ़ जो हमारे और तुम्हारे बीच कॉमन है….।” (3:64)
ज़रा सोचें कि जिस क़ुरआन पर हमारा ईमान है वो तो अहले-किताब के दरम्यान कॉमन बातों पर बैठकर बातें करने की तलक़ीन करता है। क्या हमारे मसलकी और जमाअती इख़्तिलाफ़ात अहले-किताब से इख़्तिलाफ़ात से भी ज़्यादा बढ़े हुए हैं कि कोई एक बात भी ऐसी नहीं है जो हमारे दरम्यान कॉमन हो और हम आपस में बैठकर बातें न कर सकते हों।
लिहाज़ा ऐ मेरी उम्मत के नौजवानों अपनी हालत पर ग़ौर कीजिये और हर तरह की मसलकी और जमाअती तअस्सुब से बाहर निकलिये।
मेरे साथियो! मज़हब की अन्धी पैरवी से बाहर आइये। ये एक तरह की अफ़ीम है जो मसलक के ठेकेदार आपको पिला रहे हैं।
सीधे-सीधे दीन की तरफ़ आइये, जो ज़िन्दगी का सीधा और साफ़ रास्ता है। क़ुरआन को ख़ुद अपनी अक़्ल से समझने की कोशिश कीजिये, जो बात समझ में न आए उसके लिये उन उलमा से रुजू कीजिये जो मसलक की पिनक में मस्त न हों।