*प्रेम क्या है?*
प्रेम प्रेम सब कहें, प्रेम न चिन्है कोई।
आठ पहर भीना रहे, प्रेम कहाबै सोई।।*
किसी के प्रति मात्र सामयिक रूप से आकर्षित हो जाने को प्रेम नहीं कहते, बल्कि
प्रेम कहते हैं किसी के प्रति अपने आपको शाशवत रूप से समर्पित कर देने को।
और ऐसा शाशवत प्रेम किसी शाश्वत सत्ता से ही सम्भव है।
किसी की मात्र स्तुति, प्रशंसा, महिमागान और गुणगान करने को प्रेम नहीं कहते, बल्कि
प्रेम कहते हैं किसी के रंग में रंग जाने, उसकी पसन्द-नापसन्द को अपनी पसन्द-नापसन्द बना लेने को।
और सब रंगों से अच्छा रंग उसी हस्ती का हो सकता है जो सभी रंगों में निहित है।
प्रेम की पराकाष्ठा यह है कि जिससे प्रेम है वह आपकी हर ज़रूरत का ख़याल रखता हो और आप हर पल उसकी नाराज़गी से डरते हों।
ऐसा प्रेम पात्र एक अल्लाह के सिवा भला और कौन हो सकता है?
मुहब्बत क्या है? किसी की आह पे मर जाने का नाम।
ज़िन्दगी क्या है? किसी आशिक़ के अफ़साने का नाम।।
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*भावार्थ: सन्त कबीर दास जी कहते हैं कि सभी लोग प्रेम-प्रेम कहते रहते हैं, किन्तु प्रेम को शायद ही कोई जानता है।
यदि कोई व्यक्ति आठों पहर (24 घंटे) प्रेम में भीगा रहे तभी उसका प्रेम सच्चा कहा जायेगा।